रविवार, 6 सितंबर 2015

मैं कहाँ जा रहा हूँ







प्रेरक कथा
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मैं कहाँ जा रहा हूँ ...........
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एक बार आइंस्टाइन प्रिंसटन से रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे. जब टिकट चेक करने वाला रेल अधिकारी उनके पास आया और उनसे टिकट माँगा उन्होंने अपने कोट की जेब में हाथ डाला, लेकिन टिकट वहां नहीं मिला. अब तो वे बदहवास हो टिकट ढूंढने लगे. कभी कोट तो कभी पतलून की जेब तो कभी ब्रीफकेस में. टिकट कहीं नहीं था. अब आइंस्टाइन पास वाली ख़ाली सीट झाड़ने लगे. टिकट चेकर उन्हें छोड़ आगे बढ़ गया. उसने देखा कि इतना बड़ा वैज्ञानिक परेशानी में फ़र्श पर बैठ बर्थ के नीचे टिकट खोज रहे हैं और टिकट था कि मिल ही नहीं था.टिकट चेकर बोला - सर आप परेशान मत हों. आप आइंस्टाइन साहब हैं , मैं आप को अच्छी तरह से जानता हूँ. मुझे यह भी पता है कि आप ने टिकट जरुर लिया होगा. कोई बात नहीं. रहने दीजिए, परेशान मत होइए .
आइंस्टाइन ने टिकट चेकर से कहा - बात सिर्फ टिकट की नहीं है. मुझे याद ही नहीं आ रहा है कि आखिर मैं जा कहाँ रहा हूँ.
सचमुच हम में से ज्यादा लोगों को यही प्रश्न अपने आप से करना चाहिए. हम अपना जीवन यूँ ही जीते चले जाते हैं लेकिन हमें यह पता नहीं होता है कि हम कहाँ जाने के लिए निकले थे. अतः अपनी यात्रा शुरू करने से पहले अपने लक्ष्य को भली -भांति जान लेना चाहिए चाहे वह कोई सफ़र हो या जीवन की डगर.

प्रेरक कथाओं से साभार 


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