गुरुवार, 27 अगस्त 2015

एक पाती भाई /बहन के नाम (संजीत कुमार शुक्ला )











रक्षा बंधन का त्यौहार हो और बहनों के बारे में कुछ लिखना हो , तो  मन भावुक न हो ,ऐसा तो हो ही नहीं सकता | आज ऐसी ही कुछ मन : स्तिथि है | भाई -बहन का रिश्ता अनेकों रिश्तों को समेटे हुए है .... माँ ,बहन ,गुरु और दोस्त ... इस रिश्ते में जहाँ गुड की मिठास है , ईमली की खटास है और मिर्ची का तीखापन है | कुल मिला कर कम्पलीट फ़ूड पैकेज | बहन का रिश्ता एक ऐसा सेफ  रिश्ता है जहाँ आप जितना मर्जी रूठ जाइए ... सॉरी बोल कर मनाने बहने ही आएँगी | अगर खुदा न खास्ता बड़ी हों तो ... तो अपनी पाँचों अंगुलियाँ घी में | सौभाग्य से मेरी दोनों बहने मुझसे बड़ी हैं | पर ये पक्का है कि वो मुझे कभी बड़ा नहीं होने देंगीं | मुझे पूरा यकीं  है कि जब मेरे बाल सफ़ेद हो जायेंगे , कमर झुक जायेगी और हाथों में लाठी आ जायेंगी ( कुल मिलाकर हम एक रेस्पेक्ट्फुल कंडिशन में होंगे ) तब भी मेरी दोनों दीदीयाँ ये कहने से नहीं चुकेंगी | चुप हो जाओ अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है ,अक्ल कितनी है तुम्हे | और हम अपना हाई स्कूल सर्टिफिकेट लिए बैठे रह जायेंगे | खैर उस सजा में एक अपना मजा भी है | बचपन की कितनी बातें हैं | वो साथ साथ खेलना ,  लड़ाई - झगडे ,वो रूठना मनाना , और सबसे ज्यादा जब माँ कह देती कि तुम लोग बात -बात पर झगड़ पड़ते हो , अब आपस में बात मत करना , जो पहले बोलेगा उसी की पिटाई हो जायेगी | उफ़ ! माँ की ये सजा सबसे खतरनाक होती थी | कितनी बेचैनी होती थी बिना बोले | अपनी गलती नज़र आने लगती थी बेकार ही झगडा किया , ये चुप्पी बर्दाश्त नहीं होती | सीज फायर की घोषणा के बाद शुरू होता बोलने का सिलसिला | तब इतना बोलते कि ऐसा लगता जैसे जन्मों से नहीं बोले हों | जाने कितनी यादें चलचित्र की तरह चली आ रही हैं , विराम तो लगाना ही होगा |मेरी दोनों बहने दूर दूसरे शहरों में  हैं, आ नहीं पाएंगी | पर उनका भेजी हुई स्नेह से भीगी  राखी  मुझ तक पहुँच गयी है | ये अहसास ही तो हैं जो दूर रह कर भी हमें वायर लेस कनेक्शन से  गहरे जोड़े रखते हैं | फिर भी कभी -कभी मन वापस उस बचपन वाले रक्षा बंधन में लौट जाना चाहता है जब मैं राखी बंधवा कर  नेग के पैसे ले कर चिढाते हुए भागता था ... और पीछे -पीछे  बहने भागती थी ," मम्मी देखो मेरे पैसे दे नहीं रहा है " | लीजिये हम तो फिर भावुक हो गए | इसी भावुकता में हमें एक कविता याद आ गयी | पता नहीं किसने लिखी है ,पर है मेरे दिल के करीब ....................

कैसी भी हो एक
बहन होनी चाहिये..........।
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बड़ी हो तो माँ- बाप से बचाने वाली.
छोटी हो तो हमारे पीठ पिछे छुपने वाली..........॥
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बड़ी हो तो चुपचाप हमारे पाँकेट मे पैसे रखने वाली,
छोटी हो तो चुपचाप पैसे निकाल लेने वाली.........॥
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छोटी हो या बड़ी,
छोटी- छोटी बातों पे लड़ने वाली,एक बहन होनी चाहिये.......॥

                                                                       
बड़ी हो तो ,गलती पे हमारे कान खींचने वाली,
छोटी हो तो अपनी गलती पर,साँरी भईया कहने
वाली...
खुद से ज्यादा हमे प्यार करने वाली एक बहन होनी चाहिये.... ....॥ "

                                                          आप सभी को रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं| 

      संजीत कुमार शुक्ला 

अटूट बंधन

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