रविवार, 28 जून 2015

विदाई


                                           

जीवन भी कितना विचित्र है आज यूँ ही मुकेश का गाया  यह गीत कानों में पड  गया और मन की घडी के कांटे उलटे चलने लगे ।
ये शहनाईयाँ दे रही हैं  दुहाई ,
कोई चीज अपनी हुई है पराई
किसी से मिलन है किसी से जुदाई
नए रिश्तों ने तोडा नाता पुराना ...........

                                             बात तब की है जब मैं बहुत छोटी थी घर के पास से शहनाई की आवाज़ आ रही थी । थोड़ी देर सुनने के बाद एक अजीब सी बैचैनी हुई..... जैसे कुछ टूट रहा हैं कुछ जुड़ रहा है । आदतन अपने हर प्रश्न की तरह इस प्रश्न के साथ भी  माँ के पास  जाकर  मेरा अबोध मन पूँछ उठा " माँ ये कौन सा बाजा बज रहा है ,एक साथ ख़ुशी और दुःख दोनों महसूस हो रहा है । तब माँ ने सर पर हाथ फेर कर कहा था " ये शहनाई है। अंजू दीदी की विदाई हो रही है ना । इसलिए बज रही है । अब अंजू दीदी यहाँ नहीं रहेंगी अपने ससुराल में अपने पति के साथ रहेंगी । क्यों माँ आंटी -अंकल ऐसा क्यों कर रहे है क्यों अपनी बेटी को दूसरे के घर भेज रहे हैं । क्या सब बेटियां दूसरों के घर भेजी जाती हैं ? क्या मुझे भी आप दूसरे के घर भेज देंगी । माँ की आँखें नम हो गयी । हां बिटिया  ! हर लड़की की विदाई होती है । उसे दूसरे के घर जाना होता है । तुम्हारी भी होगी । मेरे घबराये चेहरे को देखकर माँ ने मेरे सर पर हाथ फेर कर किसी कविता की कुछ पक्तियाँ दोहरा दी । पता नहीं किसकी थी पर जो इस प्रकार हैं। .............

कहते हैं लोग बड़ी शुभ घडी हैं
शुभ घडी तो है पर कष्टदायक बड़ी है
जुदा  होता है ,इसमें टुकड़ा जिगर का
हटाना ही पड़ता है दीपक ये घर का
                                             उस दिन पहली बार समझ में आया था ये घर मेरा अपना नहीं है मुझे जाना पड़ेगा … कहीं और । पर बचपन की खेल कूद में कब का भूल गयी । एक दिन यूँही माँ ने आरती कर के रखी थी।तेज हवा का झोंका आया और वो बुझ गयी । मैं जोर से  चिल्लाई "माँ आरती बुझ गयी ,आरती बुझ गयी ". । माँ ने डाँट कर कहा " बुझ गयी नहीं कहते …  कहते हैं विदा हो गयी ।  माँ के शब्दों को मैं देर तक सोचती रही  आरती विदा हो गयी । कैसे ,कहाँ ,किसके साथ ……शायद प्रकाश  अन्धकार के साथ  विदा हो गया…… जो कुछ पीछे छूट गया वो बुझ गया । जीवन के पथ पर जब दो लोग  एक साथ आगे बढ़ जाते हैं ,या विदा हो जाते हैं तो  जो  पीछे जो छूट जाते हैं वो बुझ जाते हैं ।क्या दिन संध्या के रूप में दुल्हन की तरह तैयार होता है और विदा हो जाता है रात के साथ ? रात  खिलते कमल के फूलों और कलरव करते पंक्षियों की बारात के आगमन पर  उगते भास्कर की रश्मियों की डोली में बैठकर विदा हो जाती है दिन के  साथ ?क्या विदाई ही जीवन सत्य है ,अवश्यसंभावी है ।   क्या यही है "किसी से मिलन किसी से जुदाई " मेरे पास अपने ही प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था ।
    अक्सर देखती थी किसी लड़की की विदा पर माँ और लड़की तो रोते ही थे बाकी सब नाते -रिश्तेदार जाने  क्यों रोते थे ,वो तो साथ में भी नहीं रहते थे । शायद वो जानते थे की विदाई ही जीवन का सच हैं । जीवन है तो कभी ङ्कभी कोई न कोई विदाई होनी ही है । हालाँकि हमारे  सखियों के ग्रुप में  अक्सर ऐसा होता था किन्हीं दो सखियों की मित्रता घनी हुई व् वो ग्रुप से अलग हुई ,अक्सर देखा था पर इसे विदाई नहीं माना  । तब तो इतना ही जानती थी कि विदाई लड़कियों की ही होती है। ……… जब भैया की शादी हुई तो भाभी को विदा करा कर लाये तब ये कहाँ जाना था की एक विदाई और हो रही है  …बहन के रूप में भाई पर अधिकार की ,आपस में बिताये जाने वाले समय की जो २ ४ घंटों से घटकर आरती की थाली में रखे राखी के धागे नन्ही सी रोली के टीके और अक्षत के चावलों में सिमट कर रह जाने वाले हैं ।
                    शायद वो भी एक विदाई ही थी जब उस स्कूल को छोड़ा था जहाँ बचपन से पढ़ रही थी । फेयर वेल का फंक्शन था । साड़ी लडकियाँ खाने में जुटी थी और हम कुछ सहेलियाँ रोने में । अजीब सा दुःख था……कल से नहीं आना है इस स्कूल में जहाँ रोज आने की आदत थी । तब हमारी प्रिंसिपल सिस्टर करेजिया ने जोर से घुड़की दी थी। फेल हो जाओ यहीं रह जाओगी । और हम आंसूं पोंछ कर विदा होने को तैयार हो गए ।

                             विदाई को कुछ कुछ समझा था अपनी बड़ी बहन की विदा पर । साथ खाना ,खेलना ,पढना सोना । छोटी होने के नाते कुछ आनावश्यक फायदे भी लेना  ....... कुछ अच्छा खाने का मन  कर रहा है " दीदी है ना ' ये दुप्पट्टा ठीक से पिन अप  नहीं है …  दीदी है ना । बर्थडे  पार्टी में क्या पहनूँ ....  दीदी है ना वो बताएगी । शादी बारात की ख़ुशी के बीच ये ध्यान ही नहीं गया कि दीदी घर छोड़ कर चल देगी । उस दिन आंसूओं के बीच प्रेम चन्द्र की दो  बैलों की जोड़ी बहुत याद आई । उफ़ ! क्या बीती होगी हीरा -मोती पर । मेरे तो सींग नहीं थे ………… होते तो भी क्या बाडा  तोड़कर बाहर भाग सकती थी ? जब  सीख गयी थी अकेले रहना ....... तब तक मेरी विदाई का समय आ गया । कहीं से टूटना कहीं जुड़ना । पराये घर में किसी को अहसास न होने देना " कि बहुत याद आ रही है  अम्माँ की , कोई भैया को बुला लायो ,कोई तो पापा से कह दो फोन कर लिया करे ,हमे संकोच लगता है । पर नहीं ....लड़कियों को तो पराये घर जाना ही होता है । रातो -रात बेटी से बहु की पायदान तय करते हुए एक अल्हड किशोरी से परिपक्व महिला बन जाना होता है ।   तब जाना था एक अधूरापन स्त्री की किस्मत से जुडा  होता है । जहाँ भी होती है आधी ही होती है ,कभी कहीं पूरी हो ही नहीं पाती । मायके में रहती है तो मन ससुराल में ,ससुराल में रहती है तो मन मायके में । धरती और आकाश भी क्षितिज पर मिल जाते हैं पर स्त्री के जीवन का कोई क्षितिज नहीं होता । वह जिंदगी भर भागती रहती है ,एड़ी चोटी  का जोर लगाती रहती है........ इन डॉ घरों के बीच ,यहाँ वहां कहीं हाँ कहीं  तो होगा उसका क्षितिज ……मुट्ठी भर भर ही सही ,चुटकी भर ही सही.............. हतभाग्य स्त्री का कोई क्षितिज नहीं होता । टॉलस्टॉय  की कहानी " हाउ मच लैंड ए मैन डस नीड " की तरह… क्षितिज  की तलाश चिता की राख में ही मिटती है ।
                           विचित्र है पर  विदाई सब की होती है ।  बेटे भी विदा होते हैं माँ से धीरे -धीरे ………कब अधिकार और प्रेम पत्नी के हवाले कर माँ के लिए केवल कर्तव्य बोध रह जाता है । किसी से मिलन किसी से जुदाई । और वो देखो समय का रथ भी तो डोली लिए तैयार रहता है हर समय .......... हर पल जो अभी है पलक झपकते ही आने वाले के साथ विदा हो जाता है.......... कभी न मिलने वाला एक अतीत छोड़कर ।
           बचपन से लेकर अब तक पता नहीं कितनी बार विदाई हुई । एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश एक शहर से दूसरे शहर । पर इन  सबसे ऊपर होती है अंतिम विदाई । आत्मा की दुल्हन .......  चिता की अग्नि के फेरे लेते हुए चल पड़ती है पर्मात्मा  के साथ  । भरे ह्रदय से ही विदा की रस्म तो निभानी ही है । आलता ,महावर ,बिछिया ,सिन्दूर और लाल चुनरी ................ कोई कमी न रह जाए दुल्हन के श्रृंगार में । विदाई ही शाश्वत है ………  पीछे छूट जाते हैं रोते बिलखते ,बच्चे परिवार,नाते रिश्तेदार आँखों में आँसू लिए । चल देती है दुल्हन। ………… क्या पता कितनी टूटी , कितनी व्याकुल । विदाई कितनी भी पीडादायक हो ,पर वही  सत्य है। अंत उसी गीत की पक्तियों से करूंगी जिससे आरभ किया था । शायद यही इस पीड़ा से उबरने का उपाय भी है ।

ये बोले समय की नदी का भाव
ये बाबुल की गलियाँ ये कागज़ की नाव
चली हो जो गोरी ,सुनो भूल जाओ
न फिर याद करना ,न फिर याद आना…………

वंदना बाजपेयी



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