शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

धर्म में घृणा के लिए स्थान नहीं

एक मुझे स्मरण आता है कि एक आदमी एक घर में शब्दकोश बेचने के लिए गया है, डिक्शनरी बेच रहा है। घर की गृहिणी ने उसे टालने को कहा है कि शब्दकोश हमारे घर में है, वह सामने टेबल पर रखा है। हमें कोई और जरूरत नहीं है। लेकिन उस आदमी ने कहा कि देवी जी, क्षमा करें! वह शब्दकोश नहीं है, वह कोई धर्मग्रंथ मालूम होता है।

स्त्री तो बहुत परेशान हुई। वह धर्मग्रंथ था! पर दूर से टेबल पर रखी किताब को कैसे वह व्यक्ति पहचान गया? तो उस गृहिणी ने पूछा, कैसे आप जाने कि वह धर्मग्रंथ है? उसने कहा, उस पर जमी हुई धूल बता रही है। शब्दकोश पर धूल नहीं जमती। रोज उसे कोई खोलता है, देखता है, पढ़ता है। उसका उपयोग होता है। उस पर इतनी धूल जमी है कि निश्चित कहा जा सकता है कि वह धर्मग्रंथ है!
सब धर्मग्रंथों पर बड़ी धूल जम जाती है। क्योंकि न तो हम उसे जीते हैं, न उसे जानते हैं। फिर धूल इकट्ठी होती चली जाती है। सदियों की धूल इकट्ठी हो जाती है। उस धूल में से पहचानना ही मुश्किल हो जाता है कि क्या क्या है।
इसलिए मैंने महावीर और अपने बीच शास्त्र को नहीं लिया है, उसे अलग ही रखा है। महावीर को सीधे ही देखने की कोशिश की है। और सीधे हम सिर्फ उसे ही देख सकते हैं, जिससे हमारा प्रेम हो। जिससे हमारा प्रेम न हो, उसे हम कभी भी सीधा नहीं देख सकते। और वही हमारे सामने पूरी तरह प्रकट होता है, जिससे हमारा प्रेम हो।
जैसे सूरज के निकलने पर कली खिल जाती है और फूल बन जाती है, ऐसा ही जिससे भी हम आत्यंतिक रूप से प्रेम कर सकें, उसका जीवन बंद कली से खुले फूल का जीवन हो जाता है। जरूरत है कि हम प्रेम कर पाएं। जरूरत ज्ञान की कम है। ज्ञान तो दूर ही कर देता है। और ज्ञान से शायद ही कोई कभी किसी को जान पाता हो। इनफर्मेशन, सूचनाएं बाधा डाल देती हैं। सूचनाओं से शायद ही कोई कभी किसी से परिचित हो पाता हो। वे बीच में खड़ी हो जाती हैं, वे पूर्वाग्रह बन जाती हैं, पक्षपात बन जाती हैं। हम पहले से ही जानते हुए होते हैं। जो हम जानते हुए होते हैं, वही हम देख भी लेते हैं।
जो महावीर को भगवान मान कर जाएगा, उसे महावीर में भगवान भी मिल जाएंगे, लेकिन वे उसके अपने आरोपित भगवान होंगे। जो महावीर को नास्तिक, महा नास्तिक मान कर जाएगा, उसे नास्तिक, महा नास्तिक भी मिल जाएगा। वह नास्तिकता उसकी अपनी रोपी हुई होगी। जो महावीर को जो मान कर जाएगा, वही पा लेगा। क्योंकि गहरे में अंततः हम अपनी ही मान्यता को निर्मित कर लेते और खोज लेते हैं। और व्यक्ति इतनी बड़ी घटना है कि उसमें सब मिल सकता है। फिर हम चुनाव कर लेते हैं। जो हम मानते जाते हैं, वह हम चुन लेते हैं। और तब जो हम जानते हुए लौटते हैं, वह जानता हुआ लौटना नहीं है, वह हमारी ही मान्यता की प्रतिध्वनि है।
प्रेम के जानने का रास्ता दूसरा है, ज्ञान के जानने का रास्ता दूसरा है। ज्ञान पहले जान लेता है, फिर खोज पर निकलता है। प्रेम जानता नहीं, खोज पर निकल जाता हैअज्ञात में, अननोन में, अपरिचित में। प्रेम सिर्फ अपने हृदय को खोल लेता है। प्रेम सिर्फ दर्पण बन जाता है, कि जो भी उसके सामने आएगाजो भी; जो है, वही उस में प्रतिफलित हो जाएगा। इसलिए प्रेम के अतिरिक्त कोई कभी किसी को नहीं जान सका है। और हम सब ज्ञान के मार्ग से ही जानने जाते हैं, इसलिए नहीं जान पाते हैं।
महावीर को प्रेम करेंगे तो पहचान पाएंगे। कृष्ण को प्रेम करेंगे तो पहचान पाएंगे। और भी एक मजे की बात है कि जो महावीर को प्रेम करेगा, वह कृष्ण को, क्राइस्ट को, मोहम्मद को प्रेम करने से बच नहीं सकता। अगर महावीर को प्रेम करने वाला ऐसा कहता हो कि महावीर से मेरा प्रेम है, इसलिए मैं मोहम्मद को कैसे प्रेम करूं? तो जानना चाहिए कि प्रेम उसके पास नहीं है। क्योंकि अगर महावीर से प्रेम होगा तो जो महावीर में उसे दिखाई पड़ेगा, वही बहुत गहरे में मोहम्मद में, कृष्ण में, क्राइस्ट में, कन्फ्यूशियस में भी दिखाई पड़ जाएगा, जरथुस्त्र में भी दिखाई पड़ जाएगा।
प्रेम प्रत्येक कली को खोल लेता है। जैसे सूरज प्रत्येक कली को खोल लेता है, पंखुड़ियां खुल जाती हैं। और तब अंत में तो सिर्फ फ्लावरिंग रह जाती है। पंखुड़ियां गैर अर्थ की हो जाती हैं, सुगंध बेमानी हो जाती है, रंग भूल जाते हैं। अंततः तो प्रत्येक फूल में जो घटना गहरी रह जाती है, वह है फ्लावरिंग, वह है उसका खिल जाना।
महावीर खिलते हैं एक ढंग से, कृष्ण खिलते हैं दूसरे ढंग से। लेकिन जिसने फूल के खिलने को पहचान लिया, वह इस खिलने को सारे जगत में सब जगह पहचान लेगा। इन व्यक्तियों में से एक से भी कोई प्रेम कर सके तो वह सबके प्रेम में उतर जाएगा।
लेकिन दिखाई उलटा पड़ता है। मोहम्मद को प्रेम करने वाला महावीर को प्रेम करना तो दूर, घृणा करता है! बुद्ध को प्रेम करने वाला क्राइस्ट को प्रेम नहीं कर सकता है! तब हमारा प्रेम संदिग्ध हो जाता है। इसका अर्थ है कि यह प्रेम प्रेम ही नहीं है, शायद यह भी गहरे में कोई स्वार्थ है, कोई सौदा है। शायद हम अपने प्रेम के द्वारा भी महावीर से कुछ पाना चाहते हैं! शायद हमारा प्रेम भी एक गहरे सौदे का निर्णय है, हम कुछ बार्गेनिंग कर रहे हैं। हम यह कह रहे हैं कि हम इतना प्रेम तुम्हें देंगे, तुम हमें क्या दोगे?
और तब हम अपने प्रेम में संकीर्ण होते चले जाते हैं। और प्रेम धीरे-धीरे इतना सीमित हो जाता है कि घृणा में और प्रेम में कोई फर्क नहीं रह जाता। क्योंकि जो प्रेम एक पर प्रेम बनता हो और शेष पर घृणा बन जाता हो, वह एक पर भी कितने दिन तक प्रेम रहेगा? क्योंकि घृणा हो जाएगी बहुत। महावीर को प्रेम करने वाला महावीर को प्रेम करेगा और शेष सबको अप्रेम करेगा। अप्रेम इतना ज्यादा हो जाएगा कि यह प्रेम का बिंदु कब विलीन हो जाएगा, पता भी नहीं चलेगा।
मैंने सुना है, एक महिला थी बर्मा में, वह बुद्ध की प्रेमी थी। और उसने बुद्ध की एक स्फटिक प्रतिमा बना ली थीछोटी, अति सुंदर। वह निरंतर उसे अपने साथ रखती। हो सकता है किसी दिन सुबह पूजा में, गांव में मंदिर न हो बुद्ध का, तो वह मूर्ति को साथ ही रखतीवह निरंतर साथ रखती।
फिर वह एक गांव में आई, जहां हजार बुद्धों का मंदिर था, जहां एक ही मंदिर में बुद्ध की हजार प्रतिमाएं थीं। वह उस मंदिर में ठहरी। सुबह जब वह पूजा के लिए अपनी मूर्ति रखी और जब उसने धूप जलाई, तो उसे खयाल आया कि यह धूप मेरे बुद्ध को तो मिलेगी ही मिलेगी, लेकिन दूसरे बुद्धों की जो प्रतिमाएं बैठी हैं, उनको भी यह धूप मिल जाएगी! क्योंकि धूप को कोई बांधा तो नहीं जा सकता। और ऐसा भी हो सकता है कि मेरे बुद्ध को धूप मिले ही न, क्योंकि हवाओं का क्या भरोसा! और धूप उड़ कर दूसरे बुद्धों को मिल जाए! यह तो उसके प्रेम के लिए संभव न था। संकीर्ण था प्रेम।
तो संकीर्ण प्रेम बुद्ध को प्रेम करे, महावीर को घृणा करे, ऐसा ही नहीं, बुद्ध की भी प्रतिमा को, एक प्रतिमा को प्रेम करने लगता हैवह भी खास प्रतिमा को!
अब जैनों में दिगंबर हैं, श्वेतांबर हैं। महावीर की एक ही प्रतिमा को दिगंबर नंगा करके पूजा करेंगे, श्वेतांबर आंखें लगाएंगे, शृंगार करेंगे, फिर पूजा करेंगे! इस पर भी झगड़ा हो जाएगा। दिगंबर वाली प्रतिमा की श्वेतांबर पूजा नहीं कर सकते, श्वेतांबर वाली प्रतिमा की दिगंबर पूजा नहीं कर सकते! और प्रतिमा एक है! लेकिन अपना आरोपण कर लेंगे, तब वह अपनी होगी! महावीर की प्रतिमा का उतना सवाल नहीं है।
तो उस स्त्री को भी बड़ी बेचैनी हुई कि यह कैसे हो? तो उसने धूप नहीं जलाई, उसने पहले टीन की एक पोंगरी बनाई और उस पोंगरी को धूप के ऊपर रखा, और फिर धुएं को पोंगरी से अपने बुद्ध की नाक तक पहुंचाया! लेकिन तब उसके बुद्ध का मुंह काला हो गया! और तब वह बहुत पछताई, बहुत रोई; क्योंकि बुद्ध का मुंह काला हो गया। और वह उस मंदिर के बड़े पुजारी से मिलने गई और उसने कहा कि मेरे बुद्ध का मुंह खराब हो गया! तो उस पुजारी ने कहा, संकीर्ण प्रेम सदा ही उसका मुंह खराब कर देता है, जिससे प्रेम करता है। इतना संकीर्ण प्रेम होगा तो जिससे तुम प्रेम करती हो, उसका चेहरा भी काला हो जाएगा।
संकीर्ण लोगों ने महावीर की प्रतिमा भी काली कर दी है, मोहम्मद की भी, बुद्ध की भी, कृष्ण की भीसबकी प्रतिमाएं काली कर दी हैं! क्योंकि संकीर्ण प्रेम घृणा का ही एक रूप है। जितना प्रेम संकीर्ण होगा, उतना ही घृणा से भर जाता है। और जब चारों तरफ घृणा होगी तो यह असंभव है, घृणा के बड़े सागर में प्रेम की छोटी सी बूंद को कैसे बचाया जा सकता है? वह तो प्रेम के बड़े सागर में ही प्रेम की बूंद बच सकती है।
यह हमें ध्यान होना चाहिए कि प्रेम के बड़े सागर में ही प्रेम की बूंद बच सकती है। घृणा के बड़े सागर में प्रेम की बूंद नहीं बचाई जा सकती है। लेकिन हम चाहते यह हैं कि हमारी प्रेम की बूंद बच जाए और शेष घृणा का सागर हो!
ओशो प्रवचन से 


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