शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

अटूट बंधन

अटूट बंधन  के पाठकों का शुक्रिया 


एक नन्हा सा जुगनू ,
निकल पड़ा
कोमल मखमली परों
पर रख कर
कुछ सपनों की कतरने 
हौसलों की
मुट्ठी भर धूप
देखते ही देखते
होने लगा उजियारा
कैसे ?
कोई परी
या
जादू की छड़ी
विश्वास नहीं होता
पर
करिश्में अब भी होते हैं
ये किसी करिश्में से कम नहीं कि इतने कम समय में कोई पत्रिका इतनी लोकप्रिय हो जाए .........पाठकों के फोन ,ईमेल और मिलने पर उनकी आँखों में श्रद्धा का भाव हमें यह अहसास दिला रहा है कि हम पूरी ईमानदारी के साथ अपना " वैचारिक क्रांति के अभियान" का उत्तरदायित्व निभा रहे हैं | हमें उम्मीद है आगे भी समस्त पाठक यूँ ही हमारा मनोबल बढाते रहेंगे और हम अच्छा काम करते रहेंगे .......पूरा "अटूट बंधन "परिवार इस सहयोग व् सराहना के लिए अपने सभी पाठकों का ह्रदय से धन्यवाद व्यक्त करता है

अटूट बंधन। ............. हमारा पेज 



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