गुरुवार, 27 नवंबर 2014

अनामिका चक्रवर्ती की कवितायेँ


                                Anamika Chakraborty
                                      अनामिका चक्रवर्ती ''अनु'' 



एक  स्त्री कितना कुछ भोगती है जीवन में ........... बहुत जरूरी है उस पीड़ा उस कसक को सामने लाना ,आज साहित्य में इसे स्त्री विमर्श का नाम दिया गया है ,जिस पर पुरुष भी लिख रहे हैं ........परंतू जब स्त्री लिखती है तो वो उसका भोगा  हुआ सच होता है ,जो मात्र शब्दों तक सीमित नहीं रहता अपितु मन की गहराइयों में उतरता है ........कुछ हलचल उत्पन्न करता है और शायद एक इक्षा भी की कुछ तो बदले यह समाज ........इन विषयों  पर अनामिका चक्रवर्ती जी जब कलम चलाती  हैं तो वह दर्द महसूस होता है ......... अपनी कविता घूंघट में वो परदे के पीछे छिपी स्त्री के दर्द के सारे परदे हटा देती हैं, कहीं वो याचना करती है मैं माटी  जब रिश्तों की नदी में बह जाऊ  तो दरख्त बन अपनी जड़ों में समां लेना .........लेकिन उनकी यात्रा यहीं तक सीमित नहीं है वो किसान  के दर्द को भी महसूस करती है ..........आज अनामिका जी को पढे  और जाने उनके शब्दों में छिपे गहरे भावों को  


हर बार कुछ नई बनती गई,
प्रकृति थी जो सर्वशक्ति थी।
जो अबला ना थी ।
हर वक़्त जीती रही औरत होने का सच
पर जी ना पाई कभी औरत होने को ।





1-   '' घूँघट ''

दाँतो तले दबाये रखती,
कई बार छूटता जाता ।
पर सम्भाल लेती ।
अब तक सम्भाल ही तो रही है।
सर पर रखे घूँघट को ।
याद नहीं पहली बार कब रखा।
पर खुद को आड़ में रख लिया हमेंशा के लिये।
कभी बालो को हवा से खेलने न दिया।
ना कभी गालो पर धूप पड़ने दी।
आँखो ने हर रंग धुंधलें देखे ।
देखा नहीं कभी बच्चे को खिलखिलाते ,
हाँ सुनती जरूर थी।
माथे से आँखो तक खींचती रहती,
गोद से चाहे बच्चा खिसकता रहा।
साँसे बेदम होती सपने बैचेन।
इच्छाये सिसकती रहीं,
दिल किया कई बार,
बारिश में खुद को उघाड़ ले,
बूंदो को चूम ले,
ये पाप कर न सकी।
घूँघट का मान खो न सकी।
चौखट पर चोट खाती,
उजालो के अंधेरे में रहती।
बालो की काली घटा,
जाने कब चाँदी हो गई,
मगर घूँघट टस से मस ना हुआ।

                                                        (चित्र गूगल से साभार )

2-
औरत

हर वक़्त जीती रही
औरत होने का सच
पर जी ना पाई कभी औरत होने को
रिस्तों के साँचे में,
हर बारकितनी बार ढाला गया।
हर बार कुछ नई बनती गई,
प्रकृति थी जो सर्वशक्ति थी।
जो अबला ना थी ।
हर वक़्त जीती रही औरत होने का सच
पर जी ना पाई कभी औरत होने को ।



                                      (चित्र गूगल से साभार )



3 -''
किसान''

जल मग्न पाँव किये
कुबड़ निकालें सुबह से साँझ किये।
गीली रहीं हाथो की खाल हरदम।
दाने दाने का  मान किये।
धूप सर पर नाचती रहीं।
गीली मिट्टी तलवो को डसती रहीं।
भूख निवाले को तरसती रहीं।
धँसे पेट जाने कितनो के निवाले तैयार किये।
धान मुस्काती रहीं लहलहाती रहीं।
साँसे कितनी उखड़ती रहीं।
हरा सोना पक कर हुआ खाटी।
पर दरिद्र किसान
ताकता रहा दो जून की रोटी
आत्ममुग्ध सरकार से।



                                     (चित्र गूगल से साभार )

4-
दरख़्त
जब रिश्तों  की नदीं में बह जाऊँ
फ़र्ज़ की आँधी में ,
मिट जाऊँ।
बन जाना तब तुम एक दरख़्त
जिससे लिपट के मैं सम्भल जाऊँ
बहने न देना ,मिटने न देना
बस मिट्टी बना कर समा लेना ,
खुद की जड़ो में,
मै जी जाऊँगी सदा के लिये




5-
नियती है बहना

शायद मैं सुन सकती तुम्हारी आवाज़
अंधेरे से निकलती हुई
एक आह बनकर मेरे अंतस में उतरती हुई
जबकी ये जानती हूँ मैं ,
प्रेम यथार्त में नहीं बस एक तिलिस्म है ।
खत्म होने के डर के साथ,
नियती है बहना ।
बनकर धारा बह रही हूँ।



                                                                (चित्र गूगल से साभार )



6-
मील का पत्थर

लम्बी सड़कों के तट पर,
सदियों से खड़ा है।
सीने में अंक और नाम टाककर ,
कि मुसाफिर भटक न जाये।
पर मुसाफिर भटकते है फिर भी,
क्योंकि भटकने से पहले ,
नहीं दिखता उन्हें कोई मील का पत्थर।
या देखने से बचना चाहते है,
उठाना चाहते है भटकने का आनंद।
उन्हें ठोकर का एहसास ही नहीं होता,
बड़े बेपरवाह होते है ये मुसाफिर।
मील के पत्थर की आवाज,
उसके भीतर पत्थर में ही तब्दील हो जाती है।
मुसाफिर और मील के पत्थर का रिश्ता ,
आँखों का होता है।
इशारों ही इशारों में कर लेते है बातें
नहीं आती उन्हें कोई बोली।
मगर होती है उनकी भी आवाज़,
जो दिशाएँ बताती है।
रास्तों को मंजिल तक ले जाती है।


अनामिका चक्रवर्ती ''अनु''

   -
परिचय

 
अनामिका चक्रवर्ती  'अनु'
जन्म स्थान : सन् 11/2/1974  जबलपुर (म.प्र.)

प्रारंभिक शिक्षा : भोपाल म.प्र.
स्नातक : गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर छत्तीसगढ़
 
एवं PGDCA

प्रकाशन : विभिन्न राज्यों के पत्र पत्रिकाओ में रचनाएँ और लेख प्रकाशित।
एवं एक साझा म्युज़िक एलवम प्रतिति के लिये गीत लिखे

संप्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क : अनामिका चक्रवर्ती अनु
 
वार्ड न.- 7 नॅार्थ झगराखण्ड
मनेन्द्रगढ़ कोरिया
 
छत्तीसगढ़ - 497446

ई-मेल : anameeka112@gmail.com



6 टिप्‍पणियां:

  1. स्त्री के जीवन को परिभाषित करती बेहतरीन रचनायें

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  2. Sunder abhivyakti, visheshkar, aurat, darakht, ghunghat me. Sachhe anubhav par adharit, bhav ki gehrai ko vyakt karti hui.

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  3. दिल को छू लेने वाली रचनाये

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