रविवार, 14 दिसंबर 2014

बेमेल विवाह के विभिन्न आयाम

   
                                            संगीता पाण्डेय





नाम - संगीता पाण्डेय
सम्प्रति :अध्यापन
शैक्षिक योग्यता - अंग्रेजी , शिक्षाशास्त्र तथा राजनीती विज्ञानं में परास्नातक ,
 शिक्षाशास्त्र विषय में नेट परीक्षा उत्तीर्ण , पी एच डी हेतु नामांकित। 


मेरा परिचय ............. 
साहित्य प्रेमी माता - पिता की संतान होने के कारण बचपन से ही मेरा भी रुझान साहित्य में रहा। कवि सम्मेलनों में जाना और काव्य पाठ  सुनना ही कवितायेँ लिखने हेतु मेरी प्रेरणा के स्रोत  बने।  अंग्रेजी  साहित्य में परास्नातक करते समय कवितायेँ लिखने का श्री गणेश हुआ। 

वैसे तो प्रकृति में व्याप्त प्रत्येक वस्तु  मुझे आकर्षित करती है।  किन्तु मानव स्वाभाव तथा मानवीय सम्बन्ध  मेरी जिज्ञासा   का विषय रहें हैं। उपकरणीय जटिलताओं और विद्रूपताओं ने  मानवीय संबंधों के समीकरण को यांत्रिक बना दिया। सबकुछ स्थायी एवं सुविधापूर्ण बनाने की लालसा ने मानवीय संवेदनाओं को बुरी तरह से प्रभावित किया। मुझे ऐसी परिस्थितियां सदैव कुछ कहते रहने को विवश करती रहीं। 




बेमेल विवाह के विभिन्न आयाम 



                                    (चित्र -अनुप्रिया )
विवाह न केवल दो आत्माओं का संयोग मात्र है वरन दो संस्कारों एवं परिवारों का भी संयोग है। विवाह में कुण्डलियाँ तो मिलाई जाती हैं , गुणों में अधिक अंतर न होने पाये इस बात का विशेष ध्यान भी रखा जाता है तथापि बहुत सारे आधारों पर बेमलता को समाप्त किया जा सकना संभव नहीं हो पाता। वैवाहिक बेमलता के कई ऐसे आयाम बताये जा सकते हैं जिनके प्रभाव से विवाह के सम्बन्धों  को टूटते , बिखरते एवं सिसकते देखा गया है। फलतः जिस सम्बन्ध की नींव भावी जीवन को सुखी व संपन्न बनाने के लिए रखी गयी थी वही सम्बन्ध जीवन भर के दुःख का कारण बन जाता है। 

अद्यतन परिस्थितियां हों या प्राचीन समाज ;विवाह को सदा ही परिभाषित किये जाने की प्रथा है। कुछ लोग इसे सामाजिक  संस्था मानते हैं , कुछ लोग सामाजिक समझौता , कुछ लोग दो आत्माओं का मिलन , कुछ लोग दो संस्कारों का संयोग , तो वहीँ कुछ लोग इसे जुआ मान कर भी चलते हैं। फ़िलहाल हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में देखा जाये तो विवाह अनुबंध नहीं वरन जन्म - जन्मांतर का सम्बन्ध है। जो सोलह धार्मिक संस्कारो में से एक है। किन्तु स्थिति तब दुःखद हो जाती है  जबकि विभिन्न स्तरों पर समानता लुप्तप्राय होती है।  जिसके कारण वैवाहिक सम्बन्धो में दरार आ जाती है या तलाक़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। विवाह में बेमलता के विभिन्न आयामो को इंगित करते हुए कहा जा सकता है कि ये शैक्षिक , सामाजिक , आर्थिक , शारीरिक , धार्मिक , संवेगात्मक तथा आयु में व्यापक अंतर आदि विभिन्न आधारों  पर हो सकते हैं। 


शैक्षिक बेमलता .......... निःसंदेह शिक्षा समायोजन करना सिखाती है जबकि शैक्षिक स्तर पर भारी विषमता वैवाहिक जीवन को कलुषित बना देती है। यदि पति - पत्नी शैक्षिक स्तर पर एक दूसरे के समकक्ष नहीं होते तो विचारो का आदान - प्रदान सहज नहीं होता। एक दूसरे के विचारो को उन्ही अर्थों में आत्मसात कर पाना जिन अर्थों में कहे गए है , निश्चय ही वैवाहिक जीवन को सुगम एवं सरल बनाता है। समझ का आभाव होने पर निरर्थक आरोपों - प्रत्यारोपों की  श्रंखला आरम्भ हो जाती है जो वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देती  है। 

 सामाजिक रूप से वैवाहिक बेमलता ……… सामाजिक रूप से वैवाहिक बेमलता को हम तब देख पाते है जबकि पति पत्नी के मध्य संस्कृति एवं सभ्यता के स्तर पर स्पष्ट अंतर होता है। दोनों में से कोई एक गाँव से सम्बंधित है तो दूसरा शहर से , जहाँ एक परम्पराओं और रूढ़ियों का पुजारी है , तो वहीँ दूसरा हर बात को तर्क की कसौटी पर कसने का अभ्यस्त होता है। अपनी - अपनी ढपली, अपना - अपना राग ; परिणामतः टकराव और अलगाव स्वाभाविक रूप से  जन्म ले लेता है। 
                                               

                                           (चित्र गूगल से साभार )
अत्यधिक आर्थिक विषमता भी बेमेल विवाह के महत्वपूर्ण आयामो में से एक है। स्थिति तब उतनी दयनीय नहीं होती जब की पति पक्ष आर्थिक रूप से अधिक संपन्न होता है , इसके विपरीत यदि पत्नी पक्ष आर्थिक  रूप से अधिक सबल है तो दोनों के मध्य सामंजस्य बहुत कठिन हो जाता है।आर्थिक रूप से निम्न परिवार से आई लड़की जहाँ ससुराल में धीरे धीरे सामंजस्य बना लेती है वही आर्थिक रूप से उच्च परिवार से आई हुई लड़की प्रारम्भ से परिवार में संदेह और नकचढेपन का पर्याय बन जाती है। पति और उसके परिवार वाले अपनी कुंठा और हीनभावना के तहत नववधू  की हर छोटी बड़ी बात को तूल देकर पारिवारिक वातावरण को विषाक्त बना देते हैं। कभी - कभी यह भी देखा जाता है कि आर्थिक रूप से संपन्न लड़की के मायके वालों से ससुराल वालों की अपेक्षाएं सुरसा के मुख की भांति होती हैं तथा मांगें पूर्ण न होने पर लड़की को प्रताड़ित किया जाता है। हाल की एक घटना का उदाहरण देते हुए कहा जा सकता है कि लड़की को ससुराल वालो ने जलाकर मार डाला क्योंकि लड़की का भाई एक आला अफसर होते हुए भी अयोग्य बहनोई को एक अदद सरकारी भी नहीं दिला पा  रहा था। लोभ के कारन , जीवन की समाप्ति के रूप में प्रेम विवाह का यह अंत हुआ। 


शारीरिक रूप से वैवाहिक बेमलता को इंगित करते हुए कहा जा सकता है कि जब पति और पत्नी लम्बाई - चौड़ाई , सुंदरता , शारीरिक विकलांगता एवं स्किन कलर में एक दूसरे से इतने भिन्न हो  उन्हें साथ देखना आँखों को स्वाभाविक न लगे। ऐसी स्थिति में दोनों को ही एक दूसरे के  साथ  सामाजिक रूप से उपस्थित होने में असुविधा , ग्लानि , लज्जा एवं हीनभावना का अनुभव होता है। 




                                                 (चित्र गूगल से साभार )
 अन्तर्जातीय विवाहयद्यपि भारत में अन्तर्जातीय विवाह अभी प्रचलन का हिस्सा नहीं है तथापि यदा - कदा  देखा जा सकता है। यह भी सच है की यदि ऐसे विवाह होते भी हैं तो उसके मूल में प्रेम विवाह ही हुआ करते हैं। प्रारम्भ में प्रेम विवाह के रूप में ऐसे सम्बन्ध बना तो लिए जाते हैं किन्तु यथार्थ के धरातल पर पाँव  पड़ने पर निष्ठुर सत्य का सामना कर पाना सबके लिए सहज नहीं होता। परिणामतः आरोपों - प्रत्यारोपों से विवाद  प्रारम्भ होता  है तथा तलाक़ पर समाप्त। 

भावुकता में अंतर कहा जाता है की ' अति सर्वत्र वर्जते ' ऐसे में पति पत्नी दोनों में से कोई एक अति संवेदनशील है या अत्यंत भावुक है, तो भी स्थिति गंभीर हो सकती है। एक अत्यंत सैद्धांतिक तो दूसरा व्यापक रूप से व्यवहारिक , तब भी सामंजस्य कठिन हो जाता है। 


                                        (चित्र गूगल से साभार )


पति पत्नी की आयु में व्यापक अंतर भी बेमेल विवाह के प्रमुख आयामों में से एक है। यह अंतर दो आधारो पर सम्भव है। प्रथम तो वह जबकि स्त्री से पुरुष आयु में आवश्यकता से अधिक अर्थात कम से कम दस - पन्द्रह वर्ष बड़ा हो ।  दूसरा यह कि पुरुष से स्त्री आयु में आवश्यकता से अधिक अर्थात कम से कम दस - पन्द्रह वर्ष बड़ी  हो। पुरुष का स्त्री से आयु में बड़ा होना भारतीय सन्दर्भ में सामान्य सी बात है यद्यपि पत्नी का पति से आयु में बड़ा होना कम  ही देखा जाता है। किन्तु यदि पति अपनी पत्नी से दस - पंद्रह वर्ष बड़ा है तो वो पति न रहकर पिता की भूमिका में आ जाता है। पत्नी को कम आयु का जानकर अनुभव में कम मानने लग जाता है। अपने विचार थोपना , अपनी पसंद थोपना पति का स्वाभाव बन  जाता है। वहीँ दूसरी तरफ पत्नी घुटन महसूस करने लग जाती है।  पत्नी में  मानसिक एवं शारीरिक असंतोष पनपने लगता है। परिणामतः विवाद जन्म ले लेता है। कभी - कभी पति अपनी पत्नी पर निराधार संदेह करने लग जाता है।  दूसरे पुरुष की तरफ पत्नी का देख लेना या पत्नी की तरफ दुसरे पुरुष का देख लेना भी पति को नागवार गुजरने लगता है। फलस्वरूप क्लेश का  जन्म स्वाभाविक है। कमोबेश यही परिस्थितियां तब भी उत्पन्न हो सकती हैं जबकि स्त्री आयु में अधिक बड़ी हो। विचारों और इच्छाओं का व्यापक अंतर अंततः रिश्ते में खटास उत्पन्न कर ही देता है। 


अतः यह मानना होगा की विवाह के  स्वरुप को क्षत - विक्षत करने में विभिन्न ऐसे तथ्यों की भूमिका होती है जिन्हे हम अक्सर विवाह के समय अनदेखा कर देते है। यदि कुंडली के गुणों को मिलाने की अपेक्षा इन छोटी बड़ी - बातों पर ध्यान दिया जाये तो संभवतः रिश्तों के निरंतर टूटने की श्रृंखला को सीमाबद्ध  किया जा सकता  है

संगीता पाण्डेय 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत और सटीक लेख बहुत सहजता से किया गया बारीकी विश्लेषण निश्चित ही उन सभी पहलूयों पर रौशनी डालता है जिससे ये रिश्ते बिखरते है या अपनी साँसे तोड़ देते है

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  2. बहुत खूबसूरत और सटीक लेख बहुत सहजता से किया गया बारीकी विश्लेषण निश्चित ही उन सभी पहलूयों पर रौशनी डालता है जिससे ये रिश्ते बिखरते है या अपनी साँसे तोड़ देते है
    इस सार्थक आलेख के लिए साधुवाद संगीता

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  3. यथार्थ परख एक सार्थक आलेख .......

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  4. जब आप संसार को उसके विस्तृत रूप में बस देखना शुरू ही करते हो,
    और अनेकों नई परतें खुलती हैं, उसमें कुछ सत्य, तो कुछ भ्रम होते हैं।
    उफनता उत्साह, बहुत सारे असमंजस, बहुत से विस्मय।
    इतना अच्छा लिखती हो उसमे
    संसार का ज्ञान, अनुभव, सत्य और आध्यात्म समा जाता है।

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