शुक्रवार, 22 मई 2015

रिया स्पीक्स :पापा की परदेश यात्रा


                                                      



!!!!!!!!!!!! रिया स्पीक्स!!!!!!!!!!!!!

पापा की परदेश यात्रा

रिया : अखबार पढ़ते हुए अपनी सहेली से फोन पर बात कर रही है “देख पिंकी आज की हेड लाइंस में क्या लिखा है “दोस्ती में नहीं कोई सीमा “क्या बात है ?अब हमारे देश के मुखिया नेता बरसों पुराने सीमा विवाद मिटा देंगे | एक नए युग की शुरुआत होगी |
पिंकी : (फोन से )वाओ !ग्रेट ..... रीयल हीरो हैं | यार क्या लग रहे थे ओबामा के बगल में| माशाल्लाह नज़र ना लग जाए ......... डैशिंग ,स्मार्ट ,हैं ना |  वो सूट...अगेन वाओ  .... आखिरकार दिखा ही दिया पूरी दुनियाँ को हम भारतीय भी महंगे कपडे पहन सकते हैं केवल वो ही नहीं | सच्ची! गर्व से गर्दन तन गयी |
दादी : (कमरे में प्रवेश करते हुए ) हे शिव ,शिव ,शिव का जमाना आ गा है |ई से तो भले हम अपन उतरी पूरा में रहे पर ईहाँ ?सोचा था बेटा बहुरिया के नगीच रहिये तो कुछ नीक लागे | कुछ तो सेवा मिले .... ई से ज्यादा तो हम बुढ़ापा में कर लेत  हैं | ई तो हमार अपमान है | अब तो हमें वापस जाए का है .... इहाँ न रुकिए |
रिया : (पिंकी से ) ओह गॉड ! लगता है कुछ महाभारत हो गया है | मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ |
बाय | फोन रख कर दादी से : अब क्या हो गया दादी ?, ( हँसते हुए )मेरी प्यारी दादी किसका घर धूप  में कर दें ?मई जून का महीना तड़प कर रह जाएगा हा हा हा .......
दादी : ही ही कर के ई दांत न दिखाओ | तनिक समझो | ४ दिन हुई गए हैं ,तुम्हारी मम्मी हमका बस दाल उबाल के दे रही हैं | सब्जी का पूछो तो काहत है “इहे बना है “का चाहत का है की हम यहाँ ना रुकी | अब बूढ़े बच्चे एक समान | बुढ़ापा में जुबान का स्वाद बिगड़ जात है लागत है कुछ चटपटा ,तीखा खा ले तो भूख खुल जाए |
रिया : हां दादी पर ...........
दादी : पर वर का | हम कोई छप्पन भोग की थोड़ी कहत हैं ............ तनिक कदुआ  बनाई दे अमिया डाल के , या भिंडी ही मसाला डाल के बनाई दे | जरा नीक लागे ,तो रोटी चले | एइसन तो थाली देख के उठ जाए का मन करता है | ईमा भी कामचोरी करत है ,ई से ज्यादा तो हम अभी ई उम्र में बनाय  सकत हैं | (पल्ले से सुबकते हुए आँसूं पोचते हुए ) हम ईहाँ न रुकिहें |
रिया : दादी ,मम्मी सच कह रहीं हैं |आजकल घर में यही बन रहा है | सिर्फ दाल  और रोटी| पहले तो बनती थी न आप के पसंद की सब्जियां ?

दादी : 


हाँ  पहले तो सब पूँछ –पूँछ कर बनावत थी “ अम्मा का खइयों ? पर अगर अब इहे बन रहा है तो ........... चलो हमका छोड़ो | तुम बच्चन की तो चढ़ती उम्र है ,इहे खायेंगे तो शरीर में मजबूती कैसे  रहिये | बनने का समय है ये .... सब डॉक्टर के ईहाँ चढ़ाव का है का ?
रिया : दादी इसमें मम्मी की कोई गलती नहीं है आजकल  घर का बजट बिगड़ा हुआ है ,ऊपर से सब्जियों के दाम आसमान पर हैं ?
दादी : पर बजट काहे को बिगड़ा है |हमरे मुन्ना को तो अभी दफ्तर  नयी जिम्मेदारी मिली है | काफी चहकत राहे | कुछ तो रूतबा पैसा बढ़ा  होई |
रिया : हां दादी ,आपकी बात सही है | पर अभी जब कंपनी के जी ऍम का स्वागत करने एअरपोर्ट जाना था तो अपनी औकात से ऊपर सूट सिलवा  लिया | उसके लिए बैंक से पैसे निकलवा लिए |अब मम्मी भी क्या करे ? मकान का किराया ,हमारी पढाई ,ये तो रोकी नहीं जा सकती | हैं ना दादी |
दादी : अब हम समझी बिटिया | कोंहू बात नाही | हम सोये का जा रही है | तुम पढो |
दो तीन दिन बाद दादी : हे शिव ,शिव ,शिव सारी  रात बत्ती नहीं आई |देह से पसीना ऐसे चुअत है जैसे कपडा निचोड़े हो | का सबकी गयी है का ?
रिया : नहीं दादी ,सबकी नहीं गयी है | बिल न भरने की वजह से केवल अपने घर की काटी गयी |आप चिंता ना करो ,आज माँ अपने कंगन बेंच कर बिल भर देंगी |शाम तक आ जाएगी |
दादी :बहु कंगन बेंच देगी | पर मुन्ना की तो तनख्वाह बढ़ी राहे....... फिर ?



रिया : आजकल पापा का सूटकेस तैयार ही रहता है | अपने पुराने जान पहचान के लोगों से मिलने दूसरे शहरों में जा रहे हैं | कहते हैं कि इस तरह आने –जाने से ,रिश्ते सुधरने से घर को फायदा होगा | उसी में ट्रेन का टिकट व् नए कपडे –लत्तों का खर्चा बढ़ जाता  है |अभी कानपुर रोहित अंकल के घर गए हैं |
दादी : रोहित ! ( याद करते हुए) हां ओ बाबू | ओही बचपन मा बाबु –मुन्ना भाई –भाई ,बाबू –मुन्ना भाई का नारा लगात –लगात हमरे घर का कुआ पर अपना कब्ज़ा कर लीन्ह | पानी को तरस गयी | तब तुम्हार दादाजी उधर ले के दूसरा कुआ खुदाए रहे | उस उधार  का ब्याज पाटत पाटत जवानी निकल गयी |ऊ के यहाँ मुन्ना गया है ..........  बैंक से पैसा निकाल के | ( चिंतित होकर ) हे शिव ! शिव ! शिव |
रिया : ( रेडिओ ओंन  करते हुए ) दादी आप टेन्स न हो |खबरे सुनो |
दादी : कुछ देर खबरे सुनने के बाद चिंतित मुद्रा में ........ एक बात तो है बिटिया ,मुखिया चाहे घर का हो या देश का उकी पहली जिम्मेवारी घर -देश की है | नाही तो खाने के लाले पड़िए ,बिज़ली न मिलिहे और घर की बहूँ –बेटियन  के गहने बिकिहे | बाहर की वाहवाही से का होत  है | ई से अच्छा है सादा कपडा पहनो ,घर देश पर धयान दो , वो निखारिहे , तो यश मिलिहे तब दूसर लोग आइहिये रिश्ता सुधारन  की खातिर | तब मन भी खुश हुइए और नाक भी ऊंची रहिये | कुछ रूककर .......... मुन्ना को तो हम समझाई लेबे पर देश के मुखिया को कौन समझाई ?
रिया : (गंभीरता पूर्वक सुनते हुए ) बात तो आप सही कह रही हैं दादी |

वंदना बाजपेई 

(चित्र  गूगल से )
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