शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

रिया स्पीक्स : दादी चली पुरूस्कार लौटाने




रिया के घर में सन्नाटा पसरा हुआ है | रिया के माता पिता की आँखों में आँसू  हैं | उन्हें समझ नहीं आ रहा है ,आखिर माजी ने ऐसा फैसला किया तो क्यों किया ? कितना फक्र था उन्हें अपने पर | बाल काले से सफ़ेद हो गए  , आँखें धस गयी , दो की जगह तीन पैर हो गए | इतना सब कुछ बदल गया पर नहीं बदला तो सिर्फ  उनके मुंह से हर आने -जाने वाले के सामने गर्व से कहा जाने वाला ये वाक्य "  तुम आज कल के बच्चे हमें क्या पढाओगे हमको ऐसा वैसा नहीं समझो ,हमें भी उतरी -पूरा साहित्य पुरोधा सम्मान मिल चुका है | पर अब वो उसे ही वापस करने पर तुली हैं | आखिर क्यों ? रिया से अपने माता -पिता का दुःख और अपने मन में उठते प्रश्न सहे नहीं गए तो उसने दादी से डायरेक्ट पूंछने का मन बना लिया |
रिया दादी के कमरे में घुसते हुए : दादी मेरी प्यारी दादी आप पुरुस्कार क्यों लौटा रही है | मम्मी -पापा कितने दुखी हैं |
दादी : पेपर दिखाते हुए , हे ! शिव , शिव ,शिव , देखा नहीं सब लौटा रहे है |हम सब का साथ देंगे |  यही चलन है | रिया : हां दादी पर वो तो ........

दादी : हां पता है पता है , पर लौटाने की इस भीड़ में कौन देखेगा की किसने कौन सा पुरूस्कार लौटाया | मीडिया तो चिल्लाएगा | खबर आएगी , इसने पुरूस्कार लौटाया , उसने पुरुस्कार लौटाया , दादी ने भी पुरूस्कार लौटाया | अब चीखा - चिल्ली के बीच में कौन दिखिए  की किसने कौन सा पुरूस्कार लौटाया | फिर हम तो साहित्य का ही लौटा रहे हैं | बरसो पहले से यही चलन है | अश्वथामा  मारा गया .......... किन्तु हाथी | और किन्तु पर बज गया शंख .... अब मीडिया का शंख |
रिया : तो दादी आप यह सब चर्चा में आने के लिए कर रही हैं |
दादी : तो ? पुरूस्कार पाया भी तो चर्चा  में आबे  की खातिर ही था | बुडबक समझत नाही है | उस समय जितना प्रचार नहीं हुआ | उससे ज्यादा प्रचार अब होगा | जरा लौटाने की घोषणा भर कर दो | देखो , कैसें मीडिया भाव देता है | जिंदगी बीत गयी कभी अखबार के पन्ने पर नहीं आये | सब को ऐसें ही बतावत है की पुरूस्कार मिला , पुरूस्कार मिला | कौन जानता  है | पर अब जब अखबार के पहले पन्ने पर छपेगा तो पता तो चलेगा की कोई पुरूस्कार मिला है | और फिर कहेंगे सोचेंगे विचरेंगे लौटावे की नाही |
रिया : दादी पर आप को तो जमीन का एक टुकड़ा भी मिला था जिसको बेच कर पापा ने यह फ्लैट लिया है | ऐसा न करिए प्लीज | हम फूटपाथ पर आ जायेंगे |
दादी : किसी ने लौटाई है .... नहीं न | काहे  को डरत  हो बिटिया | कुछ नहीं होगा | बस नाम होगा | लोग हमें भी जान जायेंगे की हम साहित्यकार हैं  | इत्ता नाम तो पुरूस्कार लेते वक्त नाही हुआ जितना  अब हो रहा है |
रिया : अच्छा ! मेरी बुद्धिमान दादी आप बहती गंगा में हाथ धोना चाहती है |
दादी : अब समझी | लौटना का लौटना नहीं और नाम का नाम |
और दोनों हंस पड़ते हैं |




1 टिप्पणी:

  1. वंदना जी, आपने मिडिया पर सुन्दर कटाक्ष की है.| जो दिखाई जाती है वह असत्य है, जो नही दिखने वाला वह सत्य होता है। इस सत्य को पहचानने के लिए तीसरी आँख की जरूरत होती है. जो सब के पास नही होती. आप किसी भी महत्वपूर्ण तत्य को बड़े ही रोमांचकारी इतना स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत करती हैकि कहीं भी हो याद आते ही मुस्कुराहट की लम्बी रेखा खीँच जाती है. Nageswari Rao

    उत्तर देंहटाएं