सोमवार, 23 मार्च 2015

आपकी अपनी माँ ...... देवी माँ का ही प्रतिबिम्ब है

                                                 Sanjit Kumar Shukla


आपकी अपनी माँ ...... देवी माँ  का ही प्रतिबिम्ब  है 
माँ है
तो लोरी है। शगुन है
माँ है
तो गीत है। उत्सव है
माँ है
तो मंदिर है। मोक्ष है
माँ है
तो मुमकिन है शहंशाह होना,
माँ के आँचल से बड़ा
दुनिया में कोई साम्राज्य नहीं।

-डॉ. सरोज कुमार वर्मा





नवरात्र के दिन चल रहे हैं |ये नौ दिन देवी दुर्गा को समर्पित होते हैं। इन दिनों देवी दुर्गा के नौ रूपोंकी अराधना कि जाती है। घर ,मंदिर सब स्वक्ष रखे जाते हैं। धूप दीप ,मंत्रोच्चार ,पुष्प व् घंटा ध्वनियों से सारा वातावरण पवित्र हो उठता है। आरती और मंगल गान ,देवी गीत हर जगह मधुर स्वरलहरियां उत्पन्न करते हैं। और क्यों न हो यह शक्ति कि उपासना का पर्व है।  शक्ति जो जीवन का आधार है,शक्ति जो जैविक ही नहीं वरन आध्यात्मिक विकास का आधार है.… मानव जीवन अनेकों
आध्यात्मिक तलों से होता हुआ   अंततः अपनी सतत खोज मोक्ष को प्राप्त होता है।  इसलिए यह नौ
दिन मनोकामना पूर्ति की दृष्टि से ,शारीरिक शुद्धि की दृष्टि से व् आध्यात्मिक उन्नति की दृष्टि से
अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।

                                  इन दिनों  जन समुदाय  अपनी अलग -अलग मनोकामना की पूर्ति के लिए देवी माँ की आराधना में लगा रहता है  । पूजा -पाठ , मंत्रोच्चार ,व् जगह -जगह भंडारों का आयोजन होता है।  इन दिनों कन्या पूजन का भी विधान है।  पर इन सब विधानों के बीच हम अक्सर उस माँ को भूल जाते हैं जो हमारे घर में साक्षात देवी माँ का प्रतिबिम्ब है। ………… हमारी अपनी माँ जिसने हमें जन्म दिया , अपने दूध और  रक्त से पालन पोषण किया,जिंदगी की डगर पर चलना सिखाया। जिसने जीवन की हर धुप में अपने आँचल की छाँव दी। हमारे जन्म के पहले से लेकर माँ हमारे हर सुख दुःख में हमारे साथ खड़ी होती है। ………किसी ने खूब कहा है.……… 
गुजरना भीड़ से हो या 
सड़क भी पार करनी हो 
अभी भी आदतन माँ 
हाथ मेरा थाम लेती है 




                       कभी आपने सोचा है की आप देवी माँ की इतनी आराधना करते हैं ,इतने नेम -नियमों का पालन करते हैं।  पूजा -पाठ ,आदि में इतने रूपये खर्च करते हैं फिर भी आप देवी माँ को प्रसन्न नहीं कर पाते। और आप को उनका पूरा आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो पाता। कारण स्पष्ट है आपकी अपनी माँ देवी माँ का ही प्रतिबिम्ब हैं अगर वो उपेक्षित हैं तो देवी माँ कैसे प्रसन्न हो सकती हैं।  कहते हैं बच्चा कभी भी माँ के ऋण से उऋण नहीं हो सकता।  यह भी सच है कि दुनियाँ भर कि दौलत से भी ममता का एक क्षण भी नहीं खरीदा जा सकता।कहीं ऐसा न हो कि अपनी माँ के प्रति प्रेम ,सेवा और श्रधा व्यक्त करने में देर हो जाए और आपके पास केवल पछतावा रहे जैसा कि किसी ने कहा है …………
                   
कमाकर इतने सिक्के भी तो 
माँ को दे नहीं पाया 
कि जितने सिक्कों से माँ ने 
मेरी नजरें उतारी हैं 
                 बेहतर यही होगा कि नव्ररात्रों में हम देवी मैया कि पूजा के साथ -साथ अपनी माँ के प्रति भी आदर ,प्रेम व् स्नेह प्रकट करे।  बुजुर्ग माँ की बस इतनी इक्षा होती है कि  थोडा समय उनके साथ गुज़ारे।  उनके स्वास्थ्य  कि देखभाल करे। कभी उनके मन का कुछ ला कर दे।  यहाँ वस्तु  कि कीमत नहीं होती जज्बात कि कीमत होती है देखिएगा स्नेह से चार आँखे छलक ही पड़ेंगी। और सबसे ख़ास बात हमारी उम्र कितनी भी हो गयी हो माँ ,माँ ही होती हैं।  एक बार  माँ के चरणों में बालक बन कर लोट जाइए जन्नत कि सारी खुशियाँ आपको फीकी लगेंगी। माँ प्रसन्न होगी तो देवी माँ भी प्रसन्न होगीं।  अपने घर में देवी माँ का प्रतिबिम्ब अपनी माँ का निरादर करने वालों पर देवी माँ कैसे प्रसन्न होगी । माँ कि दुआओं में बहुत असर होता है।  तो इर देर कैसी …………
                         
 मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ 
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज


मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ


चंद्रकांत देवताले 
                                     आपके घर में देवी माँ का प्रतिबिम्ब साक्षात आपकी माँ के रूप में आप कि प्रतीक्षा कर रहा।  जाइए अपनी श्रधा ,स्नेह व् आदर प्रकट कर  परम शक्ति देवी माँ को प्रसन्न करिये  

संजीत कुमार शुक्ला
समस्त चित्र गूगल से साभार


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