शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

अटूट बंधन अंक -१० सम्पादकीय ...भावनात्मक गुलामी भी गुलामी ही है





कुछ खौफनाक जंजीरे
जो दिखती नहीं हैं 
पहना दी जाती हैं
अपनों द्वारा इस चतुराई से
कि मासूम कैदी
स्वयं ही स्वीकार कर लेता है बंधन
अंगीकार कर  लेता है पराजय
यहाँ तक  
कि  उसकी
सिसकियाँ ,घुटन ,मौन चीखे

नहीं लांघ पाती
कभी घर की देहरी
न ही उठती है
कभी मुक्ति कामना की आवाज़
हत भाग्य !किसी स्वतंत्र देश में भी
 नहीं की जा सकती गिनती
इन भावनात्मक  परतंत्र लोगो की




                १५ अगस्त सन १९४७ को हमारे देश भारतवर्ष को  ब्रिटिश  हुकूमत से स्वतंत्रता मिली | यह दिन हम सब के लिए अत्यंत प्रसन्नता का दिन है | आज स्वतंत्रता पर कुछ लिखने से पूर्व मेरा मन मनुष्य की एक खतरनाक वृत्ति पर जा रहा है | वो है दूसरे को परतंत्र बनाने की इक्षा | आज से अरबों –खरबों साल पहले जब पृथ्वी पर जीवन का पहला अंकुर  फूटा था तब कौन जानता था कि विकास के क्रम में शीर्ष पर आने वाला मानव अहंकार से इतना अधिक ग्रस्त हो जाएगा कि वो समस्त प्राणियों को ईश्वर द्वारा प्रदत्त स्वतंत्र अस्तित्व के नैसर्गिक अधिकार की अवहेलना करते हुए उनकी स्वतंत्रता  छीन कर उन्हें गुलाम बनाने में लग जाएगा | जिसका आरंभ  हुआ  प्रकृति को गुलाम बनाने की प्रवत्ति से , फिर पुशु –पक्षी , फिर एक कबीले द्वारा दूसरे कबीले को , एक सम्प्रदाय द्वारा दूसरे सम्प्रदाय को, एक रंग द्वारा दूसरे रंग वाले समूह को ,  एक देश द्वारा दूसरे देश को | सर्वश्रेष्ठ होने का अभिमान ,सत्ता का मद या  अधिपत्य की भावना  कितने सिकंदर ,गौरी ,गजनी या अंग्रेज़ हुक्मरानों  को फतह के छलावे से संतुष्ट करती रही | हमने उन्हें एक उपनाम से सुशोभित कर दिया ...... तानाशाह ,जो दूसरों को उनके अनुसार जीने न दे | पर आज मैं किसी और प्रकार के तानाशाह और गुलामों के बारे में कुछ कहना  चाहती हूँ |  
           समय के रथ पर सवार होकर जरा पीछे लौटती हूँ तो याद आता है कि जब मैं छोटी थी तब मेरे मन में गुलाम शब्द पढ़ या सुन  कर एक ऐसे निरीह व्यक्ति की तस्वीर खिचती थी , जिसके सामने  बहुत भयानक शक्ल वाला व्यक्ति (तानाशाह ) होता ,जिसके हाथ में हंटर होता और जुबान पर गालियाँ .......... जो बात –बात पर जोर –जोर से चिल्लाते हुए हंटर चलाता  और बेचारा गुलाम  हाथ जोड़ कर उसकी गलत सही हर बात मानने को तैयार रहता | किसी व्यक्ति का दूसरे व्यति से चाबुक के दम पर गुलामी करवाना निहायत निंदनीय है| हर व्यक्ति को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार है | ऐसे में गुलाम के प्रति सहानुभूति होना स्वाभाविक है | पर इससे इतर भी एक गुलामी होती है जिसकी कल्पना भी मेरा बाल मष्तिष्क नहीं कर पाया था | जहाँ तानाशाह के हाथ में चाबुक नहीं दूसरे को रुल बुक के अनुसार उसका कर्तव्य याद दिलाने  की अदृश्य किताब होती है |आँखों में दहकते अंगारे नहीं वरन  आँसू होते हैं , जुबान पर गालियाँ नहीं अपितु तुम्हारी वजह से ,या मुझे समझो के जुमले होते हैं | दूसरों को गुलाम बना कर रखने की प्रवत्ति की इनकी जंजीरे इतनी रहस्यमयी होती हैं कि स्वयं गुलाम बने व्यक्ति को भी  बहुत देर में अपनी दासता  के बारे में समझ आता है | यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने नाज़ुक जंजीरों से कोई कैसे गुलाम बन सकता है ? वस्तुतः कोई गुलाम नहीं बनना चाहता पर चाहे -अनचाहे  हममें  से बहुत से  संवेदनशील लोग भावनात्मक  रूप से गुलाम बन जाते हैं | अफ़सोस उन्हें गुलाम बनाने  वाला कोई तानाशाह नहीं वरन उनके  अपने ही जानने वाले ,मित्र ,नाते रिश्तेदार ,जीवनसाथी ,बच्चे यहाँ तक कि कभी –कभी पेरेंट्स भी होते हैं | कैसे ? जरा इन उदाहरणों पर गौर करिए |
१ ) पढ़ी  –लिखी सुरुचि जब आँखों में ढेर सारे सपने भर कर  सुशिक्षित पति के साथ ससुराल में आई थी तो उसे इस बात का जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि उसका पति उसे घर से बाहर निकलने का अवसर भी नहीं देगा | जब भी वो घर के बाहर जा कर कुछ काम करने की बात करती उसका पति आँखों में आंसूं भर कर कहता “जब तुम घर के बाहर जा कर काम करोगी कोई तुम्हे देखे  ,बात करे मैं बर्दाश्त नहीं कर पाउँगा |  क्योंकि मैं तुम्हे इतना प्यार करता हूँ जो पूरी दुनियाँ से अलग है अलहदा है | सुरुचि कभी –कभी विरोध करती पर पति के दुनियाँ से इतर प्यार व् आँसू उसे स्वयं ही घर में कैद रहने को विवश कर देते | सुरुचि गुलाम है प्रेम खोने के भय की |
२ )कॉलेज के हॉस्टल में प्रिया  के साथ रहने वाली कृति अक्सर उसे अपने बॉय फ्रेंड से ब्रेक अप के किस्से सुनाती | प्रिया उसके साथ सहानुभूति रखती ,समझाती पर वही बात रोज़ –रोज़ सुनने से प्रिया  की पढाई का नुक्सान होने लगा | एक दिन उसने कृति से मना  कर दिया | कृति ने तुरंत उसे “इनह्यूमन “ करार  दे दिया | साथ ही यह भी याद दिलाया कि वो एक अच्छी मित्र नहीं है ,क्योंकि जब प्रिया  के पिता बीमार थे तब तो उसने सुना था | प्रिया  के अन्दर कर्तव्य बोध  पैदा होगया उसने अपनी किताब एक तरफ रख कर कृति का हाथ पकड़ कर कहा ‘ सॉरी , बता क्या कहना चाहती है | प्रिया  गुलाम है कृति द्वारा सिद्ध किये गए कर्तव्य की |
३ )श्रीमती सावित्री देवी के पिता बचपन में ही भगवान् को प्यारे हो गए | गरीबी असफल विवाह की त्रासदी झेलने वाली सावित्री देवी अक्सर अपने बच्चो से रिश्ते –नातेदारों से व्  मिलने वालों से  कहती “ कम से कम तुम तो मेरी बात मानो ,मुझे तो पहले ही ईश्वर ने इतने दुःख दे रखे हैं | धीरे –धीरे  .... घर आई बहुओ और नाती –पोतो पर भी वह अपने पिछले दुखद जीवन का वास्ता   देकर गलत –सही बात मनवाने का दवाब डालने लगी | सावित्री देवी का यह कहना “जाओ तुम सब सुखी रहो ,हमें तो भगवान् नें पहले से ही दुःख दे रखे हैं ....... परिवार में सबके अन्दर अपराध बोध भर देता और वे सब उनकी हर जायज़ ,नाजायज बात मानने को तैयार हो जाते | यहाँ पूरा परिवार गुलाम है अपराध बोध का

        अलग –अलग दिखने वाले  इन सारे उदाहरणों में एक साम्यता है बिना हंटर बिना चाबुक बिना अपशब्द के दूसरे से अपनी बात मनवा लेना | यहाँ गुलाम बने लोग अपनी इक्षाओं ,भावनाओं ,सपनों को त्याग कर दूसरे के अनुसार जीवन जीने को विवश हो जाते है और अंततः खाली हाथ रह जाते हैं | यहाँ भावनात्मक रूप से गुलाम बने व्यक्तियों को समझ ही नहीं आता कि , अपनी बात मनवाने के लिए तमाशा ,रोने का नाटक ,या इमोशनल ब्लैक मेलिंग करने वाले व्यक्ति तानाशाह होते हैं | भावनात्मक रूप से तानाशाही करने  वाले व्यक्ति वास्तव में  पर्सनालिटी डिसऑर्डर से ग्रस्त होते हैं | ये शारीरिक रूप से भले ही कमजोर हों पर  इनकी प्रवत्ति गुलाम बनाने की होती है | शारिरिकं न सही मानसिक ही सही |बात जब तक समझ आती है तब तक गुलामों की हालत  बहुत दयनीय हो चुकी होती है | ये गुलामी बहुत ही पीड़ा दायक होती है क्योंकि ये अपनों के द्वारा होती है| अंग्रेजी में भावनात्मक गुलामों  की मानसिक अवस्था के लिए लिए  एक बहुत ही सटीक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है ....FOG ( फी यर(भय ) ,ओबलीगेशन सामाजिक कर्तव्यबोध ), गिल्ट(अपराधबोध  ) |
               बड़ा ही विरोधाभास है कि ये तीनो गुण एक अच्छे नागरिक के लिए अत्यंत आवश्यक हैं | डर वो शब्द है जिसे बच्चा जन्म लेते ही सीख जाता है | किसी हद तक यह जरूरी भी है क्योंकि भय के कारण विपरीत परिस्तिथि आने पर “करो या मरो’ कि भावना उत्त्पन्न होती है | पूरा हार्मोनल सिस्टम उसी के अनुरूप काम करता है | वहीँ समाज में रहने के लिए सामाजिक कर्तव्यबोध बहुत आवश्यक है | जो हमें समाज में एक अच्छे इंसान के रूप  में स्थापित करता है | हर कोई चाहता है कि लोग उसे अच्छा समझे उसकी सराहना करे | इसीलिए वह उन सब नियमावलियों का पालन करता है जो समाज द्वारा बनाये गए हैं | कहीं न कहीं अपराध बोध कर्तव्यबोध से जुडा  हुआ है |  मनुष्य को लगता है अगर वो घोषित कर्तव्यों को भली - भांति नहीं कर पा रहा है तो उससे गलती हो रही है | अपराध बोध उत्त्पन्न होता है |विडम्बना है कि दूसरों का भावनात्मक शोषण करने वाले भावनात्मक तानाशाह इन तीन नैसर्गिक गुणों का प्रयोग तीन मुंह वाले राक्षस  की तरह  इस प्रकार करते हैं कि गुलामों की स्वंतंत्र व्यक्तित्व की कामना को  धीरे से चबा ही डालते हैं| 
        पहेली ही है कि कोई क्यों अपनी चाभी दूसरे को पकड़ा कर भावनात्मक गुलाम बन जाता है |शायद इसके पीछे पुरानी कहावत है “अति सर्वत्र वर्जयेत “काम करती है  | जब भय इतना बढ़ जाए की “करो या मरो “में सिर्फ मरो ही रह जाए | इंसान परिस्तिथियों से इतना भयभीत हो जाए की फाईट करना ही न चाहे | यहाँ भावनात्मक तानाशाह दोषरोपण करके गुलाम बनाते हैं......... “तुम अगर काम पर जाओगी  तो मैं चैन से जी नहीं पाउँगा (उदहारण -१ )| जब  कर्तव्यबोध या  यूँ कहे कि समाजके सामने अच्छा दिखने की चाह इतना बढ़ जाए कि कोई इसका फायदा उठा कर अपनी अंगुली पर नचाये(उदाहरण -२ ) | और अपराधबोध इतना बढ़ जाए कि लगे अब अपनी जान देकर भी मुक्त नहीं हुआ जा सकता है | (उदाहरण -३ ) यहीं पर फाग की अवस्था शुरू होती है |          
          अधिकतर भावनात्मक  गुलाम इसी फाग में जीते हैं | निर्दोष सुरुचि ,प्रिया और सावित्री देवी के परिवार वाले इसी फाग में जी रहे हैं | या तो उन्हें खोने का भय होता है चाहे वो  व्यक्ति विशेष का प्रेम हो ,समाज में सम्मान हो, बच्चों या परिवार की सुरक्षा हो , या  उनके ऊपर कर्तव्यबोध का नैतिक उत्तरदायित्व जरूरत से ज्यादा होता है   ,यहाँ ख़ास बात यह है कि शोषक चाहे खुद कैसा भी जीवन जिए पर वो गुलाम पर दवाब डालता है कि वो रुल बुक के हिसाब से ही जीवन जिए ,तीसरे तरह के  गुलाम व्यक्ति अपराध बोध में जीते हैं कि उनकी वजह से दूसरे का जीवन बर्बाद हुआ है |  जिस तरह से फाग या धुंध  में कुछ भी दिखाई नहीं देता उसी तरह से अपनों द्वारा भावनात्मक रूप से गुलाम बनाये गए लोगों को बाहर  निकलने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता |वह समाज से कटने लगते हैं इस तरह से वो ज्यादा से ज्यादा उस व्यक्ति के संपर्क में होते चले जाते हैं जिसने उन्हें गुलाम बनाया होता है | उन का  मन नकारात्मक विचारों से भर जाता है |तसदी है कि  उन्हें पता होता है कि वो एक ट्रैप में फंस गए हैं | फिर भी भावनात्मक रूप से गुलाम बने व्यक्ति वो सब करने लग जाते हैं जो करने का उनका दिल गवाही नहीं देता | ये निराशा से ग्रस्त व्यक्ति साल दर साल झगडे से भरे घर , असफल विवाह और अन्य रिश्तों को ढोते हुए  , शारीरिक और मानसिक वेदना को सहन करते हैं ,घायल  पशु की तरह असहाय ,शक्तिहीन ,असंतुष्ट जीवन को घसीटते हैं | निराशा से घिरे इनमें से कितने लोग बाहर से सुखद लगने वाले इस दयनीय जीवन का स्वयं ही अंत कर देते हैं |  
         दुखद है कि जहाँ किसी को शारीरिक रूप से गुलाम बनाने के खिलाफ क़ानून हैं वहीँ  भावनात्मक् गुलाम बनाने के विरुद्ध कोई कानून नहीं है | और इस गुलामी से निकलने का रास्ता इंसान को खुद ही खोजना पड़ता है | और क्योंकि यह  लड़ाई अपनों से होती है इसलिए यह लड़ाई आसान नहीं होती हैं | बिरले ही खुद कृष्ण बन कर खुद को गीता का ज्ञान देते हुए बाहर निकल पाते हैं | ज्यादातर भावनात्मक गुलाम वही व्यक्ति बनते हैं जो संवेदनशील होते हैं और जो दूसरों के दुःख में समानुभूति (इ म्पैथी)की भावना  रखते हैं | जब कोई इन्हें अपना दुःख दर्द बताता है तो यह उस व्यक्ति की जगह खुद को रख कर सोचने लगते हैं | जिसका फायदा दूसरा व्यक्ति झूठ –सच बोल कर उठा लेता है | दूसरे को पीड़ा न पहुंचे इसके लिए यह पीड़ा उठाते जाते हैं | शायद इसीलिए कहा जाता है “बहुत  अच्छा होना भी बुरी बात है “| फिर भी स्वस्थ समाज यह मानने को तैयार नहीं होता कि किसे भावुक ह्रदय को भावनात्मक गुलाम बना कर उसे ऐसे पिंजरे में कैद किया जा सकता है जो दिखाई ही नहीं देता |
          अपने आस पास जरा गौर से देखिये भावनात्मक तानाशाहों को पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है |कभी न ,ना सुनना,सदैव अपनी मर्जी ही चलाना , रोने या दुखी होने का नाटक  करके अपनी बात मनवा लेना   भावनात्मक तानाशाहों  के लक्षण  हैं जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है | जरूरत है समय रहते ही झूठे लोगों और रिश्तों को पहचाना जाए | सच्चे रिश्ते व्यक्ति की स्वतंत्रता का ख्याल करते हैं व् उसके गुणों को विकसित  करने में सहायता करते हैं | जब  सच्चे रिश्ते जीवन में आते हैं वो मुस्कराहट और ख़ुशी  के साथ आते हैं न कि रोने –धोने  चीखने –चिल्लाने या दूसरे के रिश्तेदारों की अवहेलना के नाटक के साथ | यहाँ यह भी मान लेना चाहिए कि कोई भी रिश्ता परिकथा की तरह परफेक्ट नहीं होता है पर सच्चे रिश्तों में ख़ुशी और मुस्कान का प्रतिशत रोने और दर्द से ज्यादा  होता है |   
         गुलामी कोई भी हो प्रकृति के  विरुद्ध है | उससे  मुक्त होना  आवश्यक है |अगर आप भी ऐसे किसी ट्रैप में फंस गए हैं तो स्वतंत्र होने का प्रयास करिए |  टूटे हुए कांच को जितनी बार जोड़ने का प्रयास करेंगे उतनी बार घायल होंगे | यहाँ यह भी ध्यान  देने योग्य बात है कि आपका भावनात्मक व् झट से पिघल जाने वाला  स्वभाव उनका हथियार है | आप जितनी बार उनको खुश करने के लिए उनकी बात मानते जायेंगे वो अपनी सीमाएं और बढाते जायेंगे और ज्यादा उग्र होते जायेंगे | जंजीरे कोई भी हो दर्दनाक ही होती हैं | याद रखिये अपने अस्तित्व का सम्मान और व्यक्तित्व की स्वतंत्रता आप का जन्मसिद्ध अधिकार है | और उसे प्राप्त करना आप का कर्तव्य भी |


सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 

वंदना बाजपेयी 

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