बुधवार, 17 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "....डर (कहानी -रोचिका शर्मा )


                        




डर


रीना एक पढ़ी-लिखी एवं समझदार लड़की थी । जैसे ही उसके रिश्ते  की बातें घर में होने लगीं उसके मन में एक डर घर करने लगा , वह था ससुराल का डर। वह तो अरेंज्ड मॅरेज के नाम से पहले से ही डरती थी । फिर भी कुँवारी तो नहीं रह सकती थी । दुनिया की प्रथा है विवाह ! निभानी तो पड़ेगी । यह सोच उसने अपने पिताजी को बता दिया कैसा लड़का चाहिए । फिर क्या था पिताजी ढूँढने लगे पढ़ा-लिखा एवं खुले विचारों वाला लड़का । बड़ी लाडली थी वह अपने पिता की । एक दिन लड़का व उसके परिवार वाले उसे देखने आए । गोरा रंग, सुन्दर कद-काठी एवं रहन-सहन देख लड़का तो जैसे उस पर मोहित हो गया ।
और उसी समय रिश्ते के लिए हाँ कर दी । लड़के के माता-पिता ने भी अपने बेटे की हाँ में हाँ मिला दी । फिर क्या था चट मँगनी पट ब्याह । हाँ विवाह में ज़रूर रिश्तेदारों ने अपनी फ़रमाइशों व रीति-रिवाजों की आड़ में काफ़ी परेशान किया । रीना तो स्वयं रीति-रिवाजों और रिश्तेदारों से घिरी हुई थी सो उसे तो भनक भी न लगी कि शादी में कोई मन-मुटाव हो गया है । जब विदाई का समय आया अपने पिता की लाडली रीना ने एक आँसू न बहाया । सोचा उसके पिता को दुख पहुँचेगा और हंसते-हंसते विदा हो गयी । ससुराल के रास्ते में ही उसके पति ने उसे शादी में हुए मन-मुटाव के बारे में बताया । और समझाया कि रिश्तेदार नाराज़ हैं और हो सकता है उसे भला-बुरा कहें ।रीना को अरेंज्ड मॅरेज में जिस बात से डर था वही हुआ ।



गूगल से साभार 

जैसे ही वह ससुराल पहुँची सभी रिश्तेदारों की फौज  ने उसे घेर लिया और फिर ससुराल की रस्में शुरू हो गयीं । बात-बेबात कोई न कोई रिश्तेदार उस पर व्यंग्य करते और शादी की रस्मों को लेकर उस पर ताने मारते । ननद का तो मुँह पूरे समय फूला ही रहता  । अब वह ससुराल में डरी-सहमी ही रहती । सोचती पति न जाने कैसा होगा । फिर भी शायद माँ-पिताजी के दिए संस्कार थे या डर जिनके कारण वह मुँह भी न खोलती । बार-बार उसे अपने पिता की याद आती । कई बार आँखों से आँसू बह निकलते और वह सोचती क्यूँ किया विवाह ? इससे तो वह अपने घर में ही भली थी । एक माह बीत गया, सभी रिश्तेदार अपने-अपने घर जा चुके थे एवं ननद भी ससुराल जा चुकी थी । चुप-चापमूक बन वह मुँह नीचे किए सारा घर का काम करती एवं कभी-कभी अकेले में अपने पिता को याद कर रो लेती ।
शायद थकान के कारण या इतने काम की आदत न होने के कारण उसकी तबीयत बिगड़ गयी व उसे जुकाम ,बुखार हो गया । पाँच -छह दिन में तो उसकी हालत बहुत खराब हो गयी । डॉक्टर की दवा तो वह ले रही थी किंतु खाँसी थी कि ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी । सारा दिन एवं रात को वह खों-खों कर खाँसती रहती । तभी एक दिन उसके ससुर जी आए और बोले बेटा यह लो मैं ने अदरक का रस निकाला हैं थोड़ा इसे पी लो तुम्हारी खाँसी ठीक हो जाएगी । जैसे ही रीना ने ऊपर मुँह उठाया उसके ससुर उसे प्यार से देख मुस्कुरा रहे थे । उस प्यार भरी मुस्कुराहट को देखते ही रीना की आँखों में आँसू आ गये ।
उसे अपने पिता की  ही छवि ससुर जी में नज़र आई ।उसने झुक कर अपने ससुर के पैर छू लिए । ससुर ने उसे बोला बेटी मैं भी तुम्हारे पिता के समान हूँ और बेटियाँ पैर नहीं छूती । मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है । आज से इस घर में मैं ही तुम्हारा पिता हूँ , तुम्हें कोई भी तकलीफ़ हो तो मुझे बताना । रीना की आँखों में आँसू थे। उसे तो एक पिता का घर छोड़ते ही दूसरे घर में पिता मिल गये थे जिसकी उसने सपने में भी कल्पना न की थी । आँख में आँसू फिर भी वह मुस्कुरा रही थी । और वह डर हमेशा के लिए ख़त्म हो गया था ।
                        रोचिका शर्मा, चेन्नई
डाइरेक्टर,सूपर गॅन ट्रेडर अकॅडमी

                        (www.tradingsecret.com)

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5 टिप्‍पणियां:

  1. I am glad there is change of heart and mindset with the advent of education in our society. Congrats to Ms. Sharma for knitting the story well and for driving the message home!

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  2. बस इसी बदलाव की जरूरत है

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  3. हर बहू को ससुराल में ऐसे ही पिता की आवश्यकता है . समाज के लिए सुन्दर संदेश

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