सोमवार, 20 जुलाई 2015

गीता दत्त की पुन्य तिथि पर विशेष :" कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी

                    



हूँ मैं कितनी अकेली वो ये जान के 
मेरे बेरंग जीवन को पहचान के 
मेरे हांथों को थामे हँसे और हंसाये 
मेरा दुःख बुलाये किसी का क्या जाए 
                              ये मात्र एक खूबसूरत गीत ही नहीं सुरों की मल्लिका गीता दत्त के पूरे जीवन का दर्द था । अपने सुरों से श्रोताओ का मन भिगोने वाली गीता दत्त का जीवन एक अतृप्त प्यास की दास्तान हैं । एक असफल विवाह और बाद में गुरुदत्त की मृत्यु ने उन्हें अन्दर तक तोड़ दिया  और मात्र ४२ वर्ष की आयु में उन्होंने इस नश्वर संसार से विदा ले ली । आज उनकी पुन्य तिथि पर  जानते हैं गीता दत्त को कुछ करीब से ।  


गीता दत्त : जीवन परिचय
पूरा नाम : गीता रॉय (शादी के बाद दत्त) 

जन्म : 23 नवम्बर 1930 
जन्म स्थान : बेजिनपुरा गाँव (बंगाल का फरीदपुर जिला) 
विवाह : 26 मई 1953 फिल्मकार गुरुदत्त से 
पहला गीत : सुनो-सुनो हरि की लीला सुनाएँ (भक्त प्रहलाद’ : 1946)
लोकप्रियता मिली : मेरा सुंदर सपना बीत गया’ (दो भाई : 1947) 
निधन : 20 जुलाई 1973 

जीवन परिचय

फ़िल्म जगत में गीता दत्त के नाम से मशहूर गीता घोष राय चौधरी का जन्म २३ नवम्बर १९३०  शहर में हुआ। जब वे महज 12 वर्ष की थी तब उनका पूरा परिवार अब बंगलादेश  में फरीदपुर से मुबई  आ गया। उनके पिता जमींदार थे। बचपन के दिनों से ही गीता दत्त का रूझान संगीत की ओर था और वह पा‌र्श्वगायिका बनना चाहती थी। गीता दत्त ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हनुमान प्रसाद से हासिल की

गायन प्रतिभा

दिलों की गहराई तक उतर जाने वाली आवाज़ और गाने के दिलकश अंदाज़ की मलिका गीता दत्त भारतीय फ़िल्म संगीत में पश्चिमी प्रभाव की पहचान थी और वह ऐसी फनकार थी जिन्हें हर तरह के गीत गाने में महारत हासिल थी। गीता दत्त की जादुई आवाज़ सबसे पहले जोगनमें सुनने को मिली। इस फ़िल्म में उन्होंने मीरा के आर्त्तनाद को उंडेलकर श्रोताओं को विरही बना दिया है। वे खुलकर गाती हैं-

मैं तो गिरधर के घर जाऊँ। घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया

 मिलेंगे। 

 उनके द्वारा गया गया खूबसूरत गीत आज भी मन को झंकृत करता है 

जोगी मत जा, मत जा...

 गीता दत्त ने गुरुदत्त की फ़िल्मों में बेहतरीन गायन किया  है। गले से नहीं दिल से। उनके मन की बेचैनी तथा छटपटाहट एक-एक शब्द से रिसती मिलती है। फ़िल्म चाहे बाजीहो या आरपार’, ‘सीआईडीहो या प्यासा’, ‘कागज के फूलहो या चौदहवीं का चाँद ह्रदय  उनके स्वर की विविधता का कायल हो जाता है |

तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले (बाजी),

                                       ये जिन्दगी एक बाजी ही तो है कोई जीते कोई हारे ,खेल तो चलता ही रहता है । पर ये गीत हार -जीत की पायदानों से ऊपर निकल कर अमर हो गया 

बाबूजी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना...हाँ बड़े धोखे हैं इस प्यार में। 
              गीता दत्त की आवाज़ में एक लोकप्रिय गीत है 


ये लो मैं हारी पिया, हुई तेरी जीत रे।

इस गीत में उन्होंने अपनी चुलबुली आवाज़ में  में रूठने मानाने के भाव का सुन्दर सम्प्रेषण किया है |
साहब बीवी और गुलामफिल्म भले ही छोटी बहू यानी कि मीना कुमारी की फिल्म रही हो, लेकिन छोटी बहू का दर्द, शिकायत, अकेलेपन की पीड़ा, पति की बेवफाई को गीता की आवाज ने परदे पर ऐसा उतारा कि मीना अमर हो गईं।

न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी।और मीना के साथ सिनेमाघर के अँधेरे में डूबे हजारों दर्शक रोए।  गीता दत्त ने हर तरह के गाने गाए हैं। फिल्म बाजीके गीत जरा सामने आ, जरा आँख मिला’ में श्रोताओं को उन्मादी स्वर मिलते हैं। भाई-भाईका गीत 
ऐ दिल मुझे बता दे, तू किसपे आ गया है सुनकर मन प्रेम की सफलता से भर जाता है। प्यासाकी गुलाबो का जीवन संगीत सुनकर मन अतृप्त प्यास में खो जाता है- आज सजन मोहे अंग लगा ले, जनम सफल हो जाए।

बांग्ला फ़िल्मों में गायन

हिन्दी के अलावे गीता दत्त ने कई बांग्ला फ़िल्मों के लिए भी गाने गाए। इनमें तुमी जो आमार (हरनो सुर-1957), निशि रात बाका चांद (पृथ्वी आमार छाया-1957), दूरे तुमी आज (इंद्राणी-1958), एई सुंदर स्वर्णलिपि संध्या (हॉस्पिटल-1960), आमी सुनचि तुमारी गान (स्वरलिपि-1961) जैसे गीत श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है

गीता दत्त : सदाबहार गीत 
* खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते (बावरे नैन : 1950) 

* सुनो गजर क्या गाए (बाजी : 1951) 
* न ये चाँद होगा, न ये तारे रहेंगे (शर्त : 1954) 
* कैसे कोई जिए, जहर है जिन्दगी (बादबान : 1954) 
* जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी (मिस्टर एंड मिसेस 55 : 1955) 
* जाता कहाँ है दीवाने (सीआईडी : 1956) 
* ऐ दिल मुझे बता दे, तू किसपे आ गया है (भाई-भाई : 1956) 
* आज सजन मोहे अंग लगा ले (प्यासा : 1957) 
* मेरा नाम चिन-चिन चू (हावड़ा ब्रिज : 1958) 
* वक्त ने किया क्या हँसीं सितम (कागज के फूल : 1959)

यात्रा समापन 


सत्तर के दशक में गीता दत्त की तबीयत खराब रहने लगी और उन्होंने एक बार फिर से गीत गाना कम कर दिया। लगभग तीन दशक तक अपनी आवाज़ से श्रोताओं को मदहोश करने वाली पा‌र्श्वगायिका गीता दत्त ने अंतत: २० जुलाई सन १९७२  को इस दुनिया से विदाई ले ली।आज गीता दत्त का नश्वर शरीर भले ही हमारे बीच नहीं है पर अपनी आवाज़ को हर तरह के भावों के साथ ढा लने की क्षमता रखने वाली ये अद्भुत स्वर साम्राज्ञी अपने गीतों के मध्यं से सदा हमारे दिलों में जीवित रहेगी।
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