शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

चलो चले जड़ो की ओर : अशोक परूथी

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माँ देश में बेटे के बिछोड़े में अकेली रोती तो है लेकिन इसका हल क्या है। उसे अपने साथ विदेश भी ले जाओ लेकिन उसका मन वहाँ नही लगता। अपने बेटों या बेटियों के पास भी उसका दिल नही लगता, उसका मन तो बस उसी मिट्टी में बसा रहता है जहां वह पल्ली और बड़ी हुयी होती है ...जिसे वह अपना देश और अपना घर कहती है ...उससे अपनी सभ्यता, अपनी भाषा, अपनी गालियां, अपना घर, एक एक पाई इकठी कर जुटाई चीज़े से लगाव ...अमिट रहता है। अपनी संतान से जुदाई भी उससे सहन नही होती और अपने वतन की मिट्टी में भी वह मिट्टी होकर रह जाना चाहती है। यह कैसी विडम्बना है - एक तरह अपनी संतान का प्यार, मोह, सुख और लगाव और दूसरी और अपने वतन की मिट्टी जो उसे न इधर का छोडती है न उधर का!
यह तो था किस्सा उन माता पिता का जिनके बच्चे विदेश रहते है, उनके बच्चे अपनी रोज़ी-रोटी के कारण विदेश तो छोड़ नही सकते और अपने माँ-बाप को भी अपने पास बुला लेते हैं लेकिन माँ-बाप का वहाँ दिल नही लगता !

लेकिन, मुद्दा भारत में रहने वाले बजुर्गों का है । आज सयुंक्त परिवार नही रहे - कारण वित्य (financial) हो सकते हैं या बहू -बेटियों की निजी आज़ादी का मसला हो सकता है या इसे हम पश्चमी सभ्यता का प्रभाव भी कह सकते हैं। यही हाल विदेशियों का भी है उन्हें अपने माँ-बाप तभी याद आते हैं जब उन्हें अपने बच्चो को रखने के लिए 'माई' की याद आती है - यह बड़े दुख की बात है !
मेरे पिता कहा करते थे- देखो, एक माँ-बाप का जोड़ा अपने पाँच -या छह (संतान) को पालने -पोषने में क्या क्या कुरबानिया देता है, उनकी पढ़ाई , उनके लालन-पालन में अपना सब सुख-आराम और धन सब कुछ वार कर देता है । यही नही उन्हें अच्छी शिक्षा देने के ईलावा अपने सुखी भविष्य की परवाह न करते हुये अपने बचे-खुचे धन को भी उनकी शादियों पर खर्च कर देता है और फिर यह नतीजा - यह सारे स्मारिद्ध बच्चे - जो आज डाक्टर, इंजनीयर, वकील या किसी सफल व्यवसाय में ही क्यूँ न हों - सारे के सारे, सब के सब , मिलकर भी अपने एक माता-पिता का उनकी वृद्धावस्था में दायित्व नही लेते या ले सकते!

मेरे बच्चो, मेरे भाईयो अपने माँ-बाप के लिए कुछ न करो एक्सट्रा करो, अगर उनसे दूर भी रहते हो तो थोड़ा समय निकाल कर उन्हे मिल ज़रूर आया करो और अगर यह भी मुमकिन नही तो उन्हें कभी -कभार फोन ही कर उनका हल-चाल पूछ लिया करो , बस इस्सी में माँ-बाप खुश हो जाते हैं - बस इतना तो हम सबका फर्ज़ बंता है ....भगवान हमसबको सतबुद्धि दे और इस दिशा में ठोस कदम उठाने का साहस दे ...नही तो कल हम भी बूढ़े होंगे ...हमारा भी यही अशर होगा जो आज हमारे जीवन देने वालों का हो रहा है । बदनसीब, हैं वह लोग जिंहे अपने माता-पिता का आशीर्वाद नही मिलता ! 
ताकि समय निकाल जाने के बाद आपका यह गि"ला न रहे -
मामा -पापा , प्लीज़ मुझे एक बार और अपने गले लगा लो!"


अशोक परूथी  

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