गुरुवार, 3 सितंबर 2015

भावनाओ का अंतराल ही अंतराल ( कहानी -शिवानी कोहली )









‘भावनाओं का अंतराल ही अंतराल’

2007, चंडीगढ़ की उम्दा खिलाड़ी. “बेस्ट प्लेयर” का खिताब मिला उसे. माता-पिता, एक छोटा भाई. यही परिवार था उसका. खेलने की शौकीन और हर काम में प्रशस्त. 2006 में वो पंजाब विश्व विद्यालय के खेल विभाग में दाखिला लेने के लिए आई. उसका नाम योग्यता सूची में सबसे ऊपर था....

मेरी उससे मुलाकात 2006 की जुलाई में हुई थी शायद. तारीख तो याद नही पर इतना ज़रूर स्मरण है कि मुझे अपने छात्रावास के कमरे का कुछ पता नही चल रहा था. नयी थी. तो कुछ ने मुझे उल्लू बना कर मेरा लुतफ भी उठाया.
“सुनो, तुम्हारा कमरा चौथी मंज़िल पर है.”
मुझे लगा कि शायद ये भी मुझे उल्लू बना रही है. तो मैं तीसरी मंज़िल पर ही उतर गयी. पर नही, मुझे चौथी मंज़िल पर ही जाना था. फिर मुझे रैंप से जाना पड़ा. वो मुझसे पहले ही वहाँ पहुँच चुकी थी और मुझे रैंप से आते देख कर हँसने लगी.
‘मैने कहा था ना, चौथी मंज़िल....’ वो बोली.
‘नही… मुझे लगा कि तुम भी बाकियों की तरह मेरा मज़ाक बना रही हो, तो.....’ मैने झिझकते हुए कहा.
‘खैर छोड़ो. उस तरफ है तुम्हारा कमरा.’.
‘धन्यवाद.’
वो मुस्कुराती रही.....

वो छात्रावास में कभी-कबार दिख जाया करती थी. अक्सर सुबह नाश्ते के समय या फिर रात को कामनरूम में टी.वी. देखते समय. सास-बहु सीरियल्स की बहुत शौकीन थी वो. याद है मुझे, जब ‘छोटी बहू’ आता था. वो और मेरी छोटी बहन, श्वेता तौबा....तौबा..... ये दोनो तो पहले वाले सोफे से हिलती ही नहीं थी. और ना ही किसी और को रिमोट देती थी. कई बार तो इस बात पर हंगामा भी हुआ. पर एक पंजाबन और दूसरी हरयान्वी. कोई पंगा ले भी तो कैसे. मैं सोनिया से जब पहले मिली थी तो मुझे ये नही पता था कि वो श्वेता को जानती है. फिर कामनरूम में हम मिलने लगे. तो बस मुलाक़ातें बढ़ने लगीं. और बातें भी. पूरा साल बीत गया और हम पक्के दोस्त बन गये. घर से कुछ भी आता तो हम दोनो के लिए नही बल्कि तीनो के लिए.
स्पोर्ट्स मीट 2007, सोनिया को चंडीगढ़  की  सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार दिया गया. हम बहुत ही खुश. तब सोनिया ने मुझे बिट्टू के बारे में बताया. तब तक हम एक दूसरे के बारे में सब जानते थे सिवाए इस बात के. उसने बताया कि वो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. उस दिन उसने मेरी, बिट्टू से फोन पर बात भी करवाई. वो मुझे पहले से ही जानता था. सोनिया ने पहले ही बिट्टू को मेरे बारे में बहुत कुछ बता रखा था. बात करने पर वो मुझे सोनिया के लिए ठीक लगा और जैसे सोनिया बताती थी कि वो उसका बड़ा ही ध्यान रखता है ठीक वैसा ही मुझे उससे बात करके लगा. श्वेता के लिए जैसे चिंतित होती वैसे ही सोनिया के लिए भी थी. मैने सोनिया से उसके और बिट्टू के बारे में पूछा. फिर उसने कुछ यूँ बताया..
“मैं 10वीं में थी जब वो हमारे घर रहने के लिए आया था. और फिर मुझे घर में ही पढ़ाने भी लगा. और बस धीरे-धीरे हम कब प्यार की पढ़ाई पढ़ गये हमें ही नही पता चला. मुलाक़ातें कब प्यार में बदल गयी कुछ पता ही नही चला.”
(मैं प्यार को नायाब तोहफा मनती हूँ. मेरी भी एक प्यार की दुनिया है जिसे मैं सिर्फ़ सोचा करती हूँ. काश कोई होता, जिससे मैं बातें करती, दिल का हर हाल बयान करती, जीवन भर साथ रहने की कस्में खाते और... साथ साथ रहते. पर मेरे लिए वो हमेशा एक स्वपन ही रहा है. आज भी एक स्वपन ही है.....)
“मैं चंडीगढ़ आई और फिर हम यहाँ पर मिलने लगे. मेरी दुनिया बिट्टू के साथ बसने लगी. ये नही कि हमने कही किसी मौके का कोई ग़लत लाभ उठाया हो.  नही... एक तो मुलाकात 2-3 महीने के बाद होती थी और जब होती थी तो सिर्फ़ कुछ समय के लिए जिसमें हमारी बातें ही ख़तम नही होती थी. अब आलम ये है कि हम दोनो एक दूसरे के बिना रह नही सकते.”


सोनिया की बातें सुन कर मैं खुश थी कि मेरी सहेली ने जिस इंसान को चुना है वो उसका साथ निभा रहा है. एक बात की चिंता भी थी. यदि उसके माता-पिता नही माने तो… मैने सारी बात सुनी और उसे खुश देख कर मैं भी बहुत खुश हुई. भीतर के भंवर को वहीं शांत करना मुनासिब समझा. सोनिया की एम. एड. हो गयी और मेरी एम. ए. सोनिया को साथ ही नौकरी मिल गयी नवोध्या विद्यालय  में और मैं कुछ समय के लिए घर चली गयी. 4-5 महीनो के बाद मेरी नौकरी “राय्टर्स” में लग गई और मैं मोहाली आ गयी. मेरे यहाँ आने के बाद मुझे पता चला की सोनिया चंडीगढ़ में है. मैने उसे फोन किया और मिलने के लिए बुलाया. बहुत समय के बाद मिलना हो रहा था इसलिए हम दोनो बहुत खुश थी. हम वहीं छात्रावास में ही मिले. वहाँ श्वेता भी थी. फिर वही मस्ती के दिन याद आ गये. तब मैने दोबारा से बिट्टू का ज़िक्र किया.
‘उसके घर वालों को पता चल गया है और वो शादी के लिए कह रहे हैं....’
‘तो इसमें दिक्कत क्या है.’ मैने पूछा.
‘दिक्कत ये है कि मेरे घर पर इस विवाह के लिए सहमति नही दे रहे. उनका कहना है कि जात-बिरादिरी क्या कहेगी कि जो लड़का किराए पर रहता था उसी के साथ नैन मटक्का. उपर से जींद, हरयाणा का वो क्षेत्र है जहाँ जात-पात को बड़ा महत्व दिया जाता है और ऐसे रिश्तों के बीज पड़ने से पहले ही उन दानों को फैंक दिया जाता था.’
‘अरे…! कैसे ज़माने में रहते है वहाँ के लोग. तू अपने घर में बात क्यूँ नही करती.’
‘की थी, तो पिताजी बोले यदि ऐसा काम करना है तो इस घर मे तेरे लिए कोई जगह नही है. मैने अभी घर में और कुछ नही कहा है. बिट्टू से बात करूँगी तो शायद कोई समाधान निकल आए.’
‘ठीक है. देखते है क्या होता है. मेरी कोई मदद चाहिए हो तो संकोच मत करना.’
(डर को कब तक छुपाया जा सकता है. कभी ना कभी तो उसका सामना करना ही पड़ेगा. भीतर के भंवर को शांत रहने के लिए कह दिया था मैने. पर अब वो विराट हो कर बाहर निकल रहा है. अब प्रतीक्षा के इलावा और कोई विकल्प नही था.)
वो एक दिन की मेरी, सोनिया से मुलाकात और फिर वो अपनी नौकरी पर और मैं अपनी पर..

एक लंबा अंतराल......

‘हेलो, शिवानी मैडम. कुछ पता चला. सोनिया .....’
इससे पहले कि योगेश कुछ कहता मैने बीच में ही टोक दिया....
(योगेश सोनिया के साथ उसी के विभाग में था. उसका मुह-भोला भाई. कुशाग्र बुद्धि वाला. हर बात में आर-पार के फैंसले ही करता. हम चारों एक दूसरे की दुविधाओं को सुन भी लिया करते थे और उनपर अफ़सोस भी कर लिया करते थे.)

’क्या हो गया सोनिया को. वो ठीक तो है ना. कही उसने कुछ....’
‘नही, पहले मेरी पूरी बात तो सुनिए.’ योगेश ने मुझे टोकते हुए कहा.
‘सोनिया के पिताजी का कल देहांत हो गया है.’
‘क्या....?? निशब्द मैं..कुछ भी ना बोल सकी..’
‘हाँ, मैने श्वेता मैडम से भी बात की. हमें सोनिया के पास जाना चाहिए..’
‘जी बिलकुल. हम कल ही चलेंगें.’
कमरे के कोने में सुन्न पड़ा एक शरीर जिसकी आँखों के आँसू बाहर आने की इजाज़त माँग रहे थे उससे. सोनिया थी वो. हम उसके पास गये. वो हमारे गले लग कर फूट-फूट कर रोने लगी. हमनें उसे सहानुभूति तो दी परंतु उस समय हमारी सहानुभूति भी काम नही कर रही थी. उसकी दुनिया उसके पिता के आस पास ही घूमती थी. जीवन में हर डगमगाते हुए कदम का सहारा बने और आज उसे बीच मझदार में अकेला छोड़ कर चले गये.

एक लंबा अंतराल......

कुछ महीने यूँही बीत गये और सोनिया से बस 5-10 मिनट फोन पर ही बात हो जाया करती थी. एक दिन सोनिया का फोन आया. बहुत रो रही थी. दबी, सहमी सी आवाज़ में बोली...
‘पिताजी... मुझपर... इल्ज़ाम.... और फिर से रोने लगी....’
‘सोनिया, शांत हो जाओ और सही से बताओ कि बात क्या है.’
सोनिया का रोना बंद ही नही हो रहा था. रोए जा रही थी बस. मैने फोन काट दिया और तुरंत योगेश को फोन लगाया. उसे भी कुछ नही पता था. फिर से सोनिया को फोन लगाया पर उसने उठाया नही. हम निरंतर फोन मिलाते रहे. परंतु कोई जवाब नही. बिट्टू से भी बात ना हो सकी..

एक सप्ताह बाद.....



फोन की घंटी बजी...
सोनिया का फोन… मैने झट से उठाया..
‘अरे..!! तू कहाँ थी और हमारा फोन क्यूँ नही उठा रही थी, हमें चिंता हो रही थी, तू जानती है ना हम कितने परेशान हो जाते है.’ स्वालों की मैने झड़ी लगा दी थी.
‘हाँ, मैं जानती हूँ, पर समय ही नही मिल रहा था.’
‘पहले मुझे ये बता कि क्या बात हुई थी उस दिन.’
फोन में से फिर उसकी आवाज़ आनी बंद हो गयी. वो फिर से मायूस हो गयी.
‘देख सोनिया, अगर तू रोएगी तो तेरे घर वालो का क्या होगा. हम सब जानते हैं कि तू बहुत बहादुर है. हिम्मत रख’
‘शिवानी, मेरे पिताजी की मृत्यु का दोष परिवारजन मुझ पर लगा रहे हैं कि मेरे कारण ये सब हुआ..’
मैं हक्की- बक्की रह गयी. क्या कहूँ, क्या ना कहूँ. कुछ समझ में नही आ रहा था. इतना कहते ही वो फिर से रोने लगी और पूरी बात किए बिना ही फोन रख दिया.
(मेरी समझ में ये नही आता कि कोई परिवार अपनी बेटी के बारे में ऐसा कैसे सोच सकता है. मैं इन सब बातों से हमेशा परेशान  हो जाती हूँ कि आज किसी भी रिश्ते में विश्वास रहा ही नहीं. घर- परिवार, एक ऐसा पौधा होता है जिसे प्यार का पानी और विश्वास की खाद से सींचा जाता है. और जिन घरों में ऐसा नही होता वो पौधे कभी फलते नही हैं. लड़कियाँ कभी भी अपने घर से वैर, द्वेष नही रखतीं. फिर क्यूँ, हर बार उन्ही पर ही तोहमतें लगाई जाती हैं. पहले पिता के घर, फिर पति के घर. उसकी खुद की कोई दुनिया नही है क्या..? मैं हर बार यही सवाल करते-करते थक चुकी हूँ. ‘बेटी को समान समझो, सामान नहीं’, उसे भी जीने का अधिकार है, वो भी इसी जगत का प्राणी है. उसे भी खुशियाँ चाहिए. कन्या के जनम पर भी शोक, स्वयं के लिए कुछ करने पर हज़ारों पाबंधियों से नवाज़ा जाता है उसे. प्रभु.... तेरे इस संसार में इतनी कठोरता क्यूँ है. क्यूँ यहाँ पर हर किसी के साथ समान व्यवहार नही किया जाता. हर बार, हर तरह की परीक्षा सिर्फ़ लड़कियों की झोली में ही क्यूँ आती है. क्यूँ...? )

एक लंबा अंतराल......

उसके बाद मेरी सोनिया से काफ़ी लंबे समय तक बात नही हो सकी. मैने जान बूझ कर उसे फोन नही किया. यदि करती तो वो रो पड़ती. कहते हैं समय सब ठीक कर देता है.
क्या सच में..?
2012 में सोनिया जून की छुट्टियों में चंडीगढ़ आई. मैने उससे बिट्टू के बारे में पूछा.
‘वैसे तो घर में सब ठीक है पर इस बात पे हंगामा मच जाता है. इसलिए अभी मैं घर पर इस बात को कहती ही नही हूँ. सब समय पर छोड़ दिया है. बिट्टू ने भी यही कहा है. शायद समय के साथ-साथ सब ठीक हो जाए.’
‘अच्छा है यदि ऐसा हो जाए तो..’
‘मेरी एक मौसी हैं वो कह रही थी कि माँ को मनाने में वो मेरी मदद करेंगी.’
समय के इंतज़ार में दो वर्ष कहाँ खो गये पता ही नही चला.
‘24 फ़रवरी 2014, बिट्टू की शादी.’
‘जी नही..सोनिया से नही. किसी और से.’
‘क्या.....????’
‘जी हाँ...’, मैने भी ऐसे ही चौंक कर पूछा..
15 को सोनिया का मुझे फोन आया कि बिट्टू के घर वालों ने उसकी शादी कहीं और पक्की कर दी है. ये बात सुन कर मैं हक्की-बक्की रह गयी.
‘बिट्टू का क्या कहना है.. ’, मैने पूछा..
‘उसका कहना है कि अब वो कुछ नही कर पा रहा है..’
‘परंतु वो भी तो तुम्हारे लिए वचनबद्ध है.. उसका भी तो तुम्हारे प्रति कुछ कर्तव्य बनता है कि नही. इतने वर्ष तुम दोनो एक दूसरे के साथ जीने के लिए ज़िंदा रहे और अब वो ऐसा कैसे कर सकता है.’
सोनिया ने मुझे बिट्टू से कोई भी बात करने से मना किया था. आज कल उसको सिर्फ़ एक ही काम रह गया था.. ‘रोने का....’

आख़िर बिट्टू की शादी हो गयी. 15 वर्षों से जो धड़कनें साथ थी. आज रब्ब ने उन्हें इतनी दूर कर दिया कि अब मिलन असंभव है. सब वादे एक ही पल में विध्वंस हो गये. उस रात सोनिया पर जो बीती उसकी कल्पना कोई भी नही कर सकता. अगले दिन मैने हिम्मत करके सोनिया को फोन किया. बात क्या करूँ, कुछ समझ में नही आ रहा था.
सिसकियों भरे वो शब्द आज भी मेरे ज़हन में ज्यों के त्यों डेरा जमाए हुए हैं...
“मेरी.... क्या.... ग़लती थी... शिवानी....”
सोनिया मेरे लिए श्वेता जैसी ही है. जिस तरह मैं अपनी सग़ी बहन की गीली आँखें नही देख सकती. सोनिया को रोते हुए भी मैं नही देख सकती. पता नही रब्ब को ये क्यूँ मंज़ूर हुया.
“प्यार...., एक अधूरा शब्द. जो हमेशा अधूरा ही रहेगा.”
बहुतों को कहते सुना है कि प्यार अँधा होता है. मैं कहती हूँ कि वो अंधे के साथ-साथ, अपाहिज भी होता है.

- शिवानी कोहली

अटूट बंधन

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