गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

विलियम शेक्सपियर: एक सलाम लेखनी के नाम,


                                                            


विलियम  शेक्सपियर

 आप को आंनद फिल्म का एक  मशहूर डायलाग  तो जरूर याद होगा। …………… जिदगी एक रंगमंच है और हम सब इसकी कठपुतलियां..जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है ,कौन कब कैसे उठेगा ये कोई नहीं जानता  ये पंक्तियां बेशक़ फिल्म 'आनंद' में राजेश खन्ना ने कही हैं। लेकिन इनमें हमें विश्व विख्यात , कवि विलियम शेक्सपीयर की रचनाओं का असर  मिलता है। विलियम शेक्सपीयर.. एक अमर नाम …  शायद ही कोई होगा जो इस नाम से वाकिफ़ न हो। एक ऐसे नाटककार, जिन्होंने जिंदगी के हर रंग और अहसास अपनी रचनाओं में गढ़े और चार सदियां बीतने के बाद भी ये उतने ही अपने  लगते हैं।हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक शेक्सपीयर के किरदार अलग-अलग रूपों में जीवंत हुए हैं।

 जन्म  ; 26 अप्रैल 1564 (बतिस्मा हुआ) – 23 अप्रैल 1616) 
                                                                              अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि व् नाटककार शेक्सपियर में अत्यंत उच्च कोटि की सर्जनात्मक प्रतिभा थी और साथ ही उन्हें कला के नियमों का सहज ज्ञान भी था। प्रकृति से उन्हे मनो वरदान मिला था अत: उन्होंने जो कुछ छू दिया वह सोना हो गया। उनकी रचनाएँ न केवल अंग्रेज जाति के लिए गौरव की वस्तु हैं वरन् विश्ववाङ्मय की भी अमर विभूति हैं। शेक्सपियर की कल्पना जितनी प्रखर थी उतना ही गंभीर उनके जीवन का अनुभव भी था। अत: जहाँ एक ओर उनके नाटकों तथा उनकी कविताओं से आनंद की उपलब्धि होती है वहीं दूसरी ओर उनकी रचनाओं से हमको गंभीर जीवनदर्शन भी प्राप्त होता है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शेक्सपियर के समकक्ष रखे जानेवाले विरले ही कवि मिलते हैं।
                                            वे एकमात्र ऐसे रचयिता हैं, जिनकी रचनाओं से अंग्रेजी भाषा समृद्ध हुई है। अंग्रेजी के अनेकों  शब्द शेक्सपीयर के विभिन्न प्ले के जरिए चलन में आए। उन्होंने अपने 38 प्ले में आठ लाख 84 हजार 421 अंग्रेजी शब्दों को अपने प्ले में इस्तेमाल किया। सिर्फ शब्द ही क्यों, कई फ्रेज भी उन्हीं के प्ले की देन हैं। नॉक नॉक हू इज देयर?, ऑल इज वेल देट एंडस वेल, नीदर हियर, नॉर देयर, फॉर गुडनेस सेक, मम्स द वर्ड, फैशनेबल, इन अ पिकल, ऑल ऑफ सडन, ट्रुथ विल आउट.. ये सिर्फ उदाहरण हैं, ऐसे अनेकों फ्रेज जो हम आम बोलचाल की भाषा में उपयोग करते हैं, शेक्सपीयर ने दिए हैं। शेक्सपीयर ने लिखना शुरू करने से पहले अभिनय भी किया। 1585 में वे लंदन आए और थियेटर में काम करना शुरू किया। उन्होंने अपने कई नाटकों में अभिनय किया। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के सामने भी उन्होंने नाटक मंचित किया। बतौर एक्टर उनका अंतिम एक्ट बेन जॉन्सन का 'सीजेनस' था।


टॉप 5 फिल्में जो शेक्सपीयर के नॉवेल्स पर बनीं-
* द मर्चेट ऑफ वेनिस पर बनी जालिम सौदागर (1941)
* कॉमेडी ऑफ एर्स पर आधारित थी अंगूर (1982)
* मैकबेथ से प्रेरणा लेकर बनी मकबूल (2004)
* शेक्सपीयर के ओथेलो पर बनी थी ओमकारा ()
* हेमलेट नॉवेल का एडप्टेशन है हैदर। 2014 में होगी रिलीज।

लेखनी का जादू -
शेक्सपियर के सुखांत नाटकों की अपनी निजी विशेषताएँ हैं। यद्यपि 'दी कामेडी आव एरर्स' में प्लाटस का अनुसरण किया गया है तथापि अन्य सुखांत नाटक प्राचीन क्लासिकी नाटकों से सर्वथा भिन्न हैं। इनका उद्देश्य प्रहसन द्वारा कुरूपताओं का मिटाना तथा त्रुटियों का सुधार करना नहीं वरन् रोचक कथा और चरित्रचित्रण द्वारा लोगों का मनोरंजन करना है। इस प्रकार के प्राय: सभी नाटकों का विषय प्रेम की ऐसी तीव्र अनुभूति है जो युवकों और युवतियों के मन में सहज आकर्षण के रूप में स्वत: उत्पन्न होती है। प्रेमी जनों के मार्ग में पहले तो बाधाएँ उत्पन्न होती हैं किंतु नाटक के अंत तक कठिनाइयाँ विनष्ट हो जाती हैं और उनका परिणाम संपन्न होता है। इन रचनाओं में जीवन की कवित्वपूर्ण एवं कल्पनाप्रवण अभिव्यक्ति हुई है और समस्त वातावरण आह्लाद से ओत-प्रोत है। शेक्सपियर का परिचय कतिपय उच्चवर्गीय परिवारों से हो गया था और उनमें जिस प्रकार का जीवन उन्होंने देखा उसी का प्रकाशन इन नाटकों में किया है।
दु:खांत नाटकों में मानव जीवन की गंभीर समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है। इन नाटकों के अभिजात कुलोत्पन्न नायक कुछ समय तक सफलता और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होने के उपरांत यातना और विनाश के शिकार बनते हैं। उनके दु:ख और मृत्यु के क्या कारण हैं, इस विषय पर शेक्सपियर का मत स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुआ है। नायक का दुर्भाग्य अंशत: प्रतिकूल नियति एवं परिस्थितियों से उद्भूत है, किंतु इससे कहीं बड़ा कारण उसकी चारित्रिक दुर्बलता में मिलता है। प्राचीन यूनानी दुखांत नाटकों में नायक केवल त्रुटिपूर्ण निर्णय अथवा त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण के कारण विनष्ट होता था परंतु, कदाचित् ईसाई धर्म और नैतिकवाद से प्रभावित होकर, शेक्सपियर ने अपने नाटकों में नायक के पतन की प्रधान जिम्मेदारी उसकी चारित्रिक दुर्बलता पर ही रखी है। हैमलेट, आथेलो, लियर और मैकबेथ - इन सभी के स्वभाव अथवा चरित्र में ऐसी कमी मिलती है जो उनके कष्ट एवं मृत्यु का कारण बनती है। इन दु:खांत नाटकों में दुहरा द्वंद्व परिलक्षित हुआ है, आंतरिक द्वंद्व एव बह्य द्वंद्व। आंतरिक द्वंद्व नायक के मन में, उसके विचारों और भावनाओं में उत्पन्न होता है और अपनी तीव्रता के कारण न केवल निर्णय कठिन बना देता है अपितु कुछ समय के लिए नायक का आसूल विचलित भी कर देता है। इस प्रकार के आंतरिक द्वंद्व के कारण नाटकों में मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता और रोचकता का आविर्भाव हुआ है। बाह्य द्वंद्व बाहरी शक्तियों की स्पर्धा और उनके संघर्ष से उत्पन्न होता है, जैसे दो विरोधी राजनीतिक दलों अथवा सेनाओं का पारस्परिक विरोध। शेक्सपियर के प्रमुख दु:खांत नाटकों में रक्तगत एवं भयावह दृश्यों की अवतारणा के कारण अत्यंत आतंकपूर्ण वातावरण निर्मित हुआ है। इसी भाँति हत्या और प्रतिशोध संबंधी दृश्यों के समावेश से भी अवसाद का पुट गहरा हो गया है। इन सभी विशेषताओं और उपकरणों को शेक्सपियर ने कतिपय पुराने नाटकों तथा सेनेका, किड्, मार्लो आदि नाटककारों से ग्रहण किया था और सामयिक लोकरुचि को ध्यान में रखकर ही उनका उपयोग अपने नाटकों में किया था। दु:खांत नाटकों की जिन विशेषताओं का उल्लेख हमने यहाँ किया है वे न केवल हैमलेट, आथेलो, किंग लियर, और मैकबेथ में मिलती हैं वरन् रोमियो ऐंड जुलिएट तथा इंग्लैंड और रोम के इतिहास पर आधृत दु:खांत नाटकों में भी आंशिक रूप में विद्यमान हैं।

                                           अतिम नाटकों में शेक्सपियर का परिपक्व जीवनदर्शन मिलता है। महाकवि को अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के अनुभव हुए थे जिनकी झलक उन  कृतियों में दिखाई पड़ती है। प्रणय विषयक सुखांत नाटकों में कल्पनाविलास है और कवि का मन ऐश्वर्य और यौवन की विलासिता में रमा है। दु:खांत नाटकों में ऐसे दु:खद अनुभवों को अभिव्यक्ति है जो जीवन को विषाक्त बना देते हैं। शेक्सपियर के कृतित्व की परिणति ऐसे नाटकों की रचना में हुई जिनमें उनकी सम्यक बुद्धि का प्रतिफलन हुआ है। कवि अब अपनी विवेकपूर्ण दृष्टि से देखता है कि जीवन में सुख और दु:ख दोनों सन्निविष्ट रहते हैं, अत: दानों ही क्षणिक हैं। जीवन में दु:ख दोनों सन्निविष्ट रहते हैं, अत: दोनों ही क्षणिक हैं। जीवन में दु:ख के बाद सुख आता है, अतएव विचार और व्यवहार में समत्व वांछनीय है। 
                                             इन अंतिम नाटकों से यह निष्कर्ष निकलता है कि हिंसा और प्रतिशोध की अपेक्षा दया और क्षमा अधिक प्रशंशनीय  हैं। अपने गंभीर नैतिक संदेश के कारण इन नाटकों का विशेष महत्व है।यद्यपि शेक्सपियर के नाटकों में कहीं कहीं गद्य का प्रयोग हुआ है, तब भी वे मूलत: काव्यात्मक है। उनका अधिकांश भाग छंदोबद्ध है। यही नहीं, प्राय: सभी नाट्य रचनाएँ काव्यात्मक गुणों से भरी पड़ी हैं। कल्पना का प्रकाशन, आलंकारिक अभिव्यक्ति, संगीतात्मक लय तथा कोमल भावनाओं के निरूपण द्वारा शेक्सपियर ने मनोमुग्धकारी प्रभाव उत्पन्न कर दिया है। प्राचीन काल से नाटकों का कविता का एक भेद मात्र मानते आए थे और शेक्सपियर ने प्राचीन धारणा स्वीकार की। गद्य का प्रयोग यदा कदा विशेष प्रयोजन से हुआ है। 


शेक्सपियर के अनमोल वचन 

मछलियाँ पानी में रहती हैं, जैसे इंसान जमीन पे रहता है; बड़े वाले छोटे वालों को खा जाते हैं.

मूर्ख हमेशा अपने आप को बुद्धिमान समझते हैं लेकिन बुद्धिमान लोग स्वयं को हमेशा मूर्ख ही समझते हैं।"- 

"ये दुनिया एक रंगमंच है और सभी स्त्री और पुरुष केवल अदाकार; सबके प्रवेश और निकास का समय भी तय है; और एक व्यक्ति अपने समय अंतराल में अनेक किरदार निभाता है। ये किरदार ७ चरणों में निभाया जाता है।"  

एक छोटी सी मोमबत्ती का प्रकाश कितनी दूर तक जाता है! इसी तरह इस बुरी दुनिया में एक अच्छाई कुछ समय तक प्रकाशित रह पाती है।" 

"रोना दुःख की गहराई को कम कर देता है।" 

जो खेल आप खेल ही नहीं रहे हैं उसे आप हार नहीं सकते।"

"ईर्ष्या से सावधान रहें क्यूंकि ये वो हरे आँखों वाला दैत्य है जो उसी शरीर का तिरस्कार करता है और धोखा देता है जिसपर वो पलता है।"

अगर करना उतना ही आसान होता जितना की जानना की क्या करना अच्छा है, तो शवगृह गिरिजाघर होते , और गरीबो के झोंपड़े महल
. 
  लेकिन आदमी आदमी होता है; जो सबसे अच्छे होते हैं वो कई बार ये भूल जाते हैं.अच्छाई की प्रचुरता बुराई में बदल जाती है.

एक मिनट देर से आने से अच्छा  है तीन घंटे पहले आएं

मेरा मानना है कि फैशन इंसानों से अधिक कपडे फाड़ता है

जब एक पिता अपने पुत्र को देता है तो दोनों हँसते हैं; जब एक पुत्र पिता को देता है तो दोनों रोते हैं.

दूसरों से मदद की उम्मीद ही हर बुराई जड़ है।

आनंद और खिलखिलाहट के साथ झुर्रियां आने दीजिये.

हम जानते हैं की हम क्या हैं, लेकिन ये नहीं जानते की हम क्या बन सकते हैं।" 

संकलनकर्ता 
अटूट बंधन परिवार 
समस्त चित्र गूगल से साभार ,
गूगल से विभिन्न श्रोतों से संकलन 

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