गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

मुहम्मद रफ़ी के जन्मदिन पर विशेष : तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे




मुहम्मद रफ़ी का जन्म पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव (अमृतसर के पास) में 24 दिसंबर 1924 को एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था | बचपन में रफी एक फकीर के गीतों को सुना करते थे, जिससे उनके दिल में संगीत के प्रति एक अटूट लगाव पैदा हो गया। रफी के बडे़ भाई हमीद ने मोहम्मद रफी के मन में संगीत के प्रति बढ़ते रुझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढ़ने में प्रेरित किया।
जब रफी महज 2 वर्ष के थे तभी उनका परिवार लाहौर आकर रहने लगा। सुल्तानपुर (लाहौर) में उनके दरवाजे पर एक फकीर गाते हुए खैरात माँगने आता जिसे सुन नन्हे रफी में भी गाने का शौक जागा। जब रफ़ी छोटे थे तब इनके बड़े भाई की नाई दुकान थी, रफ़ी का काफी वक्त वहीं पर गुजरता था। रफ़ी जब सात साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज रफ़ी को पसन्द आई और रफ़ी उसकी नकल किया करते थे। उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसन्द आने लगी। लोग नाई दुकान में उनके गाने की प्रशंसा करने लगे।फकीरी गीत गाते वक्त उनके दिल में खास भक्तिभाव होता था जिसकी वजह एक फकीरी संस्कार रहा। वे उसके गीत गाने लगे। फकीर बहुत खुश हुआ और 6 साल के रफी को आशीर्वाद दिया, “बेटा एक दिन तू बहुत बड़ा गायक बनेगा”।इनके बड़े भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने को कहा।

रफी को 13 वर्ष की आयु में पहली बार कुंदन लाल सहगल के लाहौर-शो में गाने का अवसर मिला। रफी की मधुर आवाज़ ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उस प्रोग्राम में प्रसिद्ध संगीत निर्देशक श्याम सुंदर भी थे। उन्होंने रफी को अपनी पंजाबी फिल्म गुल-बलोच में सर्वप्रथम पाश्र्व-गायन का ऑफर दिया। यह गाना रफी का ज़ीनत बेगम के साथ एक युगल गीत था, जिसके बोल थे : नी सोहनिये नी हीरिये तेरी याद ने…। रफी साहिब की गायन-प्रतिभा को पहचानते हुए, संगीतकार फिरोज़ निज़ामी ने रफी को आल इंडिया रेडियो, लाहौर में नौकरी दिलवा दी। परंतु एक गायक बनने का सपना संजोये, रफी की अंतिम मंजिल तो मुंबई थी।
आखिरकार 1944 में रफी नौशाद साहिब के नाम एक सिफारशी पत्र लेकर मुंबई आ गए। नौशाद ने हिन्दी फिल्म पहले आप में रफी को गवाया और इस गाने के लिए रफी को 50 रुपये मेहनताना मिला था। इस प्रकार रफी साहिब का संघर्षपूर्ण फिल्मी सफर शुरू हो गया। उन्हें प्रथम सफलता फिल्म जुगनू के गीत बदला यहां वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है… से मिली थी और वह हिन्दी फिल्मों के मशहूर गायक बन गए। कोटला सुल्तान सिंह का फीकू अब मोहम्मद रफी बन चुका था।
मुहम्मद रफ़ी से जुड़े कुछ किस्से
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१ ) पिता ने कहा भूल जाऊँगा रफ़ी नाम का कोई बेटा था ………
हिन्दी फिल्मों के हरदिल अजीज पार्श्वगायक मोहम्मद रफी बचपन से ही गायक बनने का ख्वाब देखा करते थे. इस धुन में उन्हें कुछ और नहीं सूझता था. घरवालों के लाख समझाने पर भी जब वह नहीं माने और अपने सपने को पूरा करने के लिए मुम्बई आने की ठान ली तो उनके अब्बा अली मोहम्मद ने भारी दिल से उन्हें विदा करते हुए कहा था “अगर तुम कामयाबी हासिल नहीं कर सके तो घर नहीं लौटना. मैं भूल जाऊंगा कि रफी नाम का मेरा कोई बेटा भी था.” बाद में रफी गायक के रूप में जब कामयाब हो गए और उनकी शोहरत का डंका चारों ओर बजने लगा तब उनके अब्बा बहुत खुश हुए और मुम्बई आकर उन्हें अपना आशीर्वाद दिया.
२) परदे में रहने दो ….
हालांकि रफ़ी साहब ने एक-दो बार उन्होंने कैमरे का सामना किया, लेकिन वह भी फिल्म ‘लैला मजनूं’ में तेरा जलवा जिसने देखा… गीत में स्वर्णलता और नजीर के साथ समूह में। इसके अलावा कुछ पलों के रोल के लिए फिल्म ‘जुगनू’ में भी वह दिखाई पड़े, लेकिन इसके बाद उन्होंने कभी कैमरे के सामने आने की इच्छा नहीं जताई।
३ ) अतुलनीय आवाज़ के मालिक
रफी के बारे में हिंदी फिल्मों के जाने-माने संगीतकार अनु मलिक ने कहा कि शहद से ज्यादा मीठी आवाज वाले मोहम्मद रफी गायकी की दुनिया के एक ऐसे देवपुरुष थे, जिनकी तुलना न आज किसी से हो सकती है और न रहती दुनिया तक किसी से हो पाएगी.
४ ) बेटी को विदा करके गाया बाबुल की दुआएं लेती जा …. 
जिन्होंने भी बाबुल की दुआएं लेती जा सुना है वह उस आवाज़ के दर्द को नहीं भूल सकते | वास्तव में दर्द एक पिता का दर्द था | रफ़ी ने बाबुल की दुआयें लेती जा गीत अपनी बेटी को विदा करने के ठीक बाद स्टूडियो में आ कर गाया था | वो रासी आवाज़ , वो सिसकियाँ असली थी | जिसने उस गीत को अमर बना दिया |
५ ) पत्नी ने कभी नहीं देखा पति को गाते ………..
लोकप्रिय गायक रफ़ी जिनको लाइव सुनने के लिए भीड़ ईकट्ठी हो जाती | लोग एक एक सुर पर जान निसार करते | उनकी पत्नी ने अपने पति को कभी स्टूडियों में गाते नहीं देखा |
६ ) नौशाद की उनकी मृत्यु पर कविता ………..
कहता है कोई दिल गया, दिलबर चला गया
साहिल पुकारता है, समंदर चला गया।
लेकिन जो बात सच है, वो कहता नहीं कोई
दुनिया से मौसकी का, पयम्बर चला गया॥
यह पंक्तियां संगीतकार नौशाद ने उस समय कही थी, जब इस सदी के मशहूर गायक स्व. मोहम्मद रफी को दफनाया जा रहा था।
७ ) रफ़ी आवाज़ से अभिनय करते थे……… 
रफ़ी के बारे में साहिर लुधियानवी की ये पंक्तियाँ उनके गायन कौशल को स्पष्ट कर देती हैं | स्वरों के उतार -चढाव का फन जो रफ़ी की आवाज़ में था वो किसी दूसरे गायक में देखने को नहीं मिलता |
८ ) लता से हुआ मन -मुटाव ….
मोहम्मद रफ़ी को उनके परमार्थो के लिए भी जाना जाता है। अपने शुरुआती दिनों में संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल (लक्ष्मीप्यारे के नाम से जाने जाते थे) के लिए उन्होने बहुत कम पैसों में गाया था। गानों की रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर के साथ उनका विवाद भी उनकी दरियादिली का सूचक है। उस समय लताजी का कहना था कि गाने गाने के बाद भी उन गानों से होने वाली आमदनी का एक अंश (रॉयल्टी) गायकों तथा गायिकाओं को मिलना चाहिए। रफ़ी साहब इसके ख़िलाफ़ थे और उनका कहना था कि एक बार गाने रिकॉर्ड हो गए और गायक-गायिकाओं को उनकी फीस का भुगतान कर दिया गया हो तो उनको और पैसों की आशा नहीं करनी चाहिए। इस बात को लेकर दोनो महान कलाकारों के बीच मनमुटाव हो गया। लता ने रफ़ी के साथ सेट पर गाने से मना कर दिया और बरसों तक दोनो का कोई युगल गीत नहीं आया| बाद में नर्गिस के कहने पर दोनों ने साथ में गाना शुरू किया |

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