मंगलवार, 29 सितंबर 2015

डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' की लघुकथाएं


समझौता
"आज फिर वही साड़ी ! कितनी बार कहा है तुम्हें..इस साड़ी को मत पहना करो ! तुम्हें समझ नहीं आता क्या !"
"यही तो फर्क है एक स्त्री और पुरुष की सोच में ! तुम अपनी पहली पत्नी की तस्वीर दीवार पर टांग सकते हो , उसकी बाते मुझसे कर सकते हो ! और तो और हर साल उनके नाम का श्राद्ध भी करते हो जिसमें मैं पूर्णतया तुम्हें सहयोग करती हूँ ।
बिना कुछ कहे क्योंकि मैं तुम्हारे गहन प्रेम की अनुभूति को समझती हूँ और तुम ! मेरे स्वर्गवासी पति की दी गयी साड़ी में मुझे देख भी नहीं सकते !!
च में, पुनर्विवाह एक समझौता ही तो है !



डिनर
रेस्टोरेंट लोगों से खचाखच भरा हुआ था | सामने वाली टेबल पर निशांत, विधि के सामने बैठा उसे निहारे जा रहा था...दोनों आँखों में आँखें डाल दुनिया भुलाए बैठे थे | कैंडिल लाईट डिनर बेहतरीन  करिश्मा दिखला रहा था | उन्हें देख साफ़ मालूम पड़ रहा था कि यह नवविवाहित जोड़ा है | 
”क्या लोगी बताओ न ?” निशांत के शब्दों से मिश्री टपक रही थी |
“जो आप मंगवाएंगे खा लूँगी |” विधि नज़रे झुकाए बोली | खुबसूरत मुस्कान अधरों पर अपना भरपूर असर छोड़ रही थी | दोनों का प्यार अपने पूरे शबाब पर था |
उधर ईश्वर की पत्नी जमुना अपने छोटे छोटे बच्चों में उलझी हुई थी ! कभी छुटकू दाल फ्राई में अंगुलियाँ डालने की कोशिश करता, कभी मुन्नू पूरी एक चपाती हाथ में लेकर खाने की जिद करता ! 
“आगे से कभी नहीं लाऊंगा तुम लोगों को ! उह्ह ! इज्जत का कचरा कर के रख दिया ! अब मेरा मुँह क्या ताक रही है संभाल अपने लाडलों को ! देख उसने दाल खुद के कपड़ों पर गिरा ली !! ”बहुत ही धीमे स्वर में बोला ईश्वर |
“हाथ में पकड़े कोर को जोर से पटककर जमुना वहां से उठ गयी | “क्या बोले ! इन दोनों को तो मैं अपने मायके से साथ लाई हूँ न ! खाओ तुम ही मैं तो चली !”जमना फुसफुसाकर बोली |
“अब बैठ भी जा ! नखरे मत मार ! हज़ार रूपये का चूना लगवाएगी क्या !!”ईश्वर की आवाज़ और धीमी हो चली थी | जैसे तैसे दोनों ने खाना खत्म किया |  बिल चुकाने के लिए ईश्वर और निशांत  एक साथ काउंटर पर खड़े हुए | एक की आँखों में प्यार बेशुमार था दूसरे की आँखों में गुस्सा अपने पूरे यौवन पर था !”



अश्कों से लिखा एक खत   
हाँ... साँसे ले रही हूँ | जिन्दा हूँ अभी | कभी मेरा खूबसूरत चेहरा तुम्हारी रातों की नींदें चुरा लिया करता था क्योंकि अथाह प्रेम करते थे तुम मुझसे | मगर मैं नहीं...इसलिए जब मैंने तुम्हारा प्रेम प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो तुम कितने आगबबूला हो उठे थे ! नहीं चाहते थे तुम कि मैं किसी और की हो जाऊं... इसलिए तुमने मेरे चेहरे पर उस रात तेज़ाब छिड़क दिया !!! तरस गयी हूँ अपने ही चेहरे को देखने के लिए ! आईना देखे बरस बीत गए | यह आजीवन पीड़ा जो तुम मुझे दे कर गए हो न उसका आंशिक भाग भी तुमने कभी महसूस नहीं किया होगा जानती हूँ मैं ! सच्चे प्यार का दंभ भरने वाले अगर तुम सही में एक सच्चे प्रेमी हो तो क्या अब मुझसे विवाह कर पाओगे ? तुम्हारा जवाब न ही होगा | मालूम है मुझे | 

डिम्पल गौड़ ‘अनन्या’
  

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