शनिवार, 14 मार्च 2015

सफलता के मार्ग पर आलोचना,निंदा अपरिहार्य है






सफलता के मार्ग पर आलोचना,निंदा अपरिहार्य है


सफलता के मार्ग पर आलोचना अपरिहार्य है। दुनिया में ऐसा कौन है,जिसकी आलोचना या निंदा नहीं हुई.इन्सान तो इन्सान,लोग तो भगवान् तक की आलोचना से नहीं आते.आलोचना और निंदा एक तरह से सफलता का मापदंड भी है.आलोचना और निंदा सफल लोगो की ही होती है.आखिर 30 साल पहले कौन नरेन्द्र मोदी की आलोचना या निंदा करता था. आलोचना सदैव दूसरे व्यक्ति की राय होती है। विफलता सहानुभूति लाती है,लेकिन सफलता आलोचकों और निंदको की भीड़ भी
अपने साथ लाती है.यदि आप उनकी धारणासे सहमत हैं, तो उनकी आलोचना आपको स्वयं में सुधार लाने के लिए प्रेरित कर सकती है। परंतु यदि आप सहमत नहीं हैं, तो संभवतः आप नकारात्मकता को अंगीकार कर रहे हैं। नकारात्मक भावनाएं आप को दुर्बल बनाती हैं । कभी कभी आलोचना का सामना करना कठिन हो सकता है, विशेषकर जब आलोचना अपने प्रिय लोगों से आती है। जब दूसरे आप पर अपनी नकारात्मकता और राय थोपते हैं, उस क्षण ये निर्णय आप पर है कि आप उस आलोचना को अस्वीकार करते हैं, त्याग देते हैं या जाने देते हैं। यदि आप ऐसा करें तो आप शांतिपूर्ण रहेंगे और आपके ह्रदय को अधिक ठेस भी नहीं पहुंचेगी।
सदैव दूसरों में दोष ढूंढते रहना मानवीय स्वभाव का एक बड़ा अवगुण है। दूसरों में दोष निकालना और खुद को श्रेष्ठ बताना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। इस तरह के लोग हमें कहीं भी आसानी से मिल जाएंगे। प्रत्येक मनुष्य का अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव होता है। दूसरों के विषय में कोई अपनी कुछ भी धारणा बना सकता है।

                                          (चित्र गूगल से )

 हर मनुष्य का अपनी जीभ पर अधिकार है और निंदा करने से किसी को रोकना संभव नहीं है।लोग अलग-अलग कारणों से निंदा रस का पान करते हैं। कुछ सिर्फ अपना समय काटने के लिए किसी की निंदा में लगे रहते हैं तो कुछ खुद को किसी से बेहतर साबित करने के लिए निंदा को अपना नित्य का नियम बना लेते हैं। निंदकों को
संतुष्ट करना संभव नहीं है। जिनका स्वभाव है निंदा करना, वे किसी भी परिस्थिति में निंदा प्रवृत्ति का त्याग नहीं कर सकते हैं। इसलिए समझदार इंसान वही है जो उथले लोगों द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों की उपेक्षा कर अपने काम में तल्लीन रहता है। किस-किस के मुंह पर अंकुश लगाया जाए, कितनों का समाधान किया जाए!
प्रतिवाद में व्यर्थ समय गंवाने से बेहतर है अपने मनोबल को और भी अधिक बढ़ाकर जीवन में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहें। ऐसा करने से एक दिन आपकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी और आपके निंदकों को सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।जो सूर्य की तरह प्रखर है, उस पर निंदा के कितने ही काले बादल छा जाएं किन्तु उसकी प्रखरता, तेजस्विता और ऊष्णता में कमी नहीं आ सकती।

ओमकार मणि त्रिपाठी 
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