गुरुवार, 11 जून 2015

आयुष झा "आस्तीक " की स्त्री विषयक कवितायें


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आयुष झा "आस्तीक " ने अल्प समय में कवितों के माध्यम से अपनी पहचान बना ली है | वह विविध विषों पर लिखते हैं | विषयों पर उनकी सोच और पकड़ काबिले तारीफ़ है | आज कल स्त्रियों पर बहुत लिखा जा रहा है एक तरफ जहाँ स्त्रियों के लेखन में उनका भोग हुआ यथार्थ है वही जब पुरुष स्त्रियों के बारे में लिखते हैं तो अंतर्मन की गहराइयों में जाकर स्त्री मन की संवेदनाओं को पकड़ने का प्रयास करते हैं | और काफी हद तक सफल भी होते हैं | आज हम" अटूट बंधन "आयुष झा "आस्तीक की कुछ स्त्री विषयक कवितायें लाये हैं |जिसमें उन्होंने नारी मनोभावों को चित्रित करने का प्रयास किया है | वो इसमें कहाँ तक सफल है ....पढ़ कर देखिये 

ससूराल की ड्योढी पर 
प्रथम कदम रखते ही 
नींव डालती है वो 
घूंघट प्रथा की /जब 
अपनी अल्हडपन को 
जुल्फों में गूँठ कर/ सहेज 
लेती है वो 
अपने आवारा ख्यालों को 
घूंघट में छिपा कर ..... 
अपनी ख्वाहिशों को 
आँचल की खूट में 
बाँध कर वो 
जब भी बुहारती है आँगन 
एक मुट्ठी उम्मीदें 
छिडक आती है 
वो कबूतरों के झूंड में .... 
मूंडेर पर बैठा काला कलूटा 
कन्हा कौआ अनुलोम-विलोम





                   



.उपवास रखने वाली 
जिद्दी तुनकमिजाज औरतें 
______________________ 

अविवाहीत लडकी से 
संपुर्ण स्त्री बनने का सफर 
सात कदमों का होता है 
लेकीन प्रत्येक कदम पर 
त्याग सर्मपण और 
समझौता के पाठ को 
वो रटती है बार-बार .... 
मायके से सीख कर आती है 
वो हरेक संस्कार पाठ जो 
माँ की परनानी ने 
सीखलाया था 
उनकी नानी की माँ को कभी ... 
ससूराल की ड्योढी पर 
प्रथम कदम रखते ही 
नींव डालती है वो 
घूंघट प्रथा की /जब 
अपनी अल्हडपन को 
जुल्फों में गूँठ कर/ सहेज 
लेती है वो 
अपने आवारा ख्यालों को 
घूंघट में छिपा कर ..... 
अपनी ख्वाहिशों को 
आँचल की खूट में 
बाँध कर वो 
जब भी बुहारती है आँगन 
एक मुट्ठी उम्मीदें 
छिडक आती है 
वो कबूतरों के झूंड में .... 
मूंडेर पर बैठा काला कलूटा 
कन्हा कौआ अनुलोम-विलोम 
करता है तब /जब 
कौआ की साँसे 
परावर्तित होती है 
स्त्री की पारर्दशी पीठ से 
टकरा कर .... 
जीद रखने वाली 
अनब्याही लडकीयां 
होती है जिद्दी 
विवाह के बाद भी/ बस जीद 
के नाम को बदल कर 
मौनव्रत या उपवास 
रख दिया जाता है / अन्यथा 
पुरूष तो शौख से माँसाहार होते हैं 
स्त्रीयों के निराहार 
होने पर भी.. 
सप्ताह के सातो दिन सूर्य देव 
से शनी महाराज तक का 
उपवास/ पुजा अर्चना 
सब के सब 
बेटे/पति के खातीर .... 
जबकी बेटी बचपन से ही 
पढने लगती है 
नियम और शर्तें 
स्त्री बनने की ! 
और पूर्णतः बन ही तो 
जाती है एक संपुर्ण स्त्री 
वो ससूराल में जाकर.... 
आखीर बेटे/पति के लिए 
ही क्युं ? 
हाँ हाँ बोलो ना 
चुप क्युं हो ? 
बेटीयों के चिरंजीवी होने की 
क्यूं नही की जाती है कामना... 
अगर उपवास रखने से ही 
होता है 
सब कुशल मंगल ! 
तो अखंड सौभाग्यवती भवः 
का आर्शीवाद देने वाला 
पिता/मंगल सूत्र पहनाने 
वाला पति 
आखीर क्युं नही रह पाता है 
एक साँझ भी भूखा.... 
सुनो , 
मेरी हरेक स्त्री विमर्श 
कविता की नायिका 
कहलाने का 
हक अदा करने वाली 
जिद्दी तुनकमिजाज औरतों ! 
देखो ! 
हाँ देखो , 
तुम ना स्त्री-स्त्री 
संस्कार-संस्कार 
खेल कर 
अब देह गलाना बंद करो .... 
मर्यादा की नोंक पर टाँक कर 
जो अपनी ख्वाहिशों के पंख 
कतर लिए थे तुमने/ 
अरी बाँझ तो नही हो ना ! 
तो सुनो ! 
इसे जनमने दो फिर से..... 
स्त्री होने के नियम शर्तों को 
संशोधित करके/ 
बचा लो तुम 
स्त्रीत्व की कोख को 
झूलसने से पहले ही ......





 लडकियों के शयनकक्ष में 
__________________
 
लडकियों के शयनकक्ष में 
होती है तीन खिडकियां 
दो दरवाजे 
तीन तकिए और 
तीन लिफाफे भी ... 
दो लिफाफे खाली और 
तिसरे में तीन चिट्ठीयां ... 
पहले लिफाफ में 
माँ के नाम की 
चिट्ठी डाल कर वो पोस्ट 
करना चाहती है ! 
जिसमें लडकी 
भागना चाहती है 
घर छोड कर ... 
दुसरे खाली लिफाफे में 
वो एक चिट्ठी 
प्रेयस के नाम से 
करती है प्रेषीत... 
जिसमें अपनी विवशता का 
उल्लेख करते हुए 
लडकी घर छोडने में 
जताती है असमर्थता .... 
तीसरे लिफाफे के 
तीनों चिट्ठीयों में 
वो खयाली पुलाव पकाती है 
अपने भूत-वर्तमान और 
भविष्य के बारे में ... 
अतीत को अपने चादर के 
सिलवटों में छुपा कर भी 
वो अपने प्रथम प्रेम को 
कभी भूल नही पाती है 
शायद ... 
जो उसे टीसती है जब भी 
वो लिखती है 
एक और चिट्ठी 
अपने सपनों के शहजादे 
के नाम से.... 
उनके सेहत,सपने और 
आर्थीक ब्योरा का भी 
जिक्र होता है उसमें ... 
अचानक से 
सामने वाले दरवाजे से 
भांपती है वो माँ की दस्तक । 
तो वही पिछले दरवाजे पर 
वो महसूसती है 
प्रेयस के देह के गंध को ..... 
लडकी पृथक हो जाती है 
अब तीन हिस्से में ! 
एक हिस्से को बिस्तर पर 
रख कर, 
माथा तकिए पर टीकाए हुए , 
दुसरा तकिया पेट के नीचे 
रख कर 
वो ढूँढती है पेट र्दद के 
बहाने ..... 
तीसरे तकीए में 
सारी चिट्ठीयां छुपा कर 
अब लडकी बन जाती है 
औरत .... 
जुल्फों को सहेज कर 
मंद मंद मुस्कुराते हुए 
वो लिपटना चाहती है माँ से ... 
तीसरे हिस्से में लडकी 
बन जाती है एक मनमौजी 
मतवाली लडकी ! 
थोडी पगली जिद्दी और 
शरारती भी... 
वो दिवानी के तरह अब 
बरामदे के तरफ वाली 
खिडकी की 
सिटकनी खोल कर 
ख्वाहिशों की बारीश में 
भींगना चाहती है ...... 
प्रेयस चाॅकलेटी मेघ बन कर 
जब भी बरसता है 
खिडकी पर ! 
वो लडकी पारदर्शी सीसे को 
अनवरत चुमते हुए 
मनचली बिजली 
बन जाती है ..... 
अलंकृत होती है वो 
हवाओं में एहसास रोपते हुए ।



 चालीस पार की हुनरमंद औरतें 
________________

इतनी हुनरमंद होती है ये औरतें 
कि भरने को तो भर सकती हैं 
ये चलनी में भी टटका पानी। 
मगर घड़ा भर बसिया पइन से 
लीपते पोतते नहाते हुए यह धुआँ धुकर कर 
बहा देती है 
स्वयं की अनसुलझी ख्वाहिशें। 
रेगिस्तान को उलीछ कर सेर- 
सवा सेर 
माछ पकड़ने के लिए तत्पर रहती है ये 
औरतें! 
कभी बाढ़ कभी सुखाड़ 
मगर उर्वर रहती है ये औरतें। 
ख्वाहिशों की विपरीत दिशा में 
मन मसोस कर 
वृताकार पथ पर गोल गोल चक्कर 
लगाती हुई 
ये औरतें 
पसारती बुहारती रहती है 
उम्मीदों की खेसारी चिकना। 
फिसलना पसंद है इन्हें 
अपनी जिजीविषा को सँभालने के 
लिए। 
आईने के समक्ष 
घूस में अदाएँ दिखलाते हुए उसे कर 
लेती है राज़ी 
झूठी तारीफ़ें करने के लिए। 
आँखों के नीचे के काले धब्बे 
को जीभ दिखला कर 
और चेहरे पर पसरे सन्नाटे को 
रतजगा रूमानी 
ख़्वाबों की निशानी का नाम देकर 
स्वयं को झूठी सांत्वना देती रहती है 
ये औरतें! 
कि दरअसल यही तो है वो लक्षण 
कि वो दिन प्रतिदिन हो रही है 
बचपना से जवानी की ओर अग्रसर। 
पर अफ़सोस कि इस 
झूठी सांत्वना को भजा-भजा कर 
उम्मीदों का डिबीया लेसते हुए मन 
ही मन खाता रहता उन्हें 
घुप्प अँधेरा होने का डर। 
डरने लगती है ये एकांत में भूत-भूत 
चिल्लाते हुए! 
जब बढ़ती उम्र सौतन बन कर मुँह 
चमकाती है इन्हें। 
सुनो ऐ 
चालीस पार की हुनरमंद औरतें!! 
अपनी उम्र को रख दो तुम संदुकची में 
छिपा कर! 
कबूतरों में बाँट 
दो ज़िम्मेदारियों का कंकड़! 
पुनः ख़्वाबों को सिझने दो मध्यम 
आँच पर 
अपनी ख़्वाहिशों से अनवांछित 
अनसुलझी उलझनों को पसा कर 
सहेज कर बाँध लो 
आँचल की खूँट में। 
कहो कब तक दलडती रहोगी 
यूं अपनी छाती पर दलहन 
सुनो 
देह गलाना छोड दो तुम 
व्यर्थ की चिंता और नियम धियम 
का पसरहट्टा सजा कर। 
हाँ सुनो ऐ 
चालीस पार की हुनरमंद औरतें! 
तुम हो जादूगरनी 
क्या यह तुमको पता है ? 
तुम्हारे देह की गंध से 
ठंड में भी बादल का पनिहयाना 
अजी टोना टनका नहीं 
तो यह कहो और क्या है? 
हाँक कर गाछ-पात 
तुम नाप सकती हो नभ को 
बस हौसला चाहिए 
इस पिंजरे की खग को। 
नियम शर्तो के पिंजरे को 
कुतर दो ऐ चुहिया 
बस स्वयं को पहचानो 
तुम हो सावित्री 
हाँ तुम्हीं हो अनसुइया। 
हाँ सचमुच पतिवत्रा हो तुम 
ऐ पवित्र जाहनुतनया! 
बस खुश रहो तुम हमेशा 
भाड़ में जाए यह दुनिया। 



खानदानी घरेलू औरतें 
________________

खानदानी घरेलू औरतों के 
पहनावा- ओढावा में 
छुपा होता है 
इनके खानदानी होने का रहस्य .... 
पुरानी ही सही 
पर मैली कूचैली ना हो 
साडी/ 
हाँ लेकिन साडी पहनने का ढंग 
जरूर हो पुराना/ उल्टा आँचल 
लेने से हद तक परहेज ही 
करना चाहेगी ये औरतें .... 
यहाँ तक की पल्लू ओढने का 
अंदाज उइमा 
जैसे की मूँह दिखाई का रस्म 
अदा करके आई हो अभी के अभी... 
घूँघट में खनकने वाली 
चौवन्नीयाँ मुस्कान से 
खूदरा/रैजकी बटोर कर 
कंगाल पति हो जाता है अमीर .... 
और खरीद लाता है 
अलता/ ऐसनो-पाउडर के साथ 
एक गुच्छा रीवन भी .... 
नही करती है मौल मौलाई 
वो सिन्दूरीया से 
सिन्दूर/टिकूली खरीदने में 
हाँ लेकीन कपडीया से 
सूती साडी खरीद लेती है 
वो टैरी काॅसा के मुल्य में .... 
सीफन पहनने वाली सहेलियाँ 
जब भी उकसाएगी इन्हे 
सिल्क पहनने के लिए / 
मूँह बना कर जोरजेट साडी तक 
को नकार कर/ झट से 
गिना देगी सूती के आरामदायक 
और टीकाऊ होने का तर्क ..... 
खानदानी घरेलू औरतें 
छुपाना सीख जाती है 
वो अनगिनत बातें / 
अपनी विवशता जिनसे की 
परिवार के ईज्जत पर कोई 
प्रश्नचिन्ह(?) या हलन्त 
ना उकेरा जाए ... 
पीठ पिछे टीका टिप्पणी ना हो 
जिनसे स्त्री धर्म और 
खानदान के मर्यादा के बारे में .... 
खानदानी घरेलू औरतों के खान पान 
से 
स्पष्ट होता है खानदान का स्तर ... 
रसोई घर से दूर सडक तक 
गमकती रहती है 
इनके खानदानी होने 
की सौंढी खुशबू .... 
नून के अभाव में सवा कनमा 
संस्कार मिला कर भूजती है 
वो भिंडी का भुजीया .... 
बच्चे अधसिज्जू भुजीया को 
टूकूरषटूकूर निहार कर /सीख लेते हैं 
नमकहलाल होने का महत्वपूर्ण पाठ .... 
डेढ ठेपी तेल में तलती नही 
बल्कि वो छाँक लेती है पापड / 
अपने खानदानी सास-ससूर को 
महरूम रखना चाहती है 
वो घर की आर्थीक हालात से .... 
नेबो वला ललका चाय 
ही सही लेकीन 
भौर-साँझ ओसारा वला 
गोलकमरा में 
अडोसी-पडोसी तक को 
औषधी की तरह 
काढा बना कर बँटवाती है 
ये खानदानी औरतें ..... 
आखिरी चार रोटी में चीनी भर कर 
जब वो बनाती है चीनी पुडी / 
खटीया पर बुढिया सास 
खाँसने लगती है जोर-जोर से ..... 
स्थायी रोग को दवाई/महलम से 
नही बल्कि अपने अपनापन के 
एहसास से दूर भगा देती है 
यह असाधारण ईलाज करके.. 
इसलिए बुढिया की पीठ पर 
पौने घंटे तक आटे गूँठती रहती है 
ये संस्कारी औरतें... 
खानदानी घरेलू औरतें 
माँ के पेट से ही सीख कर 
आती है प्रेम करना... 
हाँ प्रेम को जिवीत 
रखना सीखलाती है ये 
माँ/ पत्नी/ बहन/बेटी/सास 
और बहू के रूप में ...... 
सुनो, 
किसी भी कमसीन लडकी की 
शौखी आवारगी अल्हडपन का 
जब भी होगा जिक्र /मैं बसंत 
उकेरना चाहूंगा 
अपनी हरेक प्रेम कविता में ....... 
और तब एक प्रेयसी के रूप में 
रोपती रहना तुम 
संस्कार का पौधा ..... 
जब मैं प्रेयस बन कर 
सीखलाउंगा तुम्हें 
आधुनीक तरीके से प्रेम करना ... 

......आयुष झा आस्तीक.....
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   ( New delhi )
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             ( Bhargama )
distt-Araria(bihar)
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(समस्त चित्र गूगल से साभार )

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