सोमवार, 16 मार्च 2015

तुम धरती हो...तुम्हे सहना होगा






तुम धरती हो...तुम्हे सहना  होगा

वह खटती रही
प्रताड़ित होती रही
लुटती रही
बार बार....लगातार
उससे कहा गया
तुम धरती हो...तुम्हे सह्ना होगा
उससे कहा गया
तुम ममता हो...तुम्हे पलना होगा
उससे कहा गया
तुम कोख हो....तुम्हे इसी से जन्मना
.....तो कभी
इसी मे मरना होगा
          औरत का जन्म किसी तपस्या से कम नहीं है। उसे हर परिस्थिति मे खुद को साबित करना होता है। खटती रह्ती है पूरे दिन, बिना अवकाश। उसकी पूरी ज़िंदगी तीन भागो मे बंटी रहती है। पहला हिस्सा पिता के घर, दूसरा पति के घर तो तीसरा पुत्र के घर बीतता है। एक जीवन में तीन घर संवारने वाली का अपना घर कौन सा है? पिता के घर सुनती रही- तुम्हे पराए घर जाना है। पति के यहाँ कहा गया- पराए घर से आई है न, हमारे घर के तौर-तरीके सीखने में थोडा टाइम लगेगा। बेटे के घर- कुछ सालो की मेहमान, न जाने कब अंतिम बुलावा आ जाए। प्रश्न वही कि उसका अपना घर कौन-सा है? उसका पूरा जीवन किसी चुनौती से कम नहीं है। उसके लिए दुनिया मे आना ही अपने आप मे एक संघर्ष है, एक ऐसा संघर्ष जो माँ की कोख से ही प्रारम्भ हो जाता है। वहाँ भी ख़तरा मंडराता रहता है,यदि वह कन्या-भ्रूण का रूप ले लेती है तो.....न जाने कब कोई तेज़ रौशनी कौंधेगीकुछ तीखे और धारदार औज़ार उसे ज़ख्म देंगे और वह खून में तब्दील कर दी जाएगी।  जन्म मिलते ही प्रताड़ित प्रारम्भ, संघर्ष प्रारम्भ। उसका लडकी होना बचपन पर भारी पडा । सयानी होने पर एक जिस्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा गई। कभी जिस्म पर चोट मिली , तो कभी आत्मा पर । कभी सम्मान लूटा गया, तो कभी सपने। कभी आकांक्षाएँ छलनी हुई तो कभी आत्मसम्मान । वह पीटी गई, घर से निकाली गई , किंतु फिर भी वह लौट आई । उसके शहर में रेलवे ट्रैक भी रहा होगा , नदी भी रही होगी , मगर फिर भी वह लौट-लौट कर आती रही । वह हर बार मार खाकर भागती है, मगर फिर भी लौट आती है और लौटने पर भी मार ही खाती है ।

                      (चित्र गूगल से साभार )
       हमारी संस्कृति में स्त्री को पूजनीय कहा तो गया है लेकिन जब कभी भी औरत की मान-मर्यादा और सम्मान की रक्षा की बात आती है तो सभी बिदक जाते हैं । इस दोहरेपन का श्रेय बहुत हद तक मनुस्मृति और आज इसी तरह के शास्त्रो को जाता है, जिसमे नारी को घर की सजावट की वस्तु या दैहिक सुख के लिए खिलौन-मात्र माना जाता है । अगर ऐसा न होता तो द्रौपदी पतियो द्वारा ही दांव पर ही न लगाई जाती । सत्यवादी हरिशचंद अपनी दक्षिणा को चुकाने हेतु अपनी ही स्त्री को किसी वस्तु के समान बेचते नहीं । राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा न ली जाती । ये सभी घटनाये हमारे समाज की सच्चाई को उजागर करती हैं । आज हम हर क्षेत्र में विकास का दावा करते हैं । हमारी दिनचर्या और प्रत्येक गतिविधि में आधुनिकता देखने को मिलती है । लेकिन फिर भी आज की स्त्रिया पुरुषों का उत्पीडन झेलती हैं । घर नाम की ऊंची-ऊंची और सख्त दीवारो के भीतर उनका कोमल तन और मन प्रताडना सहता है । वह अपने बच्चो को जीना सिखाते-सिखाते खुद हंसना भी भूल जाती है । अपने पति को खुश रखने के लिये उसके आगे झूठी मुस्कान का लिहाफ ओढे , नज़रे नीचे किए खडी रहती है जबकी हमारा समाज उसे पूजनीय मानता है । उसे देवी का स्वरूप कहता है , यत्र नार्येस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवता यह सूक्ति गहरे अर्थ रखती है । इसे समझ कर हम सम्पूर्ण मानवता को समझ सकते हैं । जिस घर-परिवार में नारी को सम्मान दिया जाता है वहा देवता भी निवास करते है । यदि हर परिवार में नारी को सम्मान करने वाले सदस्य हो तो वे पुरुष स्वय ही देवतुल्य हो जाएंगे । ऐसे सुखद परिवारो से मिलकर एक सुखद समाज का निर्माण होगा और अंततः समूचा विश्व ही सुखद हो उठेगा । यदि कोई मनुष्य अपने घर की स्त्रियो का सम्मान नहीं कर सकता तो वह बाहर की स्त्रियो का तो कतई सम्मान नहीं  कर पाएगा ।
नारी और समाज का घनिष्ठ सम्बंध है क्योंकि नारी के बगैर समाज और परिवार की कल्पना भी नहीं की जा सकती । सृष्टि के रचयिता ने सृष्टि-सृजन में स्त्री और पुरुष दोनो की महत्वपूर्ण सहभागिता रखी है । एक के बिना दूसरा अधूरा है । फिर क्या कारण है कि पुरुष स्त्री को कमज़ोर समझ कर उसका शोषण करने से पीछे नहीं हटता । आज हर क्षेत्र में स्त्रियो के प्रति अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं । यह   बात सच  है कि स्त्रियां नित नया इतिहास रच रही  हैं हर क्षेत्र  में अपना सिक्का जमा चुकी हैं लेकिन यह भी सत्य है कि उसी अनुपात  में उनके प्रति  होने वाले अपराधो की संख्या और विविधता में भी वृद्धि हुई है । उसे दिन-प्रतिदिन अपराध और अत्याचार द्वारा दबाया जा रहा है । स्त्री वर्ग इस अपराधिक चुनौती का सामना करने में असमर्थ नज़र आ रहा है ।
वह भी उड्ना चाहती है....स्वप्न देखना चाह्ती है...उन्हे पूरा करना चाह्ती है लेकिन वक्त के क्रूर हाथो में अपनी सभी आकाँक्षाओं का गला घोंट देती है । उसकी आंखो में पलने वाले सपने....उसके परवाज़....सब अपने बच्चो की आंखो से देखने लगती है। वह जिस खूंटे से बंधी है उसे उखाड़ देना चाह्ती है। वह उखाड़ नहीं पाती फिर भी संघर्ष करती है...उसकी गर्दन ऐंठ जाती है । इस संघर्ष में वह खूंटे को न भी उखाड़ पाए मगर वह टूटेगा ज़रूर। बार-बार हर रात एक ही ख्वाब बुनती है मुक्ति का...वज़ूद का। मुक्ति ना भी मिले, वज़ूद न भी बने तब भी बना रहे साथ मुक्ति का, वज़ूद का। जीवन न भी बचे, बचा रहे यत्न बदलने का।
 चलो ....उठो ....शुरूआत करो
कहीं से भी
क्यूँ न अभी ...यहीं से
माना बहुत गीले हैं पंख
मगर एक बार
तबियत से
फड़फड़ाके तो देखो
अपनी हथेलियों की मुठ्ठी बना
भींच लो जोर से सारे गम
मूंद लो पलकें
कि अब इनमें
कोई आँसू न पले
बहुत अनमोल है तुम्हारे सपने
यहाँ
अब इन्हें पलना होगा

      
रश्मि 
शिक्षा - पी-एच. डी. (कबीर काव्य का भाषा शास्त्रीय अध्ययन)
संप्रति - लेखन व अध्यापन 
विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में लेख, कविताएँ, कहानियाँ, पुस्तक-समीक्षाएं प्रकाशित 
नवभारत टाइम्स और आज समाज में नियमित कॉलम-लेखन 

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