रविवार, 8 मार्च 2015

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस् पर विशेष : कुछ पाया है ........ कुछ पाना है बाकी









अंतराष्ट्रीय महिला दिवस् पर विशेष
      कुछ पाया है ........ कुछ पाना है बाकी



सदियों से लिखती आई हैं औरतें
सबके लिए
चूल्हे की राख पर  धुएं से त्याग
द्वारे की अल्पना पर रंगों से प्रेम
तुलसी के चौरे पर गेरू से श्रधा
अब लिखेंगी अपने लिए
आसमानों पर कलम से सफलता की दास्ताने
अब नहीं रह जाएगा आरक्षित
उनके लिए पूरब के घर में दक्षिण का कोना
बल्कि बनेगा  एक क्षितिज
जहाँ सही अर्थो में
 स्थापित होगा संतुलन
शिव और शक्ति  में 



८ मार्च अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस .... ३६५ दिनों में से एक दिन महिलाओं के लिए ....पता नहीं क्यों  मैं कल्पना नहीं कर पाती किसी ऐसे दिन ऐसे घंटे या ऐसे मिनट की जिसमें स्त्री न हो ,या जो स्त्री के लिए न हो तो फिर ये  महिला दिवस क्या है ? माँ ,बहन बेटी ,सामान्य नारी के लिए सम्मान या मात्र खानापूरी  ,भाषण बाज़ी चर्चाएँ ,नारे बाजी जो यह सिद्ध कर देती है कि वो कहीं न कहीं कमजोर है ,उपेक्षित है ,पीड़ित है , क्योंकि समर्थ के कोई दिन नहीं होते ,दिन कमजोर लोगो के ऊपर करे गये अहसान है कि एक दिन तो कम से कम तुम्हारे बारे में सोचा गया |क्या स्त्री को इसकी जरूरत है ?क्या ये मात्र एक फ्रेम से निकल कर दूसरे फ्रेम में टंगने  के लिए है | इस उहापोह के बीच में मैं पलटती हूँ एक किताब  राहुल संस्कृतायन  “वोल्गा से  गंगा ”  | जिसमें राहुल संस्कृतायन  नारी के बारे में  लिखते हैं  .... देह के स्तर पर  बलिष्ठ ,नेतृत्व  करने की क्षमता के  साथ वह युद्ध करने में और  शिकार करने में   भी पुरुष की सहायक   हुआ करती थी।  राहुल सांकृत्यायन के अनुसार नारी में सबको साथ लेकर चलने की शक्ति थी, वह झुण्ड में आगे चलती थी ,वह अपना साथी खुद चुनती थी ।" वोल्गा से  गंगा " में वे  एक जगह लिखते हैं " पुरुष की भुजाएं भी ,स्त्री की भुजाओं की  तरह बलिष्ठ थीं " अतार्थ स्त्री की भुजाएं तो पहले से ही बलिष्ठ थी |आखिर समय के साथ क्या हुआ की वो बलिष्ठ भुजाओं वाली स्त्री इतनी कमजोर हो गयी कि उसके लिए दिवस बनाने की आवश्यकता पड़ी |
         
                मैं महिलाओं के मध्य पायी जाने वाली  समस्याए और उनका समाधान खोजना चाहती हूँ |मुझे सबसे पहले याद आती है गाँव की  धनियाँ , जो ढोलक की थाप पर नृत्य करती है “मैं तो चंदा ऐसी नार राजा क्यों लाये सौतानियाँ | नृत्य करते समय वो प्रसन्न है चहक रही है परन्तु वास्तव में उसका पूरा जीवन इसी धुन पर नृत्य कर रहा है |धनियाँ घुटने तक पानी में कमर झुका कर दिन भर धान  रोपती है ,७-८ बच्चे पैदा करती है ,चूल्हा चकिया करती है ,शराबी पति से डांट  –मार खाती है फिर भी सब सहती है उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है ,कभी सोचा ही नहीं है उसकी धुरी उसका पति है ,जो स्वतंत्र है ....ये औरते रोती हैं लगातार ,बात –बिना बात पर ,ख़ुशी में गम में  सौतन का भय उसे सब कुछ सहने को और एक टांग पर दिन भर नृत्य करने को विवश करता है चक्की चलती है ,धनियाँ नाचती है , बच्चा रोता है धनियाँ नाचती है ,ढोलक बजती है धनियाँ नाचती है ... धनियाँ नाचती है अनवरत ,लगातार ,बिना रुके बिना थके |
                       मुझे याद आती हैं पड़ोस के माध्यमवर्गीय परिवार वाली  भाभी जो स्कूल में अध्यापिका हैं , बैंक में क्लर्क हैं या  घर के बाहर किसी छोटे मोटे काम में लगी हुई कमाऊ बहु का खिताब अर्जित किये हैं.... भाभी दुधारू गाय हैं , समाज में इज्ज़त है  पर ये अंत नहीं है शुरुआत है उनकी कहानी का |  भाभी दो नावों पर सवार हैं एक साथ , समाज़ की वर्जनाओं रूपी विपरीत धारा  में बहती नदी, जिसे उन्हें पार करना है हर हाल में ज़रा चूके तो गए ..... मीलों दूर नामों निशान भी नहीं मिलेगा |एक बहु घर का खाना बना छोटे बड़े का ध्यान रख  सर पर पल्ला करके घर से बाहर  निकलती है ,चौराहे के बाद पल्ला हटा कर वह एक कामकाजी औरत है ,शाम को फिर रूप बदलना है ,महीने के आखिर में अपनी मेहनत  की कमाई को घर वालों को सौप देना है , क्यों न ले आखिर उन्होंने ही तो दी है घर के बाहर ऐश करने की इजाज़त ..... भाभी इंसान नहीं हैं मशीन हैं ,या घडी के कांटे जिन्हें चलना हैं समाज की टिक –टिक के बीच जो कोई अवसर जाने नहीं देना चाहता “कण देखा और तलवार मारी का “भाभी अक्सर छुप  कर रोती हैं ,या कभी अपने आंसूं को चूल्हे के धुए में छिपा लेती हैं ... भाभी जानती हैं माध्यम वर्गीय औरत और आँसू .... जैसे शरीर और प्राण |
                  मुझे याद आती हैं डॉक्टर ,इंजीनियर , बड़ी कंपनियों की मालिक औरतें ,जिन्होंने खासी मेहनत के बाद अपना एक मुकाम बनाया है |आज बड़े –बड़े ऊंचे  पदों पर बैठी हैं.... अक्सर फाइलों पर दस्तखत करते हुए जब दिख जाते हैं अपने हाथ तो भर जाता है निराशा से मन, एक सहज स्वाभाविक प्रश्न से “क्यों स्त्री के दोनों हाथों में लड्डू नहीं होते “ क्यों कुछ पाने कुछ खोने का नियम हैं |ये औरते बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की मीटिंग में जाती हैं ,माइक सभालती हैं ,सफलता पर घंटों लेक्चर देती हैं पर खो देती हैं जब बेटी नें पहली बार माँ कहा था ,जब बेटा पहली बार चलना सीखा था ,युवा होते बच्चों को देना चाहती  हैं समय पर नहीं, कहाँ हैं समय ?पेप्सिको की इन्द्रा नुई कहती हैं ऊँचे पदों पर बैठी औरत हर दिन जूझती है इस प्रश्न से आज किसे प्राथमिकता देना है एक माँ को या एक सी .ई .ओ को |ये औरतें रोती  नहीं,.... समय ही नहीं हैं पर हर बार दरक जाती हैं अन्दर से ,बढ़ जाती है एक सलवट माथे पर ,जिसे छुपा लेती हैं मेकअप की परतों में ,पहन लेती हैं समाजिक मुखौटा ... और  हो जाती हैं तैयार अगली मीटिंग के लिए
                  मुझे दिखाई देती है महिलाओं की एक चौथी जमात जो सभ्यता के लिए बिलकुल नयी है|ये हाई सोसायटी की मॉड औरते हैं, मैम हैं   ....इनमें से ज्यादातर बड़े –बड़े शहरों की हैं | ये वो औरतें हैं जिन्होंने सब वर्जनाएं तोड़ दी हैं, यहाँ तक की विवाह और मात्रत्व के बंधन को भी नकार दिया हैं बहुत  मामलों में वह देह को इस्तेमाल करने लगी है लेकिन यह  क्या उसको उसकी मंज़िल तक  ले जायेगा। उन्हें  खुले वस्त्र पहनने में ऐतराज़ नहीं है वैसे   खुले कपडे पहनना कोई अपराध नहीं है  लेकिन उसके पीछे उसकी नीयत क्या है यह स्पष्ट होना चाहिए  है। कई बार यह  देहप्रदर्शन को  स्वयं अपना हथियार बना रही है, अपने नारीत्व का फायदा  उठाना चाह  रही हैं , स्वय एक ऐसे स्थान पर पहुँच रही है जहाँ  आगे  पहाड़  तो पीछे  खाई  है।आश्चर्य  है स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर जिस सह जीवन को उसने अपनाया है ,अपने नारीत्व की हत्या करके वह उसके लिए वह दर्द और निराशा के सिवा कुछ नहीं   दे पाता हैं| बहुत कुछ खो कर इन्हें समझ आता है  सहजीवन में भी कोई सुख का आधार  नहीं है । पुरुष की मानसिकता ही नहीं स्त्री की मानसिकता भी बदले यह ज़रूरी है, नहीं तो वह तो वह  रीति रिवाज़ से विवाह  न करने तक ही अलग है |मधुमिता ,रूपम या भांवरी  देवी जैसी महिलाएं भी हैं जो ऊँची पहुँच रखने और अपना दबदबा दिखाने  के लिए ऐसे   दलदल में उतर जाती हैं जिसकी परणीती का विचार भी नहीं करती | अति महत्वाकांक्षा  के चलते बनाए गए ऐसे रिश्तों की परणीति  के तौर पर किसी की सी .डी बनायी जाती हैं किसी की हत्या की जाती है | क्षमता से अधिक ऊँचे लक्ष्य हांसिल करने की चाह में गलत रास्तों पर चलने वाली महिलाएं अंततः पछताती हैं ,समाज में कितने भी बदलाव हो पर पर स्व्क्षन्द्ता का मूल्य उन्हें ही चुकाना पड़ता है |ये औरते रोती  नहीं हैं इनके आंसूं सूख जाते हैं ,उस चिता की अग्नि में जिसमें ये तिल –तिल कर जलती हैं |  
                     मैं वापस लौट कर आती हूँ महिला दिवस पर |मुझे महसूस होता है कि आधी आबादी का यह आन्दोलन बिखरा हुआ है संगठित नहीं हैं | हर महिला अपने घेरे में फंसी है और अपनी समस्याओं से जूझ रही है |महिलाओ को समझना होगा कि भ्रूण ह्त्या , दहेज़ प्रथा , महिला सुरक्षा को ले कर क़ानून बनाए गए हैं और बनाये जा सकते हैं ,पर अपने वजूद को पहचानना उसको स्वीकार करना ये स्वयं महिलाओं को करना होगा | उन्हें स्वयं को पुरुषों से हेय  समझने के विचारों से बाहर आना होगा |उन्हें समझना होगा कि एक महिला भ्रूण अवस्था से ही पुरुष से ज्यादा ताकतवर है ,उसकी मृत्यु दर कम है ,उसमें सहनशक्ति पुरुषों से ज्यादा है तभी वो अपना घर छोड़ कर दुसरे का घर बसाती हैं .... बाहुबल से युद्ध जीते जा सकते हैं पर सहनशक्ति से ही घर चलते हैं |महिला को श्रेष्ठ समझ कर ही विधाता ने सृजन का अधिकार दिया है ,पुरुष के बस २३  गुणसूत्र हैं बाकी सारा सृजन नारी का है ..... और अब तो क्लोन बना कर विज्ञान ने पुरुष  की यह अनिवार्यता भी समाप्त कर दी है|महिला को अपना गौरव समझना होगा| महादेवी वर्मा कहती हैं कि शिक्षा और  आर्थिक आज़ादी ही नारी मुक्ति को उसका  वजूद पहचानने का द्वार है |शायद वो सही हैं इससे धनियाँ अपने नृत्य से मुक्त हो सकती है ,पर पड़ोस वाली भाभी ..... उन्हें तो स्वयं सीखना पडेगा कि यह जीवन उनका है उन्हें स्वयं को हर समय दूसरों के आगे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं हैं ,मैडम को सीखना होगा स्वतंत्रता और स्वक्षंदता  में अंतर हैं,भांवरी  देवी को समझना होगा अति महत्वाकांक्षा में गलत रास्तों का इस्तेमाल एक दलदल है,मुक्ति नहीं , जहाँ धंसना  ही धसना है |
               नारी  को समझना होगा कि उसे पुरुष के आगे स्वयं को घडी –घडी सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है वो स्वयंसिद्धा है |उसकी लड़ाई पुरुषों से नहीं हैं उन सामाजिक कुरीतियों से है ,उन वर्जनाओं से हैं जो एक स्त्री द्वारा ही दूध में मिला कर अपने पुत्र को पिलायी जाती  हैं |यहाँ मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगी कि साहित्य ने स्त्री की दर्द तकलीफ को स्वर देने में सहयोग देने के लिए स्त्री विमर्श की स्थापना की |महादेवी वर्मा का यह तर्क सही लगता है जब वो कहती हैं... पुरुष के द्वारा नारी का चित्रण अधिक आदर्श बन सकता है पर यथार्थ के अधिक करीब नहीं |पुरुष के लिए नारीत्व अनुमान है नारी के लिए अनुभव |नयी कहानी और नयी कविता ने भी अपने पूर्व से लेखन से भिन्न होने का कारण भी “भोगे हुए यथार्थ “की अभिव्यक्ति को माना  था |मनुष्य के सामूहिक मनोविज्ञान के स्थान पर व्यक्तिगत मनोविज्ञान को स्थान दिया गया |लेकिन किसी दर्शन सोच या विचार के आभाव में ,खुद को छोड़ किसी दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व के आभाव में भोगे हुए यथार्थ का चित्रण एकांगी ,अराज़क और बेनूर  हो गया |  स्त्री विमर्श दो भागो में सिमट गया ,पुरुषों को कोसना जैसे हर तकलीफ उन्ही के द्वारा रची गयी है या देह विमर्श जहाँ स्त्री के लिए दैहिक आज़ादी की मांग थी |अपने आसपास समाज में देखती हूँ तो खुद को अनमयस्क ही पाती हूँ क्या ये दैहिक आज़ादी ही स्त्री ने चाही थी ,क्या यही उसके सुखों का आधार है ,या वो हर समय पुरुष के आगे तलवार लेकर खड़ी  रहना चाहती है |उत्तर नकारात्मक है |ये वास्तविक नारी के बिम्ब नहीं है |
           आधी आबादी के आन्दोलन के नाम पर मिथ्या धारणाओं से बौराई  नारी को समझना होगा स्त्री और पुरुष का सहस्तित्व ही जीवन का आधार है ,सुखों का आधार है | कठोर वर्जनाओं पर प्रहार करने के लिए और स्त्री सशक्तिकरण  के आन्दोलन को सही दिशा देने के लिए उसे इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि जिस तरह “एक सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है उसी तरह एक सफल स्त्री  के पीछे एक पुरुष का हाथ होता है ,वो पुरुष उसका पिता भाई ,पति ,कोई भी हो सकता है |आज कितने पिता स्वयं परम्पराओं को तोड़कर अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए लोन ले रहे हैं उन्हें दूसरे शहरों में भेज रहे हैं |कितने भाई अपनी बहन के सपनों में रंग भरने के लिए पिता से वाद –विवाद कर रहे हैं ,और हर हाल में बहन के पक्ष में खड़े हैं ,कितने पति अपनी पत्नीको उसके हिस्से का आकाश दिलाने के लिए विवाह के बाद भी पढ़ाई करने की अनुमति दे रहे हैं ,स्वयं बच्चों के डायपर बदल रहे हैं | आपस में लड़ने के स्थान पर आज की स्त्री को  आत्मरक्षा के   लिए मार्शल आर्ट की शिक्षा  और स्वावलम्बी होना बहुत  ज़रूरी है ताकि पिता और   भाई  ही नहीं  पति भी  गर्व से कह सके कि यह स्त्री  मेरी बेटी है  बहन है  , पत्नी है और यह अपनी रक्षा स्वयं करती  है
समाज में परिवर्तन की बयार है ,बीज रोपा जा चुका है , ये छायादार वृक्ष अवश्य बनेगा अब धैर्य अजमाना है,आन्दोलन को सही दिशा देनी है न कि स्वतंत्रता और स्वक्षंदता में अंतर न करके स्वयं अपने व् समाज के विनाश  की तरफ बढ़ जाना है |
                 अंत में मैं  नारी के अनेको रूपों में से दो रूपों का उल्लेख  करना चाहूंगी ,सीता और दुर्गा का |दोनों पूज्य हैं जहाँ सीता प्रेम आर त्याग का प्रतीक है वहीँ दुर्गा अन्याय के खिलाफ लड़ने का |दुर्गा के साथ कोई पुरुष नहीं  है वह स्वयं आतताइयों से लडती हैं और जीतती भी हैं |सीता का रूप घरों में मान्य  है क्योकि परिवार प्रेम और त्याग के आधार पर चलते हैं ,पर अन्याय  के खिलाफ उसे ही लड़ना है |अब यह स्त्री के विवेक पर निर्भर है कब उसे सीता बनना है कब दुर्गा जिससे घर परिवार से ले कर समाज ,देश ,अखिल विश्व तक समता  समानता त्याग और प्रेम का संतुलन स्थापित हो सके |मुझे विशवास है कि आज की नारी यह संतुलन स्थापित कर सकेगी और आधी आबादी के आन्दोलन को सही दिशा दे सकेगी |
एक कोशिश है ........... करके देखते हैं                  


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