मंगलवार, 25 अगस्त 2015

एक पाती भाई /बहन के नाम (वंदना बाजपेयी )











भैया ,
कितना समय हो गया है तुमको देखे हुए | पर बचपन की सारी बातें सारी शरारतें अभी भी जेहन में ताज़ा है | वो तुम्हारा माँ की डांट से बचने के लिए मेरे पीछे छुप जाना| वो मेज के नीचे घर बना कर खेलना | और वो लड़ाई भी जिसमें तुमने मेरी सबसे प्यारी गुड़ियाँ तोड़ दी थी | कितना रोई थी मैं | पूरा दिन बात नहीं की थी तुमसे | तुम भी बस टुकुर -टुकुर ताकते रहे थे "सॉरी भी नहीं बोला था | बहुत नाराज़ थी मैं तुमसे | पर सारी नाराजगी दूर हो गयी जब सोने के समय बिस्तर पर गयी तो तकिय्रे के नीचे ढेर सारी टोफियाँ व् रजाई खोली तो उसकी परतों में सॉरी की ढेर सारी पर्चियाँ | और बीच में एक रोती हुई लड़की का कार्टून | कितना हँसी थी मैं | तभी बीच में तुम आ गए अपराधी की तरह हाथ जोड़े हुए | कैसे न मॉफ करती | बहन में माँ जो छिपी होती है | फिर अगले पल झगडा .......... कार्टून में मेरी ही शक्ल क्यों बनायी, अपनी क्यों नहीं तुम कौन सा बड़े अच्छे दिखते हो|| वो तुम्हारा एग्जाम जब तुम हाथ झाड कर खड़े हो गए " दीदी कुछ नहीं आता और मैं रात भर तुम्हे पढ़ाती रही| कितनी बार मूर्ख आलसी कहा था तुम्हे | तुम चुप-चाप डांट खाते रहे | ऐंठना नहीं गलती भी तुम्हारी ही थी | पर जब रिजल्ट में पूरे नंबर आये तो आँखे छलक गयी थी मेरी | " राजा भैया , कितना होशियार है , एक दिन पढ़ कर ही पूरे नंबर ले आया | गदगद हो गयी थी मैं जब तुमने झट से पैर छू कर कहा था " दीदी ये तुम्हारी ही मेहनत का परिणाम है | केवल राखी के धागे ही नहीं | यादों के कितने धागे समेटने हैं | अबकी बरस .......... राखी बंधवाने आयोगे न भैया
वंदना बाजपेयी 



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