गुरुवार, 24 सितंबर 2015

भीखू : कहानी -कुसुम पालीवाल








कहानी---- " भीखू "
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ललिया..ओ..ललिया.......कहाँ मर गये सब .....किसी को चिंता नहीं है मेरी  , अरे कहाँ हो तुम सब........मरा जा रहा हूँ सारा कलेजा जल रहा है..... ,।भीखू की आवाज जैसे ही धनिया ने सुनी....., दौडी-दौडी भीखू के पास आई ....., क्यों चिल्लाबत हो ........, ठौरे ही तो बइठे हतै.........ललिया नाही है घरै मा ....काम पर गई है बोलो .......का भवा.....।
       अरी ...थोडी दारू दे... दै...मर जाऊंगा , नहीं पीऊंगा  तो ............तू  क्या ये ही चाहे है .....। अब
धनिया तो मानों .....फट पडी भीखू पर ......., हाँ ....हाँ , हम सब यही चाहें. ........तभी तो ललिया काम धन्धे पर जात है , तुमका.. का पडी......कहाँ जात है.....का करत है........, तुम्हे तो मुंह जरी जे ...... दारू ही  चाहे ..........।

      मालूम है बा दिना ...डांगदर साब  ....का बोले हते......., ललिया की माँ भीखू को जिन्दा धरनौ है तो , दारू बन्द करवा दै  । कलेजा जल गयो है.... तुम्हारौ.........तुम्हे पता नाय........।
    लेकिन भीखू कहाँ समझने वाला था , उसको तो जब से मुंह लगी थी तो अब कहाँ छूटने वाली थी ? चाहे जान चली जाये ...।
        अरे......जा भाषण मती दै.....दारू ला.......।
धनिया बेचारी खडी -खडी सोच रही थी ......, सारी उम्र बिता दी पीते -पीते उसने , लेकिन अब भी समझ नहीं है ,मत मारी गई है , बेटी का ध्यान नहीं है , कैसे-कैसे वो अपने जमीर को बेच कर घर चला रही है , आखिर बेटी है न .......बेटा होता ...कब का घरवाली को लेकर चला गया होता  ।
        हमारी थोडी सी जमीन थी वो भी गिरवी है इतने भी पैसे नहीं थे कि उसको छुडवा सकें. ......।
बेटी के जवान होते ही , सारे गाँव के ...मर्द जाति की  नजरें तो जैसे गिद्ध बन गईं थीं ......साले पास तो आ नहीं सकते थे , तो आँखों से ही नोंच -नोंच कर खा रहे थे बिटिया को .........।  कितनी बार जब  मैं देखती थी तो कलेजा फट उठता था  ।  जवानी थी कि जोश मार रही थी , तन ढांपने को कपडे नहीं थे , और जो थे वो भी जगह -जगह से फटे ....., शरीर का दिखाना वहाँ स्वभाविक था ।
                              एक बार कुछ पैसो की जरूरत पडने पर धनिया  , उस सेठ के  पास गई  , जिसके पास जमीन गिरवी रखी थी ........... , साहब ......थोडे पैसे चाहिए ......दे ...दो हुजूर. ..........।
    क्या....... करोगी  ?  पैसों का .....आदमी को दारू पिलायेगी.......।
नहीं साहब. ......घर में अनाज नहीं है , क्या खायेंगे  .........साब ...मर जायेंगे .......।




       साहब तो लग रहा था इसी मौके में था , तुरन्त मन में दबी बात ...होठों पर आ गई   ।  अरे , तेरी तो बेटी भी सयानी हो गई है. ...... उसको ......काम पर भेज दिया कर...........मालकिन के साथ , काम में हाथ बटा दिया करेगी , कमाई होगी सो अलग ......।धनिया को बात समझ में आ गई  , बस वो दिन था ...कि आज का  दिन , लडकी को रखैल बना कर छोड दिया था ससुरे ...कमीने  ने   .....।
     अरे , वहीं खडी रहेगी ....का सोच रही है
-ठाडी ठाडी......। धनिया की सोच टूटी ....., और वो तुरन्त भीखू के पास आई .........,सारी बोतलें खालीं हैं ...घर में नाय दारू , कहाँ तै लाऊँ.... ..थोडो सबर करौ ........।
और ये कह कर  धनिया भीखू का सिर अपनी गोद में रख कर , सहराने लगी थी  ।
       इन्सान आखिर इन्सान है , धनिया की गोद का सहारा ...भीखू के मन को , अन्दर तक भिगो गया , क्योंकि हालात और स्वास्थ का मारा व्यक्ति प्यार की जरा सी आँच में पिघल उठता है , वही भीखू के साथ भी  हुआ. ...... ।और वो सोचने लगा ...... मैंने जिन्दगी में क्या किया. ... अब तक....और उसके  आँसू  ठुलक गये आँखों से ......।
धनिया को कुछ गरम -गरम सा एहसास हुआ अपनी गोद में .....तो समझ चुकी थी , बाप का कलेजा दुखी हो रहा है , लेकिन बोली कुछ नहीं  ।
कहते हैं न " मन का गुबार आँखों के रास्ते बह जाये तो मन हल्का हो उठता है , ऐसा ही कुछ भीखू के साथ हुआ..........।
     ललिया नहीं आई अभी तक. ...., भीखू ने धनिया से पूछा. ...।
धनिया ने तुरन्त कहा .....आती होगी , मौसम की मार है. .......थोडा रुक गई होगी. .....।
तभी अचानक ....एक आहट हुई .....देखा.. .....ललिया ने किवाड खोला ........और सीधे अपने कमरे में चली गई थी  ।
  माँ की नजरों ने सब भाँप लिया था. ..... आखिर माँ थी न..........नौ महीने कोख में रख कर भी जो न समझे , तो वो पालक कैसा  ?????
     मै , अभी आवत हूँ ये कह कर वो ललिया के पास गई. ....... ललिया का चेहरा और उसकी आँखों के आँसू , एक अलग दास्तान बयां कर रहे थे  । पूछने पर पता चला..... कि कमीना सेठ , खुद तो रौंदता ही  था .........आज तो उसने किसी और के साथ सौदा भी कर दिया था ललिया के शरीर का ................। ये जुल्म सुन कर धनिया सोच में पड गई थी ......कि भीखू को सब कुछ बताये या नहीं ......।
सोच ही रही थी कि अचानक किवाड की ओट से एक छाया को देख कर  सहम गई थी धनिया , ये क्या .....ये तो भीखू ही है ......अरे हाँ ,ये भीखू ही खडा है ........सहम गई अन्दर तक , और कहने लगी .......तुम का कर रहे हो इतै (यहाँ) .......आराम करौ जाय कै.........।
  धनिया माँ थी  तो साथ में एक पत्नी भी , पति को कोई कष्ट न हो , इसलिए सब कुछ अकेले ही सुलटाना चाहती थी ।
      लेकिन अब आराम ...भीखू के लिए हराम हो गया था .......भीखू की आँखों में खून उतर आया था. .......वो बाहर की तरफ भागा. ........उसके पीछे-पीछे धनिया  ...।
   धनिया रोक रही थी लेकिन .......भीखू की आँखों और सिर पर तो खून सवार था ।
    खोल .....कमीने. .........किवाड खोल ......
आज तक मुझे नहीं मालूम था कि बहन बेटियों का सौदा करता है तू .........तुझे मैं नही छोडुगां ....... .....कमीने ....। मैं दारू पीता हूँ .....एक नजर भी नहीं गढाई पराई स्त्री पर ......और ...तू......तू
धन्ना सेठ......देख अभी तेरी सब निकालता हूँ धन्ना गिरी   । न जाने भीखू में इतनी ताकत  कहाँ से आ गई थी  ।
     किवाड खुलते ही ....... सेठ पर टूट पढा था भीखू  , और ये क्या. ...वो बदहवास हुआ जा रहा था , और मार-मार कर  यही कह रहा था कि ....अब किसी का सौदा करेगा , बहू , बेटियाँ बेचने और रौदने के लिए नहीं होती ............।
     ये कहते-कहते  उसके हाथों का शिकंजा कब तेज हो गया था , ये भीखू को भी नहीं मालूम पड पाया था .............।
नीचे सेठ  पडा था शान्त. ..........।
  आज भीखू को , कोई गिला नहीं था अपनी करनी पर , वो सोच रहा था सारी  जिन्दगी मैंने घर वालों की कमाई से गुजारी ....लेकिन अब  बस.........।



       मैं !  इस दारू को छोड दूंगा , और एक नये सिरे से जिन्दगी शुरू करूंगा ........चाहे मुझे कितनी भी मेहनत करनी पडे   । अपनी बहन , बेटियों को , नाली के कीडों के पास नौकरी के लिए नहीं भेजूंगा  ।
   गाँव सरपंचों का जो भी फैसला हुआ था,  वो भीखू के पक्ष में ही था कि ....गुनहगार
को सजा मिलनी ही थी  ।
    आज .......भीखू ने अच्छा इलाज करवा कर ,
" नशा मुक्ति केन्द्र " का सहारा ले कर  , अपने को एक  अच्छा नागरिक कहलाने की श्रेणी में रख छोडा था  ।
 
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लेखिका---कुसुम पालीवाल , नोयडा

अटूट बंधन
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2 टिप्‍पणियां:

  1. भावपूर्ण और प्रभावी कहानी
    उत्कृष्ट प्रस्तुति ---

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  2. सकारात्मक अंत के सतह प्रभावशाली कहानी

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