रविवार, 16 अगस्त 2015

आधी आबादी: कितनी कैद कितनी आज़ाद (रोचिका शर्मा )








नारी या " नुचे पंखों वाली तितली "

लगा दिए  मुझ पर प्रतिबंध , झूठी आन,बान और शान के
 नोच लिए क्यूँ तितली के पर ,जब भरने लगी उड़ान ये

नारी , कितनी आज़ाद ? वर्षों से यह सवाल मेरे जहन में हर पल धड़कानों के साथ चल रहा है  । मैं यह तो न कहूँगी कि वे आज़ाद नहीं । जब हमारा देश अँग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद हुआ तो हमारे देश की कई महिलाओं ने भी आज़ादी की लड़ाई में पूरा सहयोग दिया था और जब देश आज़ाद हुआ तो उस आज़ादी की हकदार महिलाएँ भी हैं । तो महिलाएँ एक तरह से आज़ाद तो हैं । लेकिन अब सवाल है भारत में महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक आज़ादी का । अब आज जब बात आ ही गयी है तो चलिए शुरुआत करते हैं हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता को मान्यता  देने वाले ग्रामीण क्षेत्रों  की महिलाओं से।
जहाँ तक ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो महिलाओं की स्थिति पशुओं से कम नहीं । जिस तरह पशुओं को काम में ले कर फिर से खूँटे से बाँध दिया जाता है उसी तरह घर व खेत-खलिहानों में या मवेशियों को संभालने की ज़िम्मेदारी महिलाओं की ही है । इतना ही नहीं घर के सभी सदस्यों की सार-संभाल की ज़िम्मेदारी भी महिलाओं पर ही डाल दी जाती है । उसके बदले उसे मिलता कुछ नहीं । घर में एक पहचान भी नहीं । मेरा एसा मानना है किज़िम्मेदारी एवं अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं । ग्रामीण इलाक़ों में महिलाओं पर ज़िम्मेदारियाँ तो हैं किंतु अधिकार से वे मोहताज हैं । उसे अपने मौलिक अधिकार मिलना तो दूर की बात है ,उसे तो इसका ज्ञान तक नहीं । क्यूँ, सबसे पहले तो उसे शिक्षा से वंचित रखा जाता है यह कह कर " चूल्हा चौका ही तो करना है उसमें पढ़ाई का क्या काम ?" उसे सामाजिक रीति-रिवाजों ,प्रथाओं व कुरीतियों की आड़ में सब कुछ मूक रह कर सहन करना पड़ता है । इसलिए मैं यह तो कदापि न कहूँगी किवह आज़ाद है । वहीं दूसरी और शिक्षा के अभाव में या उन पर दबाव के रहते यही ग्रामीण महिलाएँ कभी-कभी एसे काम भी कर बैठती हैं किजो कि वाकई हमारी सभ्यता व संस्कृति को शर्मसार कर दे । जिसे ग्रामीण लोग आज़ादी का प्रतिफल समझते हैं । इसीलिए उन्हें क़ैद रखने में ही समझदारी नज़र आती है । लेकिन यह कोई नहीं समझता कि यह शिक्षा के अभाव में एसा हो रहा है । यद्यपि हमारे संविधान में महिलाओं के लिए कुछ अधिकार संरक्षित हैं किंतु उनका ज्ञान तक उन महिलाओं को नहीं है अपने अधिकारों के लिए लड़ना तो बहुत दूर की बात है ।
 वैसे तो सृष्टि के आरंभ से ही नर व नारी एक दूसरे के पूरक रहे हैं । प्राकृतिक संरचना के अनुसार महिलाएँ अपने बच्चों व परिवार के अन्य सदस्यों के लालन-पालन के लिए उपयुक्त थीं और पुरुष परिवार के भरण-पोषण का कार्य  करता था । परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारियाँ पुरुष ने ले रखी थीं । लेकिन वक़्त के साथ महिलाओं के मानवीय गुण पुरुष केआगे फीके पड़ने लगे और महिलाओं की स्थिति पशु समान होने लगी । इसी कारण कई पाश्चात्य व योरोपीय देशों की महिलाओं ने आंदोलन किए एवं "रोटी व गुलाब " के नारे लगाए । रोटी  उनके मौलिक अधिकारों एवं गुलाब उनकी अच्छी जीवन शैली का प्रतीक थी । उसके बाद कई संस्थाओं ने उनके लिए आगे कदम बढ़ाए और महिलाओं के बारे में सोचा गया । लकिन हमारी ग्रामीण महिलाएँ तो शिक्षा से भी वंचित हैं , उन्हें तो आज़ादी शब्द के सही मायने भी शायद मालूम न हों ।
 अब यदि बात करें शहरी महिलाओं की तो उनकी स्थिति ग्रामीण महिलाओं से कुछ अच्छी है । शहरों में लड़कियों को  शिक्षा ,रहन-सहन , के अधिकार तो मिले हैं और पढ़-लिख कर महिलाएँ उँचे मुकाम भी हासिल कर रही हैं , और कई महिलाएँ उँचे औहदों पर कार्यरत भी हैं ,किंतु   उन महिलाओं की संख्या का अनुपात हमारे देश की पूरी महिलाओं की तुलना में बहुत ही कम है ।  जहाँ तक मैं अपने आस-पास के क्षेत्रों में देखती हूँ शहरों में अब माता-पिता अपनी बेटियों को अच्छे संस्थानों में भेज अच्छी शिक्षा ही नहीं अपितु अन्य कक्षाओं जैसे नृत्य , तैराकी, स्केटिंग,घुड़सवारी  आदि में भी भेज कर उनके पूरे विकास की कोशिश करते हैं । उनके लालन-पालन में भी बेटे-बेटी का भेद ख़त्म कर चुके हैं । अपनी बेटियों के गुण व क्षमता अनुसार उन्हें आगे बढ़ने में पूरा सहयोग भी कर रहे हैं ।  यही बेटियाँ पढ़-लिख कर उँचे औहदों पर कार्य भी कर रही हैं किंतु जब बात आती हैं उनके विवाह की तो साधन-संपन्न परिवार तो पहले से ही उनके बाहर जा  कर कार्य करने को मना कर देते हैं और यदि हाँ कर भी दें तो विवाह पश्चात हमारे समाज के नियमों के अनुसार उन्हें अपना घर और कई बार तो शहर भी छोड़ कर पराए घर जाना होता है,नये काम की तलाश करनी होती है । उस पर भी यह निर्भर करता हैं कि वह जिस परिवार में बहू बन कर आई है वे उसे कितना सहयोग करते हैं । कुछ प्रतिशत परिवार ही उन बहुओं को सहयोग करते हैं । यदि सहयोग मिल जाए तो समझिए जिस प्रकार नर्सरी से लाया पौधा अच्छी देख-रेख से पनप जाता है ,उसी प्रकार यह बेटी अपने ससुराल में एवं कार्य में जड़ें मजबूत कर लेती है अन्यथा वह बिन मालिक के पौधे की तरह मुरझा कर सूख जाती है । अपना सब कुछ भूल कर , सामाजिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और रस्मों की आड़ में कुचल -मसल दी जाती है । और वह मजबूर हो जाती है उन्हीं ग्रामीण महिलाओं की तरह पशुत्व की जिंदगी जीने के लिए । समझो यदि किसी महिला को आज़ादी मिलती भी है अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने के लिए, एवं सहयोग मिलता है बाहर जा कर काम करने में, तो उसकी तनख़्वाह या आय पर भी ससुराल वालों की नज़र रहती है । कुल मिला कर निष्कर्ष यह है कि यदि सामाजिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो आर्थिक स्वतंत्रता छीन ली जाती है । वह सब समझती है अपने अधिकार, संविधान के नियम व क़ानून को किंतु वह आवाज़ नहीं उठा पाती है । कभी माता-पिता की व कभी अपने पति के परिवार के लिहाज व दबाव के कारण । इतना ही नहीं जब यही काम-काजी महिलाएँकाम के लिए बाहर जाती है तो काम तोउन्हें पुरुषों के बराबर ही करना पड़ता है उस पर घर की ज़िम्मेदारी भी । कुल मिला कर स्त्री का जीवन दोनों तरह से ही संघर्ष से पूर्ण है । बच्चों की ज़िम्मेदारी भी तो उसी महिला पर होती है ।जबकि वही पुरुष इन ज़िम्मेदारियों से आज़ाद होता हैअब इसमें सोचने की बात यह आती है कि घर और बाहर की ज़िम्मेदारियों को निभाने के बाद भी क्या उसे पुरुष के बराबर अधिकार मिल पाते हैं ? हालाँकि आजकल बदलते हुए परिवेश में कुछ पुरुष भी अपने  बच्चों के लिए उतने ही  ज़िम्मेदार रहते हैं जितनी की महिलाएँ किंतु अभी भी हमारा समाज इसे अस्वीकार करता है और उस पुरुष को " जोरू का गुलाम की संगया दे दी जाती है "इसमें एक बात मानने वाली यह भी है कि वह पुरुष जो कि समाज की नज़रों में जोरू का गुलाम तो बन जाता है पर क्या वह अपने बच्चों के लिए अपना सब कुछ छोड़ देता है ? जबकि एक स्त्री अपने परिवार के लिए अपने  ख्वाबों को अधूरा छोड़ अपने परिवार के ख्वाबों को ही पूरा करने में अपना जीवन बिता देती है फिर भी उसे वह सम्मान नहीं मिलता जितना पुरुष को।यदि वह अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए सोचे तो उस पर किसी न किसी बहाने परिवार का निर्णय थोप दिया जाता है ।और यदि वह इस निर्णय को अस्वीकार करना चाहे  तो उसे " चरित्रहीन या आज़ादी की मारी " की संगया देने से हमारा समाज नहीं चूकता । अंत में मैं यही कहूँगी कि आज़ाद हिंद की नारी के पैरों की बेड़ियाँ आज भी टूटी नहीं हैं । अपने पंखों को पूरी तरह परवाज़ देने के लिए उसके लिए खुला आसमान आज भी नहीं है । अपने ख्वाबों को हक़ीकत में बदलने में कुछ ही महिलाएँ सक्षम है । और ये वे महिलाएँ हैं जिन्हें ससुराल वमायका दोनों तरफ से पूरा सहयोग मिला है । अन्यथा हक़ीकत यह है कि  महिलाओं को बचपन से ही " एडजस्ट " शब्द का सही अर्थ बता दिया जाता है कभी यह कह कर कि पराए घर जाना है या यदि वह पराए घर में हो तो " माँ - बाप ने क्या यही सिखाया ?" कह कर । उसे आज भी हक नहीं है अपने ख्वाबों को संजोने और सपने साकार करने का ।
इतना ही नहीं कहीं तो दरिंदगी की हद ही हो गयी है । अगर नारी सचमुच आज़ाद होती तो क्या कन्या भ्रूण हत्याएँ होतीं ? शायद हमारा समाज नारी को एक इंसान के रूप में स्वीकारता ही नहीं वरना क्या गाँव क्या शहर कन्या भ्रूण हत्याएँ तो दोनों ही जगह हो रही हैं ।फिर नारी के लिए " आज़ाद " शब्द इस्तेमाल करने को मेरा मन गवाही नहीं देता ।
आज़ाद हिंद में नारी का हाल आज भी एक "नुचे पंखों वाली तितली के समान है "
रोचिका शर्मा ,चेन्नई

डाइरेक्टर , सूपर गॅन ट्रेडर अकॅडमी

अटूट बंधन



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