सोमवार, 21 सितंबर 2015

ढिगली:( कहानी) आशा पाण्डेय ओझा








 ढिगली 
पल्स पोलियो अभियान में  सत प्रतिशत  बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई जा सके अत: 70 आंगनवाड़ी वर्करों व स्वास्थ्य विभाग के कर्मियों की मीटिंग रखी गई। पीएमओ डॉ. विजय मालवीय ने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के साथ-साथ आंगनवाड़ी वर्करों को कल से तीन दिवसीय चलने वाले प्लस पोलियो अभियान के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी।  
हालाँकि हम स्वास्थ्य विभाग के कर्मियों को तो ज्यादातर पता रहता है कैसे क्या करना है, अत: पीऍमओ साहब का ख़ास संबोधन आंगनवाडी के कार्यकर्ताओं के लिए ही था। उन्होंने वर्करों को समझाया कि किस प्रकार से बच्चों को पोलियो की दवा पिलानी है। कैसे-कैसे कहाँ-कहाँ से शुरू करना है , कहाँ ख़त्म करना है । शहर में कूल  120 बूथ बना दिए इसके अतिरिक्त कुछ मोबाइल टीम भी गठित कर दी गई । जो बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने के लिए ईंट भट्ठों व अन्य आबादी से बाहर  बन रही बहुमंजिला इमारतों, दूर शहर से ग्रामीण क्षेत्रों तक जुड़ती सड़को पर चल रहे नरेगा, कच्ची बस्तियों ,पहाड़ियों वाले क्षेत्रों में दवा पिलाने का काम करें।
 उषा शर्मा व दिलीप देव के साथ मुझे हिरणमगरी सेक्टर चार-पांच का जिम्मा सौंपा गया ।  सारे कर्मचारी दूसरे दिन सुबह अपने-अपने निर्धारित केन्दों पर कैसे,कब निकलेंगे तय करने लगे।   हम तीनों ने भी तय कर लिया सुबह आठ बजे कहाँ मिलना है.. कहाँ से, किस तरह शुरू करेंगे।
सुबह दस बजे तक हमारा काम बड़ी फुर्ती से होता है । उस वक्त अधिकांशत: पुरुष घर पर ही होते हैं इस कारण या तो घरों के दरवाजे खुले मिल जाते हैं, नहीं मिले तो भी महिलाओं को उस समय दरवाजा खोलने में ज्यादा हिचकिचाहट या अन्य कोई  आशंका नहीं होती । ज्यादा सवाल जवाब भी नहीं होते अधिकतर पुरुष सरकार की इस योजना के बारे में जानते हैं । जानती तो पढ़ी लिखी महिलाएं भी हैं पर अधिकतर पढ़ी-लिखी महिलाएं भी नौकरी धंधे में होने के कारण सुबह फटाफट घर का काम निपटाने में लगी रहती है । फिर नौकरी पर चली जाती हैं  पीछे बुजुर्ग महिलाएं बच्चों की देखभाल करती घर पर मिलती हैं । कुछ घरों में जवान महिलाएं घर पर होते हुवे पति के ऑफिस या काम धंधे पर चले जाने के बाद  दरवाजा खोलने के लिए सास को ही भेजती है या यूँ समझलो बहू को पीछे धकेलती हुई  सास ही आगे आती है अपने वीरता, अनुभवों व ज्ञान की प्रदर्शनी करने । सास जी धीरे-धीरे आती दस सवाल अन्दर से दाग कर फिर दरवाजा खोलती है, खोल कर पुन: बीस सवाल और दागती है  कुछ महिलाएं सास की ओट में खड़ी चाह कर भी किसी प्रश्न का जवाब नहीं दे पाती ।
खैर आज तो स्तिथि बहुत बदल गई ..पर शुरू-शुरू में जब मैं नौकरी में आई ही थी उन दिनों इस अभियान से जुड़ कर जब दूर बस्ती में जाते थे तो हमें दूसरी दुनिया का प्राणी जान कर बड़े अजीब अंदाज से देखा जाता था ,बड़ा तल्ख़ व्यवहार भी किया जाता था । तब तो हमें उसी गाँव बस्ती का कोई मुख्या भी साथ में लेना होता था लोगों को समझाने बुझाने के लिए । कई कई जगह तो यह अफवाह भी फैली हुई थी कि यह दवा पिलाने से बड़े होकर बच्चे नपुसंक हों जायेंगे, व लड़कियों में माहवारी की दिक्कत आएगी कम बच्चे पैदा हों इस वास्ते सरकार ने ऐसी योजना चलाई है ..  ऐसी भ्रांतियां दूर करने के लिए एक-एक परिवार को कितनी-कितनी देर समझाना बुझाना पड़ता था क्या बताऊँ  कछ हमसें नहीं समझते उन्हें साथ चला गाँव का मुख्या समझाता कोई कोई तो तब भी नहीं समझते आज बहुत बदलाव आया है, बहुत जागरूक हुवे हैं लोग 
हालाँकि समय के साथ सब कुछ काफी बदला है पर शक की नजर से तो आज भी देखा जाता है हमें । जिन-जिन घरों के लोग हमें शक्लो सूरत से जानने लगे हैं वो तो थोड़ा ठीक-ठाक व्यवहार करते हैं। पर हमारी बस्ती तो हर बार बदल दी जाती है कम या ज्यादा यह अजनबियत का व्यवहार व संकोच की दृष्टि तो हमें हर बार मिलती है ।लगभग दुत्कार भरा आचरण तो हर बार ही दो चार जगह देखना भोगना,सहना होता ही है जो अब एक तरह से इस नौकरी का अंग बन गया नियति या नौकरी का हिस्सा मान कर हर माह दो,तीन दिन यह संत्रास भी भोग लेते हैं ।
आज दोपहर बारह बजे तक तो हमने हर संभव कोशिश की फटाफट घर-घर दवा पिला दें   पर महिलाएं खिड़की की ओट में से झांकती, दरवाजे के छेद में से देखती, यह सुविधा न होने पर छत पर चढ़कर मुंडेर से झांकती है । इस तरह दरवाजा खोलने में जाने कितनी-कितनी देर लगा देती फिर भी आँखे फाड़-फाड़ मुंह को लटका कर करकराती आवाज में चिडचिडाती जाने क्या जानना चाहती है हमारे बारे में .. । दोपहर दो बजे बाद तो लगभग हर घर की महिला घंटी बजने के साथ दोपहर की सुस्ताती नींद में दरवाजा खोलती है तो वक़्त चार गुना जाया हो जाता है उनकी नींद उड़ाने व बच्चे को दवा पीलाने में .. । कहीं बच्चा नींद से जगाये जाने पर रोने लगता है तो कहीं माएं या दादियाँ बच्चों को जगाने से साफ़ मना कर जाती है ।
अभियान पर निकलने से पहले ही यह सब सोच-सोच कर मन झूंझलाता तो बहुत है पर  कर कुछ भी नहीं सकते .. । इस वक्त  कुछ गर्मी  बढ़ रही है एक बजते-बजते तो पसीने से तर होने लगे हैं, बार-बार गला भी सूखने लगा .. । अपनी-अपनी गलियां निपटाते हुवे मैंन सड़क पर फिर बार-बार मिल जाते हैं हम लोग,फिर अलग-अलग गलियां बाँट लेते हैं, फिर अपने-अपने टारगेट में जुट जाते हैं जब-जब मिलते हैं तीनों मिलकर चाय पानी पी लेते हैं ,तीनों का साथ लाया पानी भी खत्म हो गया  । अभी तक शहरी इलाके में हैं बारी-बारी तीनों ने एक-एक बोतल बिसलरी की भी खरीदी, दो बार चाय की थड़ी पर बैठ कर चाय भी पी चुके हैं... ।
गलियां ..घर.. बच्चे तलाशते,निपटाते दोपहर के दो बज गए। सेक्टर चार के राजीव गाँधी पार्क में अमलतास के पेड़ के नीचे गुदगुदी हरी नर्म दूब पर बैठ हम तीनों ने दोपहर का भोजन जो घर से साथ लाये थे मिल बैठ कर खा लिया । मैं खाना खाने पश्चात कुछ ज्यादा ही आलसी हो जाती हूँ, हिलना-डुलना असम्भव सा लगता है, कुछ देर तो सुस्ताना ही पड़ता है  जा कर एक बैंच पर लेट गई हूँ ।
उषा दिलीप दोनों हमउम्र, दोनों में बनती भी खूब है ,वहीँ बैठे धीरे-धीरे जाने क्या खुसर-फुसर कर रहे हैं मैं  भी जान बूझ कर थोड़ा दूर जा कर लेटी ताकि उन बच्चों को मेरी उपस्तिथि खले नहीं । बच्चे पूरा लाज-लिहाज रखते हैं मेरा ,पर मेरे पास भी उम्र ..मुहब्बत.. और जिन्दगी तीनों  का अनुभव है .. उनकी आँखों में एक दूजे के प्रति छलकता प्यार व अपनापन पिछले लम्बे अरसे से साफ़ भांप रही हूँ .. । अत: जब-जब ये मेरे साथ होते हैं मैं कोशिश करती हूँ या थोड़ा तेज चलूँ या धीरे ताकि एक अनुमानित दूरी बनाये रखूँ ।और वो क्षण-क्षण समेट सके प्रेमपूरित एकांत के क्षण । अपने प्रेम में बाधा मान कर बच्चे कहीं मन ही मन मुझे कोसे नहीं .. । अभिशाप से बड़ा डर लगता है , जानें किस अभिशाप से ग्रस्त हो खोया है मैंने अपना प्यार .. जो मेरी रगों में लहू की तरह दौड़ता था .. जो मुझमें ताजगी भरता था,.. जो मुझे विश्वास देता था, ..मेरे होने का अहसास कराता था मुझे मेरा प्यार ,.. आज उस प्यार से वंचित खली हाथ मैं ..पल पल तलाशती हूँ वो बिखरे हुवे लम्हे वो गुजरे हुवे दिन .. पल-पल छिन्न-छिन्न... । आज इन बच्चों को साथ देख कर तसल्ली होती है .. मन को सुकून मिलाता है ,.. लगता अपना ही बीता हुआ कल लौट आया है वो लम्हे फिर आज इन बच्चों में । यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है कि बच्चों को मेरे साथ होने से एक दूजे के साथ समय बिताने का अच्छा खासा मौका मिल जाता है ।लोगों की नजरों में आने व बेवजह की बदनामी से भी बच जाते हैं .. । बच्चे मुझसे इतने प्रभावित हैं कि मेरे साथ काम करने का कोई मौका गंवाना नहीं चाहते वो भी पूर्ण आदर सम्मान व मेरी पूरी देखभाल के साथ जैसे मैं उनकी जिम्मेदारी हूँ । यह सब विचरते हुवे जाने कब आँख लग गई A
कोई 15/ मिनिट की झपकी लेने के बाद मैं उठ गई । बच्चे अभी भी उसी तरह बैठे आँखों में आँखे डाले कुछ धीरे-धीरे बतिया रहे हैं ... शायद प्यार भरे आत्मिक क्षण गुनगुना रहे हैं ।दिलीप ने उषा के पीले रेशमी दुप्पटे का कोना अपनी उँगलियों में लपेट रखा है, दोनों अमलतास की तने से पीठ टिकाये बैठे हैं, उषा का सर लगभग दिलीप के कन्धों पर झुका हुआ सा है... दिलीप ने भी अपना चेहरा उसके चेहरे की और झुका रखा है। अमलताश के कुछ फूल दोनों के इर्द-गिर्द बिखरे हुवे हैं  पीले सलवार सूट में गोरे गोल मुख वाली उषा बिलकुल बसंत की नायिका सी लग रही है । दोनों को इस तरह प्यार में डूबे देख मन जरा भी गवाही नहीं दे रहा कि इन्हें इन रेशमी ख्यालों से मुक्त करने का दुसाहस करूँ , पर क्या करू तीनों की नौकरी है, तीनों का टारगेट है, ...इन दोनों की तो नौकरी भी नई है,दो साल पहले ही तो दोनों जीएनएम् की ट्रेनिंग खत्म कर जॉब पर लगे हैं .. ।
 झूठमुठ का गला साफ़ करते हुवे खंखार कर पूछती हूँ “.. क्याया... या...  टाइम हुआ दिलीप .. ” दोनों झटके में दूर हो गए दोनों की एक साथ कंपकंपाती हिचकिचाती आवाज आती है
“जी दीदी ..! ”
“आप उठा गए... ?  २.35 हो रहे हैं दीदी  .. !”
जाने कब इतनी आत्मीयता बढ़ गई हम तीनों के बीच की बच्चों ने मुझे मेम से दीदी बना लिया ,पता नहीं चला .. कुछ रिश्ते होते ही ऐसे हैं जहाँ औपचारिकतायें ज्यादा समय तक जिन्दा नहीं रह पाती ,बस स्नेह जन्मता ,पनपता है ।
“अरे रे रे तुम लोगों ने मुझे उठाया क्यों नहीं चलो-चलो जल्दी करो अभी तो पूरा आधा एरिया बाकी है .. ।”
दोनों ने तपाक से अपना अपना झोला उठा लिया उठ खड़े हुवे , दिलीप ने दोबारा झुक कर खुद की बगल में रखा मेरा झोला भी उठा लिया ।
“जी दीदी . चलिए .!”
बस तीनों फिर चल पड़े प्रभात नगर गायत्री नगर टेगौर नगर की ओर।
“दिलीप ! ”
“जी दीदी ! ”
“ऐसा करो तुम और उषा प्रभात नगर टेगौर नगर निपटा दो अब फटाफट मैं गायत्री नगर निपटा देती हूँ । ”
“जी दीदी ठीक है । ”
मैं गायत्री नगर निपटा रही थी हालाँकि यह तीनों ही मोहल्ले सभ्रांत है लोग खुद जागरूक है। अधिकतर  महिलाएं भी पढ़ी-लिखी है फटाफट से बच्चों को ले आती है सो ज्यादा वक़्त नहीं लगता इन मोहल्लों में। पर इन्ही मोहल्लों के पिछले हिस्सों से सटे काम वाली बाइयों के भी कमरे होते हैं ।कहीं-कहीं सभ्रांत घरों के गैराज पोर्शन में तो कहीं-कहीं साथ लगी हुडको की एक कमरे वाली कॉलोनीयों में इसी तरह के परिवार रहते हैं, जिनके आदमी बिल्डिंग्स पर या हुडको कोलोनियों  में मजदूरी या ठेकेदारी का काम करते हैं । कुछ महिलाएं पतियों के साथ ही काम करती है। कुछ कमजोर स्वास्थ्य के चलते ईंटे पत्थर नहीं उठा पाती तो वो इन बड़े घरों में झाड़ू ,पोछे ,बर्तन के काम निपटा लेती हैं । कोई चार घर,कोई पांच घर,कोई- कोई सात आठ भी .. । बच्चे इनके गलियों में झूंड बनाये खेलते रहते हैं , कभी कुत्तों के पिल्ले पकड़ते, कभी गधों की पूंछ पकड़ते, कभी लड़ते.. कभी झगड़ते.. आपस में ठुकते गाली-गलौज करते, मैले-कुचेले ...नाक सिबूड़ते... मौसमी फ्रूट सब्जियों खाने-पीने के सामान से भरे निकलते ठेलों लारियों  के पीछे-पीछे लटूमते ,झिडकियां खाते अपना वक़्त गुजारते रहते हैं। कभी-कभी मांएं एक घर से दूसरे में जाने से पहले रास्ते में बच्चों को झिड़कती,पुचकारती घरों से मिला कुछ बासी-कुसी खाना पकड़ाती बच्चों को संभाल लेती है । तो कुछ बच्चों को मां के काम के ठिकाने पता होने पर कभी-कभी भूखे या आपस में लड़-झगड़ कर रोते-बिलखते पीछे पंहुच जाते हैं जहाँ कभी मालकिन की दुत्कार मिल जाती है तो कहीं दया भाव के साथ कुछ खाने को... कहीं स्कूल जाने की नसीहत...तो कहीं मां को उलहना ..आगे से बच्चे पीछे ना आये यह कड़क हिदायत।
कोई चार बजे हैं । दवा पिलाते-पिलाते नीचे के इलाके में पंहुच गई हूँ, जहाँ पांच-सात बहु मंजिला इमारतों का काम एक साथ चल रहा है रेत के एक ढेर पर लिटाये एक छोटे बच्चे पर नजर पड़ते ही मैं तुरंत उधर लपकती हूँ पास ही तगारी में ईंटे भर रही औरत से पूछती हूँ...
“यह बच्चा किसका है ? क्या इसें पोलियो की खुराक पिलाई जा चुकी है ?”
अपने काले सूखे होठों को निपोरते , आँखें मिचमिचाते ,थोड़ी लजाते, झिझकते कहती है
“म्हने ठा कोनी मेंमसा आ गमिया री छोरी है .. मैं उणने इज भेजूं..!”
वह बारह तेरह ईंटें भर तगारी उठा कर सामने की निर्माणाधीन इमारत में चली जाती है ।
 गुलाबी ओढनी में लिपटी बच्ची जिसके आधा मुहं, आधे पांव आधे हाथ ओढनी से बाहर निकल रहे थे ,, मैं पास बैठकर उसके मुंह पर भिनभिनाती मखियों को अपने हाथ का रजिस्टर हिला-हिला कर उड़ाने लगी हूँ .. बहुत कमजोर सी बच्ची, जिसका पत्थरनुमा खंडे सा बड़ा माथा पतली-पतली लकड़ियों से हाथ-पाँव.. .उंगलियाँ ऐसी लग रही है जैसे कच्ची-कच्ची पतली-पतली सहजन की फलियाँ सहजन के पेड़ पर आना शुरू हुई है ।पर नाक आँखे बड़े सुंदर, तराशे हुवे हैं आँखें तो इतनी बड़ी-बड़ी है की बंद आँखों पे घनी-घनी काली-काली बरोनियाँ ऐसी लग रही है जैसे किसी कमल के फूल के इर्द-गिर्द सेवन घास उगी हुई हो .. ।

कोई सात-आठ मिनट बाद सांवली दुबली तीखे नाक नक्श वाली लग-भग तीस वर्ष की  औरत लाल बंधेज की घिसी सी चुनरी व हरा छींट का घाघरा पहने  मेरी तरफ बढ़ रही है .. मैं उसमें उस बच्ची का जवान रूप देख रही हूँ जिसे अभी-अभी रजिस्टर से हवा कर रही थी बिलकुल जैसे मान के ही सांचे में बेटी के नाक नक्श उतारे गए हों  ..पास आकर नमस्कार की मुद्रा आधे हाथ जोड़ सकुचाती सी खड़ी हो जाती है।
“अच्छा तो तुम गमिया हो ? यह बच्ची तुम्हारी हैं ?”
“हाँ मेमसा..  ! ”
“कितने महीने की है ? ”
“तीन मईना री ।”
“तीन महीने की ? कितनी कमजोर कैसे है यह, मैं तो इसें एक माह की समझ रही थी,और तुम यहाँ तगारियां भी उठा रही हो ? तुमने इसें पोलियो की खुराक पिलवा  दी ?”
“नई मेम सा काम सूं छुट्टी कोनी मले ,सफाखानों खुलंण सूं पैली तो अठे काम ढूकणों पड़े .. काम सूं छुटतां आंतर तो सफाखानों बंद हु जावै ।”
बेग में से दवा निकाल कर  बेग वापस कंधे पर लटका लिया बच्ची के पास ही तीन चार ईंटें करीने से रखी थी उन पर बैठ कर बच्ची को दो बूँद पिलाते हुवे मैंने पूछा ..,
“क्या नाम है इसका ?”
“सा .. ढिगली ।”
“हें ... ... ढिगली .... ? यह... कैसा नाम हुआ.. ?
“आ रेत री ढिगली माथे इज जल्मी नी इण वास्ते .. । ”
“ अरे हाँ पर क्यों..? रेत की ढिगली पर क्यों जन्मी ..? तुम अस्पताल क्यों ना गई ?”
“अस्पताल कठे मेमसा , ऊपर काम करतां-करतां इज तो दरद सरू हुग्या, ...अर नीचे उतरतां पाण अठे रेत री ढिगली माथे तो आ ...जलम ...ई... गी ।”
“तुम्हें मालूम नहीं था ? काम से छुट्टी ले लेती ?”
काम सूं छुट्टी लो तो खावो काईं मेमसा...?”
मैंने दवा पिला कर शीशी वापस अन्दर बेग में रखते हुवे एक प्रश्नवाचक तीखी सी नजर गमियां पर छोड़ते हुवे पूछा
“ क्यों इसके पापा क्या करते हैं ?”
“पापा ..? इणरे कठे सा पापा ! “... म्हारा धणी तो तीन साल पेली इज खूट गया .. ।”
“खूट ग्या मतलब ..? फिर ये .. ? ये कैसे जन्मी बिना पति के ..? ”
अपने घेरदार घाघरे की गाँठ बना कर दोनों टांगों के मध्य दबाते हुव, ईंट के ढेर में से एक ईंट उठाकर, बिलकुल मेरे करीब ही रख कर उस पर बैठ गई उसकी आँखे डबडबा आई, आवाज  थरथरा रही थी ,एक-एक शब्द चबा-चबा कर निगल-निगल कर ,किसी अपराधबोध के नीचे दबती सी, चारों तरफ चौंकनी नजर दौड़ाकर , मेरे अतिरिक्त वहां पड़े ईंट पत्थर के कानों में भी  गलती से अपनी बात नहीं पंहुचाना चाहती शायद ।फुसफुसा कर..
“मेंम... सा... आ  तो .. इण पापी ..कसाई ठेकेदार री जोर-जबर रो फळ है .. ।”
जोर-जबर रो फळ.. । इस शब्द ने जैसे मेरे पैरों तले की जमीन खींच ली हो,  .. एसा लगा जैसे कोई हादसा मेरी आँखों के सामने घट रहा है, मैं मूक दर्शक हूँ, मैं गवाह हूँ  मैं पक्षधर हूँ जैसे उसके साथ हुवे इस अन्याय की , शब्द मेरे अंदर ही अंदर छटपटा रहे हैं ,मुंह  कड़वाएकदम कड़वा हो रहा है  .. जैसे आत्मा को कोई चीर रहा हो किसी धारदार हथियार से, मैं अन्दर तक छटपटा रही हूँ पेट में जैसे कोई खलबली मच गई ,या अचानक कोई रिक्त स्थान हो जाने से गढ्ढा सा पड़ गया .. । बड़ी मुश्किल से हिम्मत जुटा कर बोली
“जोर-जबर और तुमने पुलिस थाने में रिपोर्ट भी नहीं की होगी ..? ”
“नई  मेम सा .. नई करी .. ।”
“कौनसी बिल्डिंग का ठेकेदार .?”
“इणी’ज बिल्डिंग रो...  अबार जठे काम कर’री हूँ .. । ”
मैं जैसे फिर चौंक पड़ी बड़ा अजीब लगा यह सुनकर ,जिसने इसके साथ इतनी ज्यादती की वो उसी के साथ कैसे काम कर रही है क्या इसमें ज़मीर या आत्मसमान नाम की कोई चीज है या नहीं .. ? मैंने लगभग अपनी भृकुटियाँ तान कर गरज कर पूछा
“क्या नाम है उसका ..?और तुम अभी तक यहीं काम कर रही हो...? उस हरामी के साथ ?
“नाम जाण’र कांई करो मेंमसा ..? घणो  हुई तो म्हनै मजदूरी ऊँ काड देई.. ।”
“..निकाल देगा तो क्या कहीं और काम नहीं है .? क्या ... काम की कमी है ..? काम करने वालों को और कहीं भी काम मिला जाता है  । ”और तुम नहीं बताओगी तो क्या मैं उसका नाम पता नहीं कर सकती ?“यहाँ कितनी औरतें काम करती है .. ? क्या कोई भी बोली नहीं ..? ”
मैं लगातार इतने सारे प्रश्न तेज आवाज मैं करते हुवे हांफने सी लगी, पर गमियां सयंत हो चुकी थी सहज भी .. । अब वो मुझे आसानी से, बिना शब्दों को निगले चबाये ,अपने मन की बात बता रही थी ,जैसे वो सदियों से अपने मन पर एक बोझ लिए बैठी हो, और उसको कहीं उतरना चाहती हो ...“लुग्याँ तो घणी है सा .. । ...पण हैंगा रे हाथे कीं न कीं कांडा हुवता ई रेवे, कूण बोले किण-किण वास्ते बोले .. ?  म्हारा इज करम धाप ने खोटा हा जीको आ ढबगी.. ।....अर कठेई जावो मेमसा ...कागला तो सब जिग्या काळा रा काळा है नीं.. ?”

उसकी बातों से साफ़ जाहिर था,  बहुत सी दुनिया देखने के बाद उसने हालात से समझोता कर लिया है । घोर असंतोष से घिरी गमियां को अब दुनिया में किसी पर कोई विश्वास न रहा हो जो कुछ घट रहा है या घटेगा उसें अपनी नियति समझ कर झेलने को तैयार है।
फिर से आँखों के कोरों पर इक्कठे हुवे पानी को ओढनी के किनारे से पोंछती हुई ,अवरुद्ध गले से कहने लगी “धणी रे खुटियां पछे एकर एक मेंमसा रे घरे काम सुरु करयो .. , मेंमसा मास्टरणी हा, बाणी डिप्टी अलगी ही, .. साब अठे इज बैंक माय है, ..मेमसाब बेगा जावता मोड़ा आवता.., साब लारे म्हारे साथे घणा लफड़ा करण री कोसीस कीदी ,परी छोड़ी म्हे बा नौकरी.. । जद माजनां म्हे धूड़ इज पड़नी लिखियोड़ी.. तो कांई छोटो मिनख कांई मोटो मिनख ... ।
 “अर मेमसा अठे बी पैली तो म्हे ई घणो बखेड़ो करती ...,पण ओ पापी काम करा’र देनगी कोनी देतो, जे देतो तो आदी देतो, ..थोड़ो.क मोड़ो हुता पाण आदा दिन री मजूरी काट लेतो,..समान री चोरी र इलजाम लगा नें दूजी जिग्या काम नीं ढूकण देतो.., कीं न कीं कुचरणी चालती ई रेती ...,इण रे हामी नीं दबो तो दूजा मजदूरां रे हाथे हाका उड़ाय देतो... ,घणी बदनामियाँ करतो...,अबे कम सूं कम देनगी तो पूरी  देवे मोड़ो बैगो हु जावे तो ई कीं नी केवे ...। ”
“ तुमने उन में साहब के बारे में मेमसाहब को बताया क्यों नहीं ..? और उस साहब के खिलाफ भी तो रिपोर्ट लिखवा सकती थी न ? और यह “देनगी पूरी देवे “ से क्या मतलब है तुम्हारा..? .. तुम काम करके लेती हो फोकट में नहीं देता  .. । पूरी मजदूरी पाना हक़ है तुम्हारा .. और अब दो जनों का खर्चा नहीं हो गया ..?”ऊपर से इसका ध्यान रखने में तेरे काम में बाधा नहीं आती... ?और तो और तुमने इसें अकेले में ऐसे रेत के ढेर पर पटक  रखा है जैसे कोई इंसान का नहीं कुत्ते बिल्ली का बच्चा हो..।कितनी तेज धूप पड़ रही है इस पर मक्खियाँ भिनभिना रही है ,..तुम भी कम से कम तीन चार माह तो पूरा आराम कर लेती । कुछ खाना-पीना भी तो  था .. ,कितनी कमजोर हो तुम ... और यह बच्ची भी .. ।”
उसके चेहरे पर दर्द की लकीरें गहरी होती जा रही थी शायद मेरे ज्यादा प्रश्न करने से, पर मन में जैसे एक सहानुभति सी की लहर दौड़ आई हो, किसी के प्रति ।वो मजदूर है तो क्या मन तो औरत का है  इस नाते जानती है स्त्री का दर्द ,उसकी विवशताएँ शायद , बड़ी सरलता से बोली
”साब रे ख़िलाफ़ बोलती तो साब रो कांई जावतो, पण मेमसा रो घर भाग जातो .. । मिनख जात इज एड़ी हुवे मेमसा लुगाई दिखियाँ पछे बी री नसां उकाळा लेन लाग जा, बो भेडियो बण जा, भूल जावे वो जात-पात उमर लाज लिहाज । अर “आराम तो म्हे किस्मत में ई कोनी लिखा’र लाई, हफ्तो ई नीं करयो आराम ,मेंमसा आप बताओ ..घरां बैठ जाऊं तो इण रे दूध दवा कांई कोनी चाईजे..? ”
“दूध .. ।! तो क्या तुम अपना दूध भी नहीं पिलाती हो इसें ? ”
“ नीं मेंमसा.. एक तो सरीर मांय कीं गियो ई कोनी तो दूध कठूँ उतरतो ..? ऊपर सूं इण पाप री औलाद वास्ते हेत ई कोनी फूट्यो तो कठूँ आवतो करमफूटी रे वास्ते दूध ..? ”
दूध की बात से ही उसें याद आ गया शायद की बच्ची बहुत देर से भूखी है झटके में उठ खड़ी हुई ढिगली के ऊपर एक नीम के पेड़ पर टंग रही फटेहाल कपड़े की नीली  पेंट की बनी थैली में से दूध की बोटल निकाल कर गामिया ने जाने क्या बुदबुदाते हुवे उसके मुंह से लगादी.. ।
बच्ची चसअड़- चसअड़ करती दो मिनिट में पूरी बोतल दूध गटक गई  जैसे जन्मों से भूखी हो ।
 “पाप री औलाद “उफ्फ्फ ! उसके  के इन शब्दों ने .. मेरा बदन का बूँद-बूँद लहू निचोड़ लिया हो जैसे .. । मैं कितनी कमजोर बेबस निरुपाय सी हो गई ,बड़ी-बड़ी बातें सबको समझाने वाली ,घड़ी-घड़ी सबको नसीहतें देने वाली .. ,पल-पल रॉब ठकराई झाड़ने वाली .. , औरतों के अधिकारों पर बहस करने का कोई मौका न छोड़ने वाली, आज जान पाई औरत मात्र शरीर है और मशीन है भोगने ,बेचने ,भूनाने के लिए .. बच्चे पैदा करने के लिए पाप के पुन्य के सारे काम उसके हिस्से में .. और पुरुष ..?वो भोगी मात्र है .. एक निर्लिप्त भोगी .. जो ना मन से जुड़ा रह सकता है न तन से ..जो सबका भी है .. जो किसी का भी नहीं ..इच्छाओं की पूर्ती ही उसका उद्देश्य है ...येन केन प्रकारेण.. क्या सभी पुरुष..? हाँ शायद सभी पुरुष .. । हाय नियति यह क्या किया तूने ?बाप तो है ही ना, मां की ममता भी इस नाजायज औलाद के लिए रूठ गई .. ?नहीं-नहीं माँ तो ऐसी नहीं होती ..! माँ तो अपनी औलाद को जी जान से चाहती है .., पोसती है .., अपने रक्त कणों से सींची हुई औलाद के लिए ममता ना उमड़े ऐसा नहीं हो सकता.. मैं कुछ सोच समझ नहीं पा रही हूँ  .., यह क्या देख रही हूँ ..? क्या सुन रही हूँ .. ? क्या करूं..? बस संज्ञा शून्य सी मैं .. ।
दूर दूसरे रेत के टिब्बे पे खेलते बहुत सारे मजदूर बच्चे देख कर मन अन्दर ही अन्दर छटपटा रहा है, कह रहा है जानती हो सुषमा इसमें से जाने कितनी ढिगलियां यूँ ही इक्कठी हो गई तिल-तिल आंधी ,तूफानों ,बरसातों .. जीवन की झंझावतों में बिखरने के लिए ..,यह ढिगलियां.. कुछ चाही कुछ अनचाही ..इन ढिगलियों में कुछ इंटें.. कुछ पत्थर ..कुछ मिट्टी .. मिट्टी को दबाती ईंट .. ईंट को दबाता पत्थर .. पत्थर को दबा देने वाली पट्टियाँ भी तो है ..उफ्फ.. !यह जिन्दगी .. कितने रंगों की जिंदगी ..कितने रूपों कुरूपों से बनी यह जिन्दगी .. हर रूप में कालापन उतर ही आता है हर बड़ा छोटे को निगलता है जिन्दगी नहीं जहर का घूंट सांस सांस जहर का घूंट..
“मेंमसा  इणने अगली खुराक कद पावणी है ,अबके मैं याद राख ‘र सफाखाने आय जाऊं.. ”
मैं जैसे बेहोशी से बाहर आती हूँ
“हूँ  हूँ .. क्या..? ”
“ म्हे पूछयो इणने अगली खुराक कद पावणी है ..? मैं खुद याद राख ‘र इणने सफाखाने ले आऊं.. ।”

“.....ओह हाँ हाँ तुम एक दो दिन में बड़े अस्पताल आ जाना मैं तुम्हारा कार्ड बनवा दूंगी .., कुछ सरकारी ताकत की दवा तुम्हारे व बच्ची के लिए भी दे दूंगी और भी कुछ ...देखती हूँ ।”
आज मुझे फिर पच्चीस साल पहले का वो अधेड़ बुढ्ढा डॉ कर्नावट याद आ रहा है मेरी नई-नई नौकरी छोटे गाँव में घर से 400 किलो मीटर दूर पोस्टिंग .. बिलकुल अकेली ..अपनेपन के बहाने, केयर के बहाने मुझे कितनी गन्दी लिजलिजाती आँखों से छूता था.. कई-कई बार मन किया उसकी आँखें फोड़ दूँ .. क्या फोड़ पाई थी मैं ..? मुझे ओपरेशन थियेटर में कितनी बार बिना कारण छूने की कोशिश की उसने .. आंखें तरेरने के अलावा क्या कर पाई मैं ..?अगर नरेन ने अपनी पूरी अप्रोच लगा कर मेरा तबादला नहीं कराया होता .. तो जाने कितने बरस उस कीटाणु कर्नावट को मुझे सहना होता अपने जिस्म की दिवार पर रेंगते हुवे... उफ्फ! यह मर्द जात .. ।
अब मैं यहाँ एक पल नहीं रूक पा रही हूँ ना ही कुछ और प्रश्न पूछने की हिम्मत है .., कुछ और पूछा तो जाने कितनी हकीकतें और खुलेगी इस सभ्य समाज की .. ।और जाने कितना बोझ मुझे अपनी मन की छाती पर ढोना पड़ेगा .. सभ्य समाज के सभ्य जानवरों की दरिंदगी का .. । हम  इक्कीसवी सदी में प्रेवश कर गए हैं .. स्त्री पुरुष समानता के नारे बहुत बुलंद हैं .. स्त्री के अधिकारों की रक्षा के बड़े-बड़े वक्तव्य आये दिन अखबारों मंच,टीवी से जारी होते हैं मैं देख रही हूँ। सभ्यता का जंगलीपन... देख रही हूँ सराफत का वह्सीपन ।
थकी ..मुरझाई.. उदास.. सुस्त क़दमों से वापस सड़क की और बढ़ रही हूँ ,चले जा रही हूँ। कहीं से दीदी...! दीदी..! आवाजे आ रही है .. पर मैं खुद को बहरी अंधी सी जान पड़ रही हूँ। ये आवाजें मुझे दूसरी दुनिया की लग रही है,क्या मैं दिशा ज्ञान भूल गई हूँ बस सीधे-सीधे चल रही हूँ ।
पीछे से पों-पों करती गाड़ियाँ आ रही है वो गाड़ियों की पों पों नहीं मुझे गंदे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं,गाड़ियाँ डॉ कर्नावट है ,गाड़ियाँ ठेकेदार है ,गाड़ियाँ बैंक मैनेजर है ,मसल देगी ,कुचल देगी इस सड़क को यह सड़क औरत है इस औरत को कुचल कर आगे बढेगी गाड़ी अगली औरत को कुचलेगी आह .. मैं क्या करूं.. मैं कानों पर हाथ रख लेती हूँ ..किसी ने मुझे पूरी ताकत से झटके के साथ  हाथ पकड़ कर एक तरफ खिंचा मैं एकाएक चोंकती हूँ  शायद जागती हूँ या  कहीं दूसरी दुनिया से लौट कर आती हूँ जैसे ... ।
“दिलीप तू ? ”
“हाँ दीदी  जी मैं .दीदी क्या कर रही हैं आप ..? ऐसे रोड़ के बीचो-बीच क्यों चल रही हैं .. ? कितनी गाड़ियाँ निकल रही है.. मैं रोड के उस पार से आपको कितनी जोर-जोर से आवाजे लगा रहा था  वो भी नहीं सुन रही थीं आप  .. उषा आपको आवाजें लगा रही है ..अनसुना क्यूं कर रही थी आप हमें ..? कहो ना क्या सोच रही हैं आप ..? यह गाड़ी  वाला तो अभी आपको टक्कर भी लगा देता जो मैंने न खिंचा होता..?”
“ओह सॉरी ! पता नहीं मैं क्या सोच रही थी ..? ”
“दीदी आपकी तबियत तो ठीक है न ? आप बहुत थक गई हैं शायद .. ।”
“हाँ हाँ मैं ठीक हूँ .. .. ।”
“दीदी आप के हाथ इतने गर्म क्यों है ?”
“न न मैं ठीक हूँ .. ।”
उषा पूछती है “दीदी क्या हुआ बताओ ना  ..प्लीज?”
उषा की शक्ल देखती हूँ .. भोली सी .. प्यारी सी ..मासूम बहुत मासूम.. । घर के आहते में अम्र्रूद के पेड़ पर कुछ रोज पहले जन्मे उस कबूतर के बच्चे सी, जो दो तीन दिन से उड़ान भरने की कोशिश में लगा है ,उषा मुझे ठीक वैसी दिख रही है ।वो बच्चा जब उड़ता है तो सामने ढेर सारे बिजली के तार से टकराने का डर लगता है मुझे, मेरे पड़ौसी तिवारी जी के कुत्ते का डर लगता है मुझे, शायद उसकी माँ भी डरती होगी, या नहीं डरती होगी .. पर मेरा मन करता है की इस बच्चे को अभी ना उड़ने दूं .. थोड़ा और बड़ा होने दूं .. अभी मेरा मन कर रहा है मैं उषा को वापस उसके घर भेज दूं ,नौकरी छोड़ने का कह दूं   ।
गमियां के शब्द गर्म तेल से बार-बार कानों में उतर रहे हैं “ मिनख जात इज एड़ी हुवे मेमसा लुगाई दिखियाँ पछे बी री नसां उकाळा लेन लाग जा बो भेडियो बण जा.. ।”
एकाएक मुझे दिलीप में राक्षस दिखाई  देने लगता है .. 
मैं मन ही मन प्रण करती हूँ... नहीं मैं उषा के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी .. मैं नफरत से भर रही हूँ दिलीप के प्रति .. मुझे उसमे ठेकेदार दिख रहा है .. डॉ कर्नावट दिख रहा है .., उसमें वो बैंक वाला साहब दिख रहा है. । ओह . मुझे उषा को बचाना है ..., उषा का हाथ खींच कर फटाफट चलने लगती हूँ .. उसके हाथों पर मेरी पकड़ तेज होती जा रही  है .., वो लगातार मुझसें कई सवाल कर रही है ... मैं सुन नहीं पा रही हूँ .. ।दिलीप पीछे-पीछे दौड़ा आ रहा है पूछता है दीदी .. ! दीदी ..!  दीदी आप मेरी बात का जवाब क्यों नहीं  दे रही .. ? लगभग मुझे पकड़ कर झिंझोड़ देता है .. । उषा आवक सी मेरा मुह देख रही है ... मैं जागती हूँ .. कहीं से लौटती हूँ  ।.. डॉ कर्नावट .. ठेकेदार .. बैंक मैनेजर ...क्या दिलीप भी ...?दिलीप की आँखें मेरी आँखों से मिलती है उनमे  भय है ,फ़िक्र है ,  चिंता है , परवाह है ,उनमे प्यार है ..  उनमे कद्र है ,श्रधा है .. पर हवस नहीं है भूख नहीं है , नहीं!  नहीं ! दिलीप यह तीनों ही नहीं है .. दिलीप नरेन है .. बिलकुल मेरा नरेन.. जो वासना से रिक्त है प्रेम से पूर्ण है .. उषा  को प्यार से रखेगा.. उषा को संवारेगा ,उसकी सुरक्षा का घेरा बनेगा जैसे मेरा नरेन .., मेरे नरेन् ने मुझे रखा ..संवारा ..सुरक्षा दी पल-पल प्यार से सना जीवन दिया मुझे .. मेरी रग-रग में आज भी है उसका वजूद  उसका 14 बरसों का साथ  ... । न ... न ..हर पुरुष .. भेड़िया नहीं  होता ..., मन को तसल्ली देती हूँ .., समझाती .. हूँ .. धीरे –धीरे .. मन की नफरत खाली कर दिलीप को विश्वास से देखने की कोशिश कर रही हूँ ... । मेरे मन का तूफ़ान थम रहा है ... ।
पर तूफ़ान थम नहीं रहा  यह तूफ़ान गंतव्य पर पंहुच गया है ..इसलिए शांत है .. मुठियाँ बींच कर मन ही मन निर्णय लेती हूँ .. । इस ठेकेदार को तो मैं सबक सिखाऊंगी.. ,इस ढिगली को ढिगली पर .. नहीं रहने  दूंगी .. ठेकेदार का नाम ना दिला दिया  तो मेरा नाम सुषमा  नहीं .. । पर गमियां  क्या गमियां  मानेगी ..? हाँ .. मानेगी .. मैं उसें  समझाऊँगी.. मैं उसें .. काम दूंगी .. नौकरी दूंगी .. सुरक्षा  दूंगी ... चाहे मेरा नींद,चैन,पैसा सब खत्म हो  जाये ... यह लड़ाई  गमिया  की नहीं  मेरी है । मेरे अन्दर की स्त्री की है ,उसकी आबरू की है .. उसके अस्तित्व की है .. । एक स्त्री जो छली गई .. दबाई गई रोंदी गई मसली गई .. उसके रोंदने मसलने .. कुचलने से निकला उसका एक और हिस्सा .. उस ढिगली  को यों तिल-तिल बिखरने ना दूंगी आंधी .. तूफ़ान.. बरसात में ... ।
“दिलीप..! ”
“जी दीदी! ”
“तुम उषा को लेकर निकलो मुझे कुछ काम है मैं निपटा के आती हूँ .. ।”
“लेकिन दीदी .. आपकी तबियत ठीक नहीं है .. आप हमारे साथ ही चलिए हम पहले आपको घर छोड़ेंगे .. फिर .. । ” मैं दिलीप की बात बीच में ही काट देती हूँ .. ।
“कहा न तुम लोग  निकलो मुझे जरुरी काम है, निपटा कर आउंगी .. और सुनो  चिंता मत करो मैं ठीक हूँ .. .. ।”
बच्चों की आँखों में एक अजीब तरह का डर साफ़ दिख रहा है ,वे मुझे छोड़ना नहीं चाह रहे उषा मेरे और करीब आकर मेरा कन्धा पकड़ लेती है “दीदी !
मैंने उषा व दिलीप के कंधो को प्यार से थपकी दी मुस्कराई .. पर बच्चे नहीं मुस्करा पाए वो भयभीत से ही नजर आ रहे थे ।

 मैं जल्दी में हूँ .. ।”
टेक्सी वाले को रोकती हूँ .. “चलो आदर्श नगर ले लो .. ।”

मेरी परम सखी अनुजा मुझे बुझते हुवे दीपक में अचानक पड़ते हुवे तेल सी लग रही .. हाँ अनुजा  निपटा देगी सारा  मेटर.. आखिर एस.पी है .. ।ठ्केदार तो एक पल में हथियार डालेगा। गमिया को हम दोनों समझा लेंगी .. ,मना लेंगी .. उसकी भूख ,उसका अकेलापन , उसकी असुरक्षा उसें यह सब सहने को मजबूर कर रही है ..मैं समझ रही हूँ ..,मैं लडूंगी उसके लिए ..अनुजा लड़ेगी उसके लिए ।  यह लड़ाई स्त्री अस्मिता की है ..यह लड़ाई  सड़क पर पड़ी उस नाजायज ढिगली की है जिसको उसके आहते में करवाना है .. उसके खुद के आहते  में  जहाँ उसके अधिकार हैं ताकि बहे नहीं वो जिन्दगी के किसी भी बहाव में अभाव में .. । यह लड़ाई हर कामकाजी गमिया की है जो होती है पुरुष के शोषण का शिकार .. हमें एक जुट होना है हमारी अस्मिता की खातिर । मेरे चेहरे पर तैर रहे डर  चिंताओं के बादल .. आशा की हवाएं कहीं दूर उड़ा ले गई  ..शायद अब वो बादल जा कर  ठेकेदार के चेहरे पर उतरेंगे ।

आशा पाण्डेय ओझा 


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7 टिप्‍पणियां:

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  2. I read your story just now. It is a very powerful story. It is a very moving story. It tells the truths of our society beneath the apparent levels that people see.
    The story of the manner of Dhigli's birth on the sand, the cause of her birth the thekedar, the helpness of the mother whose resignation to the circumstances are all very well presented.
    The message which you give in the conclusion is meaningful. All the aware persons should take notice of the gross injustices being done to the majboor segments, spring into action as is done by the narrator in the description.
    Well done, Asha ji.

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  3. आशा जी, ढिगली एक सांस में पढ़ गया। बहुत मार्मिक है। पुरुष का काइंयापन उसकी आंखों में झलक आता है जिसे भांपने की छठी इंद्री बस महिला के पास ही ईश्वर ने दी है। कुछ महिला साहसी होती है और कुछ समय की मारी। इसी कमजोरी का फायदा नालायक मर्द उठता है, पर सब तो ऐसे नहीं होते।
    ढिगली कहानी के लिए आपका अभिनंदन।

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  5. ढिगली कहानी पुरुषों कि भोगी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है। साथ ही अशिक्षित और आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं का यथार्थ चित्रण भी करती है।जो अत्याचार और अन्याय को नियति मान लेती हैं। सामाजिक और पारिवारिक दबाव उन्हें पंगु बना देता है।

    कहानी में कामकाजी महिलाओं का शोषण दफ़्तरी संस्कृति के ज़रिए दिखाया गया है।जहाँ महिलायें आर्थिक गुलाम होने के साथ शारीरिक और मानसिक रूप से भी बंदी होती हैं। जिसमें अशिक्षित (गमियां ) और शिक्षित (लेखिका) दोनों महिलाएं शामिल हैं।

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  6. कहानी का कथानक संक्षिप्त परंतु प्रभावशाली है।जिसमें लेखिका के द्वारा एक मज़दूर महिला गमियां के ज़रिए समाज कि बनावटी शराफ़त को नग्न रूप में चित्रित किया गया है।कहानी के कथानक में नया मोड़ तब आता है जब गमियां का पति तीन साल पहले मर चुका है और उसके तीन साल बाद एक बेटी जन्म लेती है। यहाँ पाठक के मन में कौतुहल पैदा होता है ।

    लेकिन गमियां जब अपनी संतान को उस ठेकेदार की ज़बरदस्ती का परिणाम बताती है तब पाठक के मन में रोष उठता है और कहानी का यही परिदृश्य समाज को नंगा करता है।कथानक का अंत लेखिका के प्रण के साथ होता है।जिसमें वो गमियां को न्याय दिलाने की अपने मन में प्रतिज्ञा लेती है।


    आलोच्य कहानी में पात्रों की संख्या सामान्य है।परंतु गमियां ,ठेकेदार,उषा ,दिलीप,और डॉ कर्नावट मुख्य हैं जिनका चारित्रिक विकास हुआ है।

    कहानी कि नायिका गमियां है।जिसके जीवन का शोषित रूप ही कहानी का केंद्र है।
    गमियां बेहद गरीबी में जी रही एक मजबूर औरत है।परिवार के नाम पर अब उसके पास केवल दो ही लोग है एक तो वो खुद और दूसरी उसकी वो संतान जो उसके पति की तीन साल मौत के बाद हुई है ।


    गमियां के पति की मौत के बाद उसका एकमात्र सहारा भी दुनिया से चला गया ।उसे अकेला और मजबूर देख उसका ठेकेदार उसके साथ नाजायज़ सम्बन्ध बना लेता है।आर्थिक रूप से गुलाम गमियां इसका विरोध नही कर पाती।और इसे नियति मान कर उसके यहाँ मजदूरी करती है।

    एक बार जब लेखिका पोलियो कि दवा पिलाते हुए गमियां कि बच्ची के पास पहुंची हैं ।तब उन्हें गमियां उदास और गुस्सेल अंदाज़ में अपने ऊपर हुए अन्याय को बयाँ कर देती है।

    गमियां भारतीय समाज कि शोषित केवल आखिरी महिला नही है ।अनगिनत और असंख्य मज़दूर महिलाएं हैं जो अशिक्षित और आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण अन्याय रुपी ज़हर का घूँट पिए जा रही हैं।

    निश्चय ही लेखिका ने गमियां के ज़रिए पुरूष मानसिकता पर करारी चोट की है।

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