शनिवार, 21 मार्च 2015

चैत्र नवरात्र और नव-वर्ष




चैत्र नवरात्र और नव-वर्ष 

चैत्र की प्रतिपदा तिथि से ही हिन्दू नववर्ष की शुरुआत होती है. भारत में चैत्र संक्रांति को नए वर्ष के रूप में मनाया जाता है. विक्रम संवत की चैत्र शुक्ल की पहली तिथि से न केवल नवरात्रि में दुर्गा व्रत-पूजन का आरंभ होता है बल्कि राजा रामचंद्र का राज्याभिषेक, युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, सिख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगददेव का जन्म भी हुआ था.
प्राचीन काल में दुनिया भर में मार्च को ही वर्ष का पहला महीना माना जाता था. आज भी बही-खाते का नवीनीकरण और मंगल कार्य की शुरुआत मार्च में ही होती है. ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है. मार्च से ही सूर्य मास के अनुसार मेष राशि की शुरुआत भी मानी गई है.


नवरात्र का वैज्ञानिक आधार

नवरात्र शब्द से 'नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध' होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते।
नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है। लेकिन, फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग
अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।
हालांकि आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। यहां तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं
जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे। आप अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है, किंतु यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं।
रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है। इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है।
यही रात्रि का तर्कसंगत रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपनी शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।



वैज्ञानिक आधार
नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।
नवरात्र में नौ दिन या नौ रात 
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। चूंकि यहां रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।
इन मुख्य इन्द्रियों में अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन, नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमें सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
चैत्र और आश्विन नवरा‍त्रि ही मुख्य माने जाते हैं. इनमें भी देवी भक्त आश्विन नवरा‍त्रि का बहुत महत्व है. इनको यथाक्रम वासंती और शारदीय नवरात्र कहते हैं. इनका आरंभ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को होता है. ये प्रतिपदा 'सम्मुखी' शुभ होती है.



 घट स्थापना की विधि एवं शुभ महूर्त 


हिंदू परिवारों में नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना की जाती है, जिसमें ज्वारे (एक प्रकार का धान) बोया जाता है। इसकी विधि इस प्रकार है-
सबसे पहले उस स्थान को गाय के गोबर से लीपें, जहां घट स्थापना की जानी है। एक बड़े मिट्टी के दीपक में जौ बोएं। इस दीपक को पूजा के स्थान पर स्थापित कर दें। अब अपनी इच्छा के अनुसार मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का कलश लें। इस कलश में कुएं का पानी भरकर इसमें पूजा की सुपारी, सिक्का, हल्दी की गांठ डाल दें। अब इस कलश के ऊपर पान (डंठल वाले) या अशोक के पत्ते के साथ नारियल रख दें। यह कलश पूजन स्थान पर स्थापित कर दें। कलश के नीचे थोड़े गेहूं भी रखें। अबीर, गुलाल, कुंकुम, फूल व चावल से इस कलश की पूजा करें।
दीपक स्थापन
घट स्थापना के साथ अखंड ज्योत भी जलाई जाती है। इसके लिए पूजन स्थान पर ही गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं तथा कुंकुम, चावल व फूल से उसकी पूजा करें। नीचे लिखे मंत्र को बोलते हुए दीपक की स्थापना करें-
भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं ह्यन्धकारनिवारक।
इमां मया कृतां पूजां गृह्णंस्तेज: प्रवर्धय।।
ये हैं घट स्थापना के शुभ मुहूर्त
सुबह 08.05 से 09.30 तक- शुभ
सुबह 09.35 से 10.35 तक- वृषभ लग्न
दोपहर 12.25 से 01.10 तक- अभिजीत मुहूर्त


 घट स्थापना में ध्यान रखने योग्य 5 मुख्य वास्तु नियम
माता आराधना का पर्व चैत्र नवरात्रि शनिवार से शुरू हो रहा है। नवरात्रि में घट (कलश या छोटा मटका) स्थापना व नौ दिनों तक जलने वाली अखंड ज्योत भी जलाई जाती है। घट स्थापना करते समय यदि वास्तु नियमों का पालन भी किया जाए तो और भी शुभ होता है। इन वास्तु नियमों का पालन करने से माता अति प्रसन्न होती हैं। जानिए इन वास्तु नियमों के बारे में-

1. ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को देवताओं की दिशा माना गया है। इसी दिशा में माता की प्रतिमा तथा घट स्थापना करना उचित रहता है।

2. यदि माता प्रतिमा के समक्ष अखंड ज्योत जला रहे हैं, तो इसे आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) में रखें। पूजा करते समय मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें।

3. घट की स्थापना चंदन के बाजोट (पटिए) पर करें तो बहुत शुभ होता है। पूजा स्थल के ऊपर यदि टाण्ड हो तो उसे साफ-सुथरी रखें। कोई कपड़ा या गंदी वस्तुएं वहां न रखें।

4. कई लोग नवरात्र में ध्वजा भी बदलते हैं। ध्वजा की स्थापना घर की छत पर वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में करें।

5. पूजा स्थल के सामने थोड़ा स्थान खुला होना चाहिए, जहां आसानी से बैठा जा सके। स्थापना स्थल के आस-पास शौचालय या बाथरूम नहीं होना चाहिए।



नवरात्रि के पहले दिन का महत्व व् पूजन विधि 

नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है. जिसमे चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों का विशेष महत्व है. चैत्र नवरात्रि से ही विक्रम संवत की शुरुआत होती है. इन दिनों प्रकृति से एक विशेष तरह की शक्ति निकलती है. इस शक्ति को ग्रहण करने के लिए इन दिनों में शक्ति पूजा या नवदुर्गा की पूजा का विधान है. इसमें मां की नौ शक्तियों की पूजा अलग-अलग दिन की जाती है. पहले दिन मां के शैलपुत्री स्वरुप की उपासना की जाती है. इस दिन से कई लोग नौ दिनों या दो दिन का उपवास रखते हैं.
पहले दिन की पूजा का विधान:
इस दिन से नौ दिनों का या दो दिनों का व्रत रखा जाता है. जो लोग नौ दिनों का व्रत रखेंगे वो दशमी को पारायण करेंगे. जो पहली और अष्टमी को उपवास रखेंगे वो नवमी को पारायण करेंगे. इस दिन कलश की स्थापना करके अखंड ज्योति भी जला सकते हैं. प्रातः और सायंकाल दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और आरती भी करें.
अगर सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते तो नवार्ण मंत्र का जाप करें. पूरे दस दिन खान-पान आचरण में सात्विकता रखें. मां को आक, मदार, दूब और तुलसी बिल्कुल न चढ़ाएं. बेला, चमेली, कमल और दूसरे पुष्प मां को चढ़ाए जा सकते हैं.
नवरात्रि का अर्थ होता है, नौ रातें। हिन्दू धर्मानुसार यह पर्व वर्ष में दो बार आता है। एक शरद माह की नवरात्रि और दूसरी बसंत माह की| इस पर्व के दौरान तीन प्रमुख हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है | जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।
तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम्।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम्।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः।

समस्त चित्र गूगल से साभार ,समस्त सामग्री गूगल से विभिन्न श्रोतो से एकत्र की है 

atoot bandhan …………हमारे  फेस बुक पेज पर भी पधारे 

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