मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

गिरीश चन्द्र पाण्डेय "प्रतीक" की कवितायें

डाँ.गिरीश पाण्डेय प्रतीक

अब रेखाएं नहीं
अब तो सत्ता तक पहुचने का कुमार्ग बन चुकी हैं
हर पाँच साल बाद
फिर रँग दिया जाता है
इन रेखाओं को
अपने-अपने तरीके से
अपनी सहूलियत के रँग में
कभी दो गज इधर
कभी दो गज उधर
बनी रहती है रेखा जस की तस

गिरीश चन्द्र पाण्डेय जी की कवितायें मैं तक सीमित नहीं हैं उनकी  कवितायों में सामाजिक भेद भाव के प्रति गहरी संवेदनाएं हैं ..... कवि मन कई अनसुलझे   सवालों के उत्तर चाहता है .... कहीं निराश होता है कहीं आशा का दामन थामता है.... आज के सन्दर्भ में स्त्री मुक्ति आन्दोलन है उसे वो भ्रमित करने वाला बताते हैं ....भ्रम में दोनों हैं स्त्री भी ,पुरुष भी  .......... कही बुजुर्ग माता -पिता की विवशता दिखाती हैं .... कुल मिला कर गिरीश जी की कवितायें अनेकों प्रश्न उठाती हैं और  हमारी संवेदनाओं को झकझोरती हैं 





                          गूगल से साभार 

●●असमान रेखाएँ●●
एक रेखा खींची है हमने
अपने मनोमस्तिष्क में
नाप लिया है हमने इंच दर इंच
अपने पैमाने से
क्या नापा और कैसे नापा हमने
ये बताना मुश्किल है
अगम ही नहीं
अगोचर भी है वो रेखा
जो खिंच चुकी है हजारों वर्ष पहले
उसको मिटाने की जद्दो जहद
आज कल खूब चल रही है
बड़े बड़े लोग उनकी बड़ी बड़ी बातें
पर काम वही छोटे
सोच वही संकीर्णता के दल-दल में फँसी और धँसी हुई
रेखा जस की तस
और गहरी और विभत्स होती हुई
और लम्बाई लेते हुए
दीवार को गिराना आसान है
पर दिलों में पड़ी दरार को पाटना बहुत मुश्किल
जातियों वर्गों के बीच की काली रेखाएं
अब रेखाएं नहीं
अब तो सत्ता तक पहुचने का कुमार्ग बन चुकी हैं
हर पाँच साल बाद
फिर रँग दिया जाता है
इन रेखाओं को
अपने-अपने तरीके से
अपनी सहूलियत के रँग में
कभी दो गज इधर
कभी दो गज उधर
बनी रहती है रेखा जस की तस
अपनी जगह पर
हाँ कुछ वर्षौ से एक छटपटाहट देखी गयी है
रेखा के आर-पार
मिटाने की कवायद जारी है
वर्षौ से खिंची रेखा को मिटाने
लगेंगे वर्षौ
ये कोई गणित के अध्यापक की रेखागणित नहीं
जिसे जब चाहो
वर्ग बनालो
जब चाहो आयत बना लो
जब कब चाओ त्रिभुज बनालो
जब चाहो वृत बनालो
ये तो अदृश्य है
समाज के इस छोर से उस छोर तक
अविकसित से विकसित तक
हर जगह व्याप्ति है इसकी
ये रेखाएं
जल,जमीन,जंगल
सब जगह
इसको मिटाना ही होगा
हम सबको अपने दिलों से दिमाग से
समाज से
आओ सब मिल संकल्प लें
इस नये वर्ष में दूरियाँ कुछ कम करें

                                            गूगल से साभार 
●गत को भूल स्वागत है तेरा●
मुश्किल है समेटना
हर पल विपल को
और उस बीते हुए कल को
घड़ी की सुई ही दे सकती है हिसाब
और परिभाषित कर सकती है हर क्षण को
मुझमें तो क्षमता है नहीं कि
में लिख सकूँ
उन अँधेरी रातों की आहट
जिन्दगी की छटपटाहट
ख्वाबों से लड़ता नौजवान
इंसान को काटता इन्सान
कैसे लिखूँ उस विभीषिका को
जिसने लूट लिया उस विश्वास को
जो था उस परम आत्मा पर
उस इन्सान को इन्सान कह पाना मुश्किल है
जिसने हैवानियत की हद पार कर दी हो
कैसे बांचा जा सकता है
सत्ता के गलियारों का स्याह पहलु
कौन उकेर पायेगा
उस माँ का दर्द जिसने खो दिया हो अपने लाल को
और अपने सुहाग को
कैसे पिघलेगा मोम सा दिल
जब रौंद दिया गया हो दिल के हर कोने को
बना दिया गया हो
नम आंखों को सूखा रेगिस्तान
कैसे होगा संगम
दिलों का,सीमाओं का,जातियों का
उन भावों को
जो सरस्वती सी लुप्त हो चुकी नदि से हैं
बहुत कुछ चीख रहा है
उन पाहनों के नीचे दबा कुचला बचपन
सिसक रही हैं आत्माएं
अनगिनत दुराचारों की काल कोठरियों में
कैसे कहूँ की में शिक्षित हो गया हूँ
अभी भी अशिक्ष असंख्य मस्तिष्क हैं यहाँ
डिग्रियां छप रहीं है
होटलों के कमरों में
बिक रहा है ईमान कौड़ी के मोल
कैसे परिभाषित करूँ खुद को
एक पुरुष के रूप में
एक मानव के चोले में
बहुत कुछ लुट चूका है वजूद
भाग रहा हूँ
पैसों की अंधी दौड़ में
न जाने क्या पा जाऊंगा और कितनी देर के लिए
कुछ पता नहीं है
कुर्सी महंगी ही नहीं
मौत का आसन भी है
फिर भी दौड़ रहा हूँ खाई की तरफ
दौड़ रहा हूँ मरुस्थल की ओर
जानता हु ये मृगमरीचिका है फिर भी दौड़ रहा हूँ
बुला रहा हूँ सामने खडी मौत को
कैसे लिखूं उस सुबह को
जिसने मुझे जगाने का प्रयास किया
उस हर किरण को
जिसने तमस को दूर किया
उस उर्जा के पुंज को
जिसने एक नव ऊर्जा का संचार किया
ओह उस भविष्य को पकड नहीं सकता जो मेरे कदम से एक कदम आगे है
बस उसके पीछे चल रहा हूँ
रास्ते के हर मोड़ को जीते हुए
जरा सम्हाल कर
जरा सम्हल कर चलना है
इंतजार है उस सुबह का जो
एक नए उत्साह को लायेगी
जिसके सहारे वक्त को जी पाऊंगा
वक्त पर
जो थोडा मुश्किल होगा
पर ना मुमकिन नहीं


                                                


●नदी से भाव●
बह रही थी नदी
पाहनों से टकराते हुए,
छलकते हुए
कुछ ऐसे ही थे मेरे भाव
जो टकरा रहे थे
उन बिडंबनाओं से
उन रुढियों से
जो मुझे मानव होने से रोकती हैं
देखता हूँ इस नदी की गती
जो बह रही है
अपनी चाल पर
पर कुछ किनारे बदल रहे थे
उसकी ढाल
मजबूर कर रहे थे
रास्ता बदलने को
जैसे मुझसे कोई कह दे
तेरा रास्ता तू नहीं
कोई और बनाएगा
नदी चली जा रही है।
बिना किसी की परवाह करे
अगले पड़ाव को पार करने की होड़
हर जल बिंदु मचल रही हो जैसे
सागर में समा जाने को।
उस सागर में
जहां उसका अस्तित्व ,ना के बराबर होगा।
फिर भी चाहिए उसे मंजिल
अपने को समर्पित कर देना
आसान नहीं है
मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं
नदी का वेग बढ़ता चला गया
ज्यो ज्यों घाटी नजदीक आने लगी
कुछ यों ही मेरे भाव भी उतावले थे
उस समतल को पाने के लिए
जहाँ सब समान हों
जहाँ कोई किसी का रास्ता न रोके







●●मुक्ति या बन्धन●●
बहुत हंगामा मचा है आजकल
स्त्री-पुरुष के के सम्बन्धों पर
बहुत कुछ बोला और लिखा जा रहा है
उनके बीच के मानसिक द्वंद्व  पर
शब्दों के बाण दागे जा रहे हैं
एक ओर से दूसरी ओर
असमान रूप से
निशाना कौन है
कोई उत्तर नहीं मिलता 
पूछे जाने पर
क्या कहें इसे धर्म युद्ध या
अधर्म का दलदल
या कि अपने वर्चस्व को कायम रखने की जद्दोजहद
एक अघोषित युद्ध सा चल रहा है
जैसे दिल और दिमाग का अंतर्द्वंद्व
सब कुछ आभासी ही कहा जा सकता है
दिमाग से 
पुरुष और स्त्री मानो दो अलग अलग प्राणी हों
दिल से दोनों एक दुसरे के पूरक
पुरुष छोड़ना नहीं चाहता अपनी सत्ता
जो कायम की है उसने
युगों से 
पूर्वपुरुषोपार्जित तथाकथित सत्ता
स्त्री पूर्णतःमुक्त नहीं हो पाई है
अपनी तथाकथित गुलामी से
पुरुष उस अजगर की तरह है
जो सोने का ढोंग करता है
अपनी मजबूरियों से
स्त्री चिल्लाने की कोशिस कर रही है
पर चिल्लाने का साहस जुटा नहीं पा रही
जकड़ी है
अपनी कोमलता और ममता की भावनाओं से
पुरुष उस गिरगिट सा माना जाता रहा है
स्त्रीयों के मध्य
जो अपने हिसाब से अपने रँग बदलने में माहिर होता है
दिलचस्प है
स्त्री मुक्ति के दरवाजे खोलने का दावा करने वाले
असल में
खुद अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर के बैठे हैं
इस इन्तजार में कि
शहीद कोई और होगा
दीवार पर अंकित नाम उनका होगा
है ना कुछ अजीब दास्ताँ 
स्त्री मुक्ति के पुरोधाओं की
इस शीत युद्ध का आगाज हर घर में हो चुका है
आपको पता है 
युद्ध किसी रूप में लड़ा जाय
वह विनाशकारी ही होता है
जीत किसी की भी हो
हारती मानवता है
यह वैसे युद्ध नहीं
पर युद्ध से कम नहीं
यहाँ शत्रु प्रत्यक्ष नहीं
अपरोक्ष व्याप्ति है
दिलो दिमाग में
आँख मिचौनी चल रही है
दोनों ओर से
शब्द बाण दिन प्रतिदिन तीखे होते जा रहे हैं
आरोप प्रत्यारोपों के बाजार गरम हैं
स्त्री अपने को युगों से छला हुआ बताती है
पुरुष ने शब्द गढ़ लिए
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ...आदि
पर वो आज भी भ्रम में है
अपने मगरमच्छ होने के एहसास के साथ
अगण्य उपमाओं से शुषोभित किया जा चूका है
पुरुष जाति को
फिर भी पुरुष ने जो चक्रव्यूह बनाया है
अपने आगमन से ही बनाता आया वो इस जाल को
स्त्री इस चक्रव्यूह से मुक्त होना भी चाहती है 
और नहीं भी
दुविधा का फायदा पुरुष को लेना ही है
और युगों के बंधन को तोडना इतना आसां भी नहीं
क्या पुरुष अपने ही बनाये जाल में फँसेगा
मकड़ी की तरह
स्त्री अभी तो अपने से ही मुक्त नहीं हो पायी है
विडम्बना है कुछ समय से 
पुरुष लगभग मौन की स्थिति में है
स्त्री इस मौन के मायने ढूँढ रही है
खुद में




●मुक्ति जो मिलती नहीं●
जो ये मेरे माथे के बल है ना
इन्हें मजबूरी मत समझना
बहुत कुछ है इनके पीछे
जो कहा नहीं जा सकता
जो ये मेरे चेहरे की झुर्रियाँ हैं ना
इन्हें हलके में मत लेना
ये बुढापा तो है ही
इन झुर्रियों के पीछे जो इतिहास हैं ना
शब्दों में नहीं कहा जा सकता
जो ये झुकी कमर देख रहे हो ना
इसे यों ही ना नकार देना
तुझे ढकते ढकते ही तो झुकी है
कुछ उम्र का बोझ भी है
फिर भी झुकना तो मेरे संस्कारों में रहा है
जिसे कूबड़ नहीं कहा जा सकता
जो ये लाठी है ना
ये तो वही कर रही है
जो तुझे करना है
अफ़सोस तू लाठी भी नहीं बन सकता
आज जिस देह की गंध बुरी लगती है ना
उसी देह में तुझसे पुष्प खिले
में गुलकंद नहीं बन शकती
अगर बन पाती
तो शायद तू इस तरह दुत्कारता नहीं
मैं आज भी बाँध लाती हूँ
गुड़ की डली
इस फटी धोती के आंचल में
पर अब तू उस तरह मेरे पास नहीं आता
जिस तरह बचपन में आता था
तुझे पता है
एक दिन सबको इसी रस्ते जाना है
इन सब दुश्वारियों से गुजरते हुए
मैं ना जाने क्यों
भीख माँगती हूँ
पर आज तेरे लिए नहीं
अपनी मुक्ति के लिए


डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
परिचय-डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय( प्रतीक)
ग्राम- बगोटी पो-बगोटी चम्पावत
सम्प्रति-शिक्षा विभाग उत्तराखंड में अध्यापन कार्य में संलग्न।
प्रथम काव्य संग्रह-आईना प्रकाशित
अन्य-क्षेत्रीय,राष्ट्रिय पत्र पत्रिकाओं में लेख व कविताएँ प्रकाशित।
समस्त चित्र गूगल से साभार  

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