रविवार, 23 अगस्त 2015

हाय रे ! प्याज ....... वंदना बाजपेयी



हैलो भईया।

हाल ना पूछो मेरा भईया
कैसे तुम्हें बताऊँ
सब्जी मंडी में खड़ी हुई हूँ
चक्कर खा गिर ना जाऊं।
ठेले में सब्जी को देखकर
आहें मैं भरती हूँ
बचपन के वो प्याज भरे दिन
याद किया करती हूँ।

अस्सी  रूपये किलो प्याज हो गया
एक सौ बीस  में सेब है आता
इस दोनों में हो गया जैसे
भाई - बहन का नाता।
तन्खवाह तो बढती है भैया पर
खर्च और बढ़ जाता
इसीलिए तो आम आदमी
आम ही रह जाता।

सही कह गए ऋषि - मुनि 
वेद  ऋचा में गाकर
धर्म भ्रष्ट मत करना अपना
प्याज लहसुन खाकर।
दूरदर्शी थे वो पहले से ही 
सब जानते थे
प्याज की कीमत के भविष्य को
सतयुग में भी पहचानते थे।

अब पछताती हूँ क्यों मैंने
बात ना उनकी मानी
जाने कैसे शुरू हुई
ये प्याज से प्रेम कहानी।
ऐसा धोखा देगा मुझको
समझ नहीं मैं पायी
पहले काटने पर था रुलाता
अब देख आँख भर आई।

अबकी भईया रक्षा बंधन में
जब मेरे घर आना
तोहफे  के बदले साथ में अपने
कुछ प्याज लेते आना।
दो मुझको आशीर्वाद की
रोज़ प्याज मैं खाऊं
प्याज पकोड़े, प्याज की चटनी
प्याज़ की दाल पकाऊं।

अब रखती हूँ  भैया मुझको
वापस घर भी है जाना
खाली थैले से निकाल कर
कुछ है आज पकाना।

वंदना बाजपेयी 


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