मंगलवार, 11 अगस्त 2015

आधी आबादी:कितनी कैद कितनी आजाद (कुसुम पालीवाल )

आधी आबादी-कितनी कैद कितनी आजाद




आधी आबादी-कितनी कैद कितनी आजाद


औरत पैदा नहीं होती औरत बनाई जाती है । मीरा बाई और महादेवी वर्मा के कथनानुसार अगर कहा जाए तो ,प्रतिकूल परिस्थितियो से जूझते हुए, अपने इच्छा बल पर नारी स्वतंत्रता के स्वरूप को साकार कर सकती है ।स्त्री हमेशा मातहत बन कर अत्याचार सहती है नारी सक्षम होगी, तभी अपने अधिकारों को रेखांकित कर पायेगी ।
                             वैसे देखा जाए तो स्त्रियों ने ही प्रथम सभ्यता की नीव डाली है ,उन्होंने ही मारे-मारे फिर रहे , जंगलो में भटकते हुए पुरूषों को हाथ पकड कर , नष्ट हुए स्तर को जीवन प्रदान किया तथा घर भी बसाया ।वैदिक युग स्त्रियों के चरम उन्नति का काल था ।इस युग में पुरुष और स्त्री के बौद्धिक स्तर को समान रूप से देखा जाता था किंतु वहीं मुगल शासन में स्थिति दयनीय हो गई थी और स्त्रियों पर अंकुश लगने लगा था 
आजादी केखिलाफ आधुनिक युग में अगर हम आते हैं तो दयनीय स्थिति में सुधार का कारण बने , मैथिली शरण गुप्त और जय शंकर प्रसाद । जहाँ अबला तेरी यही कहानी " और " नारी तुम श्रद्धा हो " कह कर ,नारी को संबोधित किया और सम्मान की दृष्टि दिलवायी
और आजादी के बाद थोडा सा बदलाव आया कि पुरुषों के साथ समान अधिकार मिला और एक औरत, केबल पत्नी नहीं केबल दासी नहीं बल्कि मित्रवत देखी जाने लगी ।
                                     लेकिन सच तो यह है वर्तमान समय में स्त्रियों के आत्म विश्वास और आत्म बल को हमारे समाज ने ही तोडा है । हमारा शिक्षित समाज आज भी स्त्रियों को सम्मान देने के संबंध में अशिक्षित ही रह गया है ।हमेशा से यही जाना गया है कि स्त्रियाँ शारीरिक तौर पर पुरूषों से कमजोर हैं किंतु हमारा मन यह नहीं मानता  जो स्त्री सृजन की शक्ति को रख सकती है , वो कमजोर कैसे हो सकती है ।स्वतंत्रता के पश्चात, पुरूषों के समक्ष बराबर आने का हौसला नारी में हुआ , लेकिन नारी स्वतंत्रता का आन्दोलन आज भी जारी है । स्त्री स्वतंत्रता मांग रही है।ग्रहणी - घर में काम करती हुई स्त्री , दफ्तर का दंड और पुरूष प्रेम के द्वन्द में दुविधा ग्रस्त स्त्री , बौद्धिक बनती स्त्री , अक्षर ज्ञान से रहित स्त्री , साक्षर बनती स्त्री ,,,,,,,, स्त्री, स्त्री, स्त्री ।लेकिन आज भी स्वतंत्रता चाहती है ।
                                         समाज का वातावरण हर ओर शंका से ग्रसित है शिक्षित और आत्म निर्भर स्त्री भी निर्भयता पूर्वक हो , कहीं  भी नहीं आ जा सकती ।एक अनचाहा डर उसके अस्तित्व को पूर्ण रूप से आकार नहीं लेने देता ।आज कल हमारे प्रत्येक वर्ग को सोच परिवर्तन की बहुत जरूरत है । कानून का अस्तित्व घटना के बाद होता है। जहाँ सोच स्वस्थ नही होगी , वहां नारी की स्थिति में कोई चमत्कारिक बदलाव नहीं आने वाला ।आज जरूरत है मानसिक स्तर पर नारी को सकारात्मक करने की और यह जिम्मेदारी समाज को बनाने वाली  दोनों इकाईयों की होती है यानि स्त्री और पुरुष वर्ग की ,,,,,,,,,,,,

 कुसुम पालीवाल नोयडा

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