सोमवार, 1 जून 2015

बोनसाई

                       


बोनसाई
हां !
वही बीज तो था
मेरे अन्दर भी
जो हल्दिया काकी ने
बोया था गाँव की कच्ची जमीन पर
बम्बा के पास
पगडंडियों के किनारे
जिसकी जड़े
गहरी धंसती गयी थी कच्ची मिटटी में
खींच ही लायी थी
तलैया से जीवन जल
मिटटी वैसे भी कहाँ रोकती है किसी का रास्ता
कलेजा छील  के उठाती है भार
तभी तो देखो क्या कद निकला है
हवाओ के साथ
झूमती हैं डालियाँ
कभी फगवा कभी सावन गाते
कितने पक्षियों ने बना रखे हैं घोंसले
और सावन पर झूलो की ऊँची –ऊँची पींगे
हरे कांच की चूड़ियों
संग जुगल बंदी करती
बाँध देती हैं एक अलग ही समां
और मैं ...
शहर में
बन गयी हूँ बोनसाई
समेटे हुए हूँ अपनी जड़े
कॉन्क्रीट कभी रास्ता जो नहीं देता
और पानी है ही कहाँ ?
तभी तो ऊँची –ऊँची ईमारते
निर्ममता से  
रोक लेती है
किसी के हिस्से की मुट्ठी भर धूप
पर दुःख कैसा ?
शहरों में केवल बाजार ही बड़े हैं
अपनी जड़े फैलाए
खड़े हैं चारों तरफ
अपनी विराटता पर इठलाते 
अट्हास करते 
बाकी सब कुछ बोनसाई ही है
बोनसाई से घर
घरों में बोनसाई सी बालकनी
रसोई के डब्बो में राशन की बोनसाई
बटुए में नोटों की बोनसाई
रिश्ते –नातों में प्रेम की बोनसाई
और दिलो में बोनसाई सी जगह
इन तमाम बोंनसाइयों के मध्य
मैं भी एक बोनसाई
यह शहर नहीं
बस  बोंनसाइयों का जंगल  है
जो आठो पहर
अपने को बरगद सिद्ध करने पर तुले हैं

वंदना बाजपेई 

 


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1 टिप्पणी:

  1. वाकई जीवन में कितना कुछ है जो यूँ ही सिमटा सा है । उम्दा कविता

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