बुधवार, 10 दिसंबर 2014

अरविन्द कुमार खेड़े की कवितायेँ

                   अरविन्द कुमार खेड़े



1-परिचय...
अरविन्द कुमार खेड़े  (Arvind Kumar Khede)
जन्मतिथि27 अगस्त 1973
शिक्षाएम..
प्रकाशित कृतियाँ- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्प्रति-प्रशासनिक अधिकारी लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग मध्य प्रदेश शासन.
पदस्थापना-कार्यालय मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, धार, जिला-धार .प्र.
पता- 203 सरस्वती नगर धार मध्य प्रदेश.
मोबाईल नंबर- 9926527654
ईमेल- arvind.khede@gmail.com 


आत्मकथ्य-
'' मैं बहस का हिस्सा हूँ... मुद्दा हूँ....मैं पेट हूँ....मेरा रोटी से वास्ता है...."
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अरविन्द जी की कविताओं में एक बेचैनी हैं ,जहाँ वो खुद को व्यक्त करना चाहते हैं।  वही उसमें एक पुरुष की समग्र दृष्टि पतिबिम्बित होती है ,"छोटी -छोटी खुशियाँ "में तमाम उत्तरदायित्वों के बोझ तले  दबे एक पुरुष की भावाभिव्यक्ति है. बिटिया में  सहजता से कहते हैं की बच्चे ही माता -पिता को  वाला सेतु होते हैं। ………कुल मिला कर अपनी स्वाभाविक शैली में वो  कथ्य को ख़ूबसूरती से व्यक्त कर पाते हैं। आइये आज "अटूट बंधन" पर पढ़े अरविन्द खड़े जी की कविताएं ……………     

1-कविता-पराजित होकर लौटा हुआ इंसान
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पराजित होकर लौटे हुए इंसान की
कोई कथा नहीं होती है
कोई किस्सा होता है
वह अपने आप में
एक जीता-जागता सवाल
होता है
वह गर्दन झुकाये बैठा रहता है
घर के बाहर
दालान के उस कोने में
जहॉ सुबह-शाम
घर की स्त्रियां
फेंकती है घर का सारा कूड़ा-कर्कट
उसे भूख लगती
प्यास लगती है
वह जीता है
मरता है
जिए तो मालिक की मौज
मरे तो मालिक का शुक्रिया
वह चादर के अनुपात से बाहर
फैलाये गए पाँवों की तरह होता है
जिसकी सजा भोगते हैं पांव ही.

                      (चित्र गूगल  साभार )

2-कविता-तुम कहती हो कि.....
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तुम कहती हो कि
तुम्हारी खुशियां छोटी-छोटी हैं

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
जिनकी देनी पड़ती हैं
मुझे कीमत बड़ी-बड़ी
कि जिनको खरीदने के लिए
मुझे लेना पड़ता है ऋण
चुकानी पड़ती हैं
सूद समेत किश्तें
थोड़ा आगा-पीछा होने पर
मिलते हैं तगादे
थोड़ा नागा होने पर
खानी पड़ती घुड़कियां

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
कि मुझको पीनी पड़ती है
बिना चीनी की चाय
बिना नमक के भोजन
और रात भर उनींदे रहने के बाद
बड़ी बैचेनी से
उठना पड़ता है अलसुबह
जाना पड़ता है सैर को

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
कि तीज-त्योहारों
उत्सव-अवसरों पर
मैं चाहकर भी
शामिल नहीं हो पाता हूँ
और बाद में मुझे
देनी पड़ती है सफाई
गढ़ने पड़ते हैं बहानें
प्रतिदान में पाता हूँ
अपने ही शब्द

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
कि बंधनों का भार
चुका  नहीं पाता हूँ
दिवाली जाती है
एक खालीपन के साथ
विदा देना पड़ता है साल को
और विरासत में मिले
नए साल का
बोझिल मन से
करना पड़ता है स्वागत

भला हो कि
होली जाती है
मेरे बेनूर चेहरे पर
खुशियों के रंग मल जाती है
उन हथेलियों की गर्माहट को
महसूसता हूँ अपने अंदर तक
मुक्त पाता हूँ अपने आप को
अभिभूत हो उठता हूँ
तुम्हारे प्रति
कृतज्ञता से भार जाता हूँ
शुक्र है मालिक
कि तुम्हारी खुशियां छोटी-छोटी हैं

                                               (चित्र गूगल से साभार )           


3-कविता-जब भी तुम मुझे
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जब भी तुम मुझे
करना चाहते हो जलील
जब भी तुम्हें
जड़ना होता है
मेरे मुंह पर तमाचा
तुम अक्सर यह कहते हो-
मैं अपनी हैसियत भूल जाता हूँ
भूल जाता हूँ अपने आप को
और अपनी बात के
उपसंहार के ठीक पहले
तुम यह कहने से नहीं चुकते-
मैं अपनी औक़ात भूल जाता हूँ
जब भी तुम मुझे
नीचा दिखाना चाहते हो
सुनता हूँ इसी तरह
उसके बाद लम्बी ख़ामोशी तक
तुम मेरे चेहरे की ओर
देखते रहते हो
तौलते हो अपनी पैनी निगाहों से
चाह कर भी मेरी पथराई आँखों से
निकल नहीं पाते हैं आंसू
अपनी इस लाचारी पर
मैं हंस देता हूँ
अंदर तक धंसे तीरों को
लगभग अनदेखा करते हुए
तुम लौट पड़ते हो
अगले किसी
उपयुक्त अवसर की तलाश में.



4-कविता-उस दिन...उस रात......
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उस दिन अपने आप पर
बहुत कोफ़्त होती है
बहुत गुस्सा आता है
जिस दिन मेरे द्वार से
कोई लौट जाता है निराश
उस दिन मैं दिनभर
द्वार पर खड़ा रहकर
करता हूँ इंतजार
दूर से किसी वृद्ध भिखारी को देख
लगाता हूँ आवाज
देर तक बतियाता हूँ
डूब जाता हूँ
लौटते वक्त जब कहता है वह-
तुम क्या जानो बाबूजी
आज तुमने भीख में
क्या दिया है
मैं चौंक जाता हूँ
टटोलता हूँ अपने आप को
इतनी देर में वह
लौट जाता है खाली हाथ
साबित कर जाता है मुझे
कि मैं भी वही हूँ
जो वह है
उस दिन अपने आप पर......
उस रात
मैं सो नहीं पाता हूँ
दिन भर की तपन के बाद
जिस रात
चाँद भी उगलता है चिंगारी
खंजड़ी वाले का
करता हूँ इंतजार
दूर से देख कर
बुलाता  हूँ
करता हूँ अरज-
खंजड़ी वाले
आज तो तुम सुनाओ भरथरी
दहला दो आसमान
फाड़ दो धरती
धरा रह जाये
प्रकृति का सारा सौंदर्य
वह एक लम्बी तान लेता है
दोपहर में सुस्ताते पंछी
एकाएक फड़फड़ा कर
मिलाते है जुगलबंदी
उस रात.......



                        (चित्र गूगल से साभार )
५ बिटिया --------
बिटिया मेरी,
सेतु है,
बांधे रखती है,
किनारों को मजबूती से,
मैंने जाना है,
बेटी का पिता बनकर,
किनारे निर्भर होते हैं,
सेतु की मजबूती पर.

                          (चित्र गूगल से साभार )
-अरविन्द कुमार खेड़े.

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1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर कविताएं। सारी कविताएं अच्छी हैं परन्तु पहली कविता बहुत ही अच्छी लगी। शानदर्। अकेले ही अकेले हूँ

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