शनिवार, 11 अप्रैल 2015


 Ashok Kumar




अशोक कुमार जी कि कविताओं में एक तड़प है ,एक बैचैनी है जैसे कुछ खोज रहे हो … वस्तुत मानव मन कि अतल गहराइयों कि खोज ही किसी को कवि बनाती है ……… उनकी हर कविता इसी खोज का हिस्सा है जो बहुत गहरे प्रहार करती है.... आइये पढ़ते हैं वो अपनी खोज में कितने सफल हुए हैं


  • बीत जाती पीढियाँ ________________
    बस कुछ संवत्सर बीत जाते थे पहले कहने को लोकते थे फिर करने को लोकते थे
    कहने और करने को लोकने के खेल में गिरते थे कई सीढियाँ बस बीत जाती थीं कुछ पीढियाँ.

    भूल ____
    मैंने कल जो कहा था आज सच कहता हूँ वह एक भूल थी
    मैं आज जो कह रहा हूं कल बताऊँगा वह भी क्या फिर एक भूल होगी.

    बवंडर _______
    नदियों में भँवर थे और डूबने का खतरा था मुझे तैरना कहाँ आता था
    चलना आता था मुझे तलमलाते पाँव से पर मैदान में चल रहे थे बवंडर
    जान गया था गोल घूमती हैं हवायें चूँकि गोल उड़ रहे थे सूखे पत्ते और यह भी कि खेत भूत नहीं जोत रहे थे.

    परेशानी ____________
    हमारे कस्बे में सीधा मतलब निकालते थे लोग बातों का परेशानी का सबब था कि हवाओं में जुमले तैर रहे थे.



  •  उद्दण्डता '
    उसकी भाषा समृद्ध न थी इसलिये वह चुप था
    वह मेरी साफ चमकीली पोशाक से सहम कर चुप था मेरे भव्य घर की दीवारों से डर कर वह चुप था
    मुझे बड़ा मानता था वह इसलिये भी चुप था
    मैं भी तो सहमा था उससे जैसा वह मुझसे
    मैं जानता हूँ जिस दिन वह अपनी भाषा दुरुस्त कर लेगा बोलेगा वह और मेरी धज्जियाँ उड़ा देगा .

चौखटे _________
चौखटे पहले ही बना दिये गये थे बरसों पहले सही कहें तो अरसे पहले जब सदियाँ करवटें बदल रही थीं किसी नदी के किनारे
चौखटे हदें टाँक चुकी थीं कुरते पर टाँकी बटनों की तरह और कुरते के फैलाव के भीतर ही हम दम फुलाते थे
चौखटे की सरहदें थीं और आग उसके भीतर ही सुलगती थी अलाव में दहकते अंगारे किसी लाल आँखों की तस्वीर भर थी जहाँ आँच आँख की कोरों के बाहर नहीं छलकती
चौखटे दिमाग के फ्रेम बन गये थे जिसमें टांग दी गयी थी अरसे पहले उकेरी गयी उदास रंगों वाली एक तस्वीर
चौखटे श्रद्धा और आस्था के पवित्र खाँचे बन गये थे जिसके बाहर जाना आज भी निषिद्ध था
चौखटे के भीतर पैदा हुए थे वे लोग भी जो चौखटे के बाहर सिर निकालते थे यह जानते हुए भी कि चौखटे के बाहर लोहे की नुकीली कीलें ठुकी हुई हैं जो उनके सिर फोड़ सकती हैं.




किताबों में ____________
किताबें पढ़ रहे थे सब और किताबें थीं जो चेहरों पर टंग गयी थीं हाथों से छूट कर फड़फड़ा कर
किताबें तो उन चेहरों पर भी थे जो बस में मिले थे सड़क पर दफ्तर से लौटते हुए पर झुँझला कर मैं लौट आता था माथे पर पड़ी शिकन की पहली परत से
किताबें वहाँ थीं जहाँ एक भरी- पूरी दुनिया थी पर उनमें खुशहाली की तीखी खुशबू थी जब कोई सूँघता पीले पन्ने
मैं सुनता था जंगल बढ़ रहा था टेलिविजन पर और धर्म और स्त्रियों पर अपने राज की लतायें पसार रहा था दोनों सिर्फ जिन्दा रखे जा रहे थे पीढ़ियों के लिये
जंगल रोज सुबह अखबारों में पढता था मैं और चाय का स्वाद जुबान पर जाकर चिपक जाता था जब समझ नहीं आता था कि सचमुच के जंगल में बाघों की बढती संख्या पर कैसी प्रतिक्रिया दूँ हसूँ रोऊँ
जंगल का जंगल में होना जरूरी था जंगल में बाघ का होना जरूरी था
मैं अपनी किताबों को लेकर परेशान था जहाँ जंगल पसरे जा रहे थे बेतहाशा और जिनमें बाघों की संख्या बढ़ती जा रही थी
किताबों में घटते हुए आदमियों से हताश था मैं किताबों में जंगल पसर रहे थे बाघ बढ़ रहे थे.


' कारण _______________
ठंड के मौसम में भी कुछ लोग मरे थे गरमी के मौसम में भी भूख भी एक सदाबहार ऋतु थी उस देश की जहाँ लोग मरते थे सालों भर
मौत का कारण न ठंड थी न लू और न भूख
बस कुछ ठंडी पड़ी संवेदनायें थीं जहाँ तर्क जम जाते थे बर्फ की अतल गहराईयों में दबी हुई थी करुणा जो तलाशे जा रहे कारणों से दूर पड़ी थी .



एलम्नी मीट ____________
कोई मोटा हो गया था कोई गंजा किसी के बाल पक गये थे किसी की मूँछें
वह खूबसूरत तो थी पर युवा नहीं रह गयी थी कोई छरहरी गुलथुल हो गयी थी
किसी की आँखों के नीचे गढ़े काले पड़ गये थे किसी के चेहरे पर झुर्रियों के आने की सूचना थी
समय फासले मिटा रहा था बरसों की समय फैसले सुना रहा था बरसों बाद.


अशोक कुमार
काल इंडिया में कार्यरत

समस्त चित्र गूगल से साभार

अटूट बंधन ………हमारा फेस बुक पेज

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें