गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

आभा दुबे की कवितायेँ


                                                     Abha Dubey






मेरा परिचय....
नाम --- आभा दुबे 
शिक्षा --स्नातक (मनोविज्ञान)
मूल निवास ---पटना 
वर्तमान पता ....
विद्या विहार , नेहरु नगर पश्चिम 
भिलाई (छत्तीसगढ़)

भावनावों को शब्दों में ढालना अच्छा लगता है..


आभा दुबे जी नारी मनोभावों को पढने में सिद्धहस्त हैं। बड़ी ही सहजता से वो एक शिक्षित नारी को परिभाषित करती हैं ,वो रो नहीं सकती चीख नहीं सकती घुटन अन्दर ही अन्दर दबाती है। ………क्योंकि जहीन औरतों को यही तालीम दी जाती है। नारी जीवन की कठोरता को ओ निराश लड़की में व्यक्त करती हैं। …… कहीं न कहीं आभा जी को पढना मुझे खुद को पढने जैसा लगा ,एक नारी को पढने जैसा लगा। वो अपने प्रयास में कितना सफल हो पाई हैं ,पढ़िए और जानिए 

आभा दुबे की कवितायेँ 



1....तालीम का  सच....
--------------

पढ़ी-लिखी सर्वगुणसंपन्न ,जहीन, घरेलू औरतें ,
रोतीं नहीं, आंसू नहीं बहातीं 
बंद खिड़की दरवाजों के पीछे ,
अन्दर ही अन्दर घुटती हैं,
सिसकती हैं कि आवाज बाहर ना चली जाये कहीं,
हाँ, सच तो है ,
ऐसी औरतें भी भला रोती हैं कहीं?

शेयर करती हैं सुबह की  चाय सबके  साथ...
ओढ़ के चौड़ी,नकली,मुस्कराहट,
बारी -बारी देखती हैं सबकी आँखों में खुद को ,
पढ़ ले ना कोई चेहरे से, 
बंद कमरे की रात की कहानी,
डूबी रहती हैं अंदेशे में,
किसी ने चेहरे को पढ़ा तो नहीं?

अगर किसी ने पूछ लिया, 
है ये माथे पे निशां कैसा ?
देंगी वही घिसा-पिटा जवाब ,
हंस के कहेंगी, ओह ये....!
 रात वाशरूम में पांव स्लिप कर गया था , 
या...
सीढियां उतरते पैर फिसल गया था, ...
अब कौन बताये इन्हें ...
आये दिन, एक ही तरह के हादसे , होते हैं भला  कहीं?

ऐसे ही मसलों से दो चार होती औरतें,
सोचती रहती हैं मन ही मन ,
अच्छा होता हम अनपढ़ और जाहिल ही रहतीं !
कम से कम बुक्का फाड़के , चिल्ला के, रो तो सकतीं थीं !
दिल तो हल्का हो जाता !
अपनी ही तालीम बोझ तो नहीं लगती...!
तालीम ही ऐसी मिली कि हर बात पे सोचो....लोग क्या कहेंगे 

बड़े मसले होते हैं इन पढ़ी-लिखी, घरेलू, जहीन औरतों के पास ,
कुछ दिखाने के , कुछ छिपाने के,
पर करें भी क्या ?.....तालीम ही ऐसी मिली....!
.......................................आभा दुबे

2....देह ...!

देह ...!

__________

एक देह में छिपी है कितनी देह
एक पिंजरा कितनी उड़ानों को  कर सकता है कैद ?

एक ही घर में  कितने लोग 
 उनका अपना - अपना अकेलापन 
 घर के भीतर कई  मकान
होते हैं कितने आंसू ? उन  आँखों के समंदर  में ..?

एक औरत हमेशा ही  सहती है सितम 
फिर  भी पहनती है इच्छाओं  की  चूड़ियाँ 
देखती है सपने 
लेकिन उसका होना, सबके होने में होना होता है 
इस तरह वह अक्सर 
छिपा लेती है  
अपने मन और तन का सच
एक देह मरती है तो कितने देह की मौत हो जाती है ...?

आभा दुबे

3.....वो पागल ...!
वो पागल !
____________

उसके पास दिमाग नहीं है
याददाश्त भी कमजोर है
एक हद तक भूलने की बीमारी जैसा

वो तर्क नहीं करती
हाजिर रहती है , हर आवाज पर
हाथ बंधे, सर झुकाए आज भी,
जिसने जिस रूप में देखना चाहा, आती है वो  नजर
बदले में तैयार रहता है एक संबोधन उसके लिए,
पागल ...

सुना है, कि...
प्रेम से बोलने वाला , प्रेम में बोलनेवाला ,
सबसे खूबसूरत शब्द होता है ये--
पागल
पर पागलपन में ही सही
वो नहीं भूल पाती,  अपने औरतपन को ,
हर हाल  याद रहता है उसे
कि, प्रकृति को संतुलन प्रदान करती
और जीवों की तरह,
हाड़-मांस, रक्त-मज्जा, अस्थियों के मेल से
बनी है वो भी
उन्ही के जैसी भावनाओं से लदी-फदी
पर, जब वो मिलती है ,
नारी छवियों की आड़ में , छवियों को भंजाते-भुनाते, लोगों से,
खुद-जैसी ही छवियों की कैदी औरतों से ,
तब वो करती है स्त्री-विमर्श
जो बनती है सुर्खियाँ, अखबारों की

और मैं देखती हूँ ख़बरों में छाई हुई  पागल के उम्दा पागलपन को,
मैं खुश होती हूँ
कि वो पागल,
औरत है और औरत ही रहेगी...
क्यूंकि उसके पास दिमाग नहीं है....!

आभा दुबे

4.....तलाश .....

बाज़ार में खड़ी हूँ 
यकीन खरीद रही हूँ 

इच्छाओं की बुझी राख में 
ढूंढ रही हूँ जिंदगी के अवशेष 

रौशनी को छूने की कोशिश में 

जलें हैं हाथ बार बार 

दरअसल  मेरा जीना 
मेरे होने के खिलाफ एक अलिखित  समझौता है

निभाना है जिसे,
रहती सांसों तक....
आभा दुबे

5.....ओ ! निराश लड़की ...
______________

बहुत ही कम है तुममें ,
धैर्य और सहिष्णुता
और तुम पढ़ती हो
निराशा के क्षणों में ,
पाब्लो नरूदा की कविताएँ ...

डर है मुझे ...
कहीं फिर ना हो जाये
नरूदा, किसी, आत्महत्या का जिम्मेदार
क्यूंकि.तुम ....

पहले कविता पढ़ती हो
फिर शब्दों से सपने  बुनती हो
बना देती हो  कविता में सपनों की  कहानी
ढूंढती हो एक ऐसा सच, जैसा तुम चाहती हो
जीने लगती हो पात्र बनकर
 उन कविताओं के आसपास  ही कहीं
बसा लेती हो एक मायावी संसार उनमें ही

अंत में उलझ जाती हो
हकीकत की कठोर धरातल और सपनों के सतरंगी मायाजाल में
नतीजा ....
आत्मसात कर लेती हो मृत्यु का सच
 हार जाता है
कविताओं के बिम्ब से उभरे
रंगीन जीवन का दुह्स्वप्न ....
और जीत जाता है नरूदा
खुद के भावों  को तुम्हारे मन से जोड़ने में

ऐ निराश लड़की ....
मत बुनो
मत ढूंढो
कविताओं के आसपास
जीवन और मृत्यु का ताना-बाना
कविताएँ बहुत ही कोमल, नर्म, मखमली हुआ करती हैं
और जीवन ?
कठोर
 .....इसके रास्ते .... बहुत ही पथरीले .....

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

पहचान

                                                                 पहचान  
                                                          

                                            मेरा इस शहर में नया -नया तबादला हुआ था । जिससे दोस्ती करता सब दीनानाथ जी के बारे में कुछ न कुछ बताते । दीनानाथ जी हमारे ही दफ्तर के दूसरे विभाग में काम करते थे । वे क्लर्क थे , पर हर कोई उनकी तारीफ करता था ........ क्या आदमी हैं ......... कहाँ -कहाँ तक उनकी पहुँच है , हर विभाग के अफसर के घर चाय -पानी है ।
एक दिन एक मित्र ने मुझसे यहाँ तक कह दिया कि अगर कोई काम अटके तो दीनानाथ जी से मिल लेना ,चुटकियों में काम हो जाएगा । पर मैंने सोचा मुझे क्या करना है ? दो रोटी खानी हैं और अपनी फकीरी में मस्त ! बच्चों के साथ खेलूं या दीनानाथ से मिलूँ ।
पर विधि का विधान , मेरी एक फाइल फंस ही गई । मैं लोगों के कहने पर उनके घर गया । दीनानाथ जी सोफे पर लेटे थे । स्थूलकाय शरीर, तोंद कमीज की बटन तोड़ कर बाहर आने की कोशिश कर रही थी । पान से सने दांत और बड़ी -बड़ी मूंछें जो उनके व्यक्तित्व को और भी रौबीला बना रही थीं । मैंने जाकर पाँव छुए (सबने पहले ही बता दिया था कि उन्हें पाँव छुआना पसंद है ), वे उठ बैठे ।
मैंने अपनी समस्या बताई। " बस इतनी सी बात " वे हंस पड़े ,ये तो मेरी आँख की पुतली के इशारे से हो जाएगा । उन्होंने कहा '' अब क्या बताएं मिश्राजी ,यहाँ का पत्ता-पत्ता मेरा परिचित है ।सब मेरे इशारे पर काम करते हैं !
उन्होंने अपने परिचय सुनाने शुरू किये ,फलाना अफसर बुआ का बेटा ,वो जीएम् ... उसकी पोस्टिंग तो मैंने करायी  है । दरअसल उसका अफसर मेरे साले के बहनोई का पडोसी है ।
मैं सुनता जा रहा था ,वो बोलते जा रहे थे । कोई लंगोटिया यार ,कोई कॉलेज का मित्र कोई रिश्तेदार ,और नहीं तो कोई मित्र के मित्र का पहचान वाला । मैं चमत्कृत था, इतना पावरफुल आदमी !! मुझे तो जैसे देव पुरुष मिल गए ! मेरा काम तो हुआ पक्का !!
मैं उनके साथ साहब से मिलने चल पड़ा । साथ में चल रहे थे उनके पहचान के किस्से !वो बताते जा रहे थे और साथ में जगह -जगह पर पान की पीक थूक रहे थे । मुझे उन्हें थूकते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ा अधिकारी किसी फाइल पर अपनी मोहर लगा रहा हो । सारा रास्ता उनकी मोहरों से रंग गया ।मैं मन ही मन सोच रहा था कि कितने त्यागी पुरुष हैं, इतनी पहचान होने पर भी साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।इन्हे तो संसद में होना चाहिए !!
सर्दी के दिन थे । सामने चाय की छोटी सी रेहड़ी थी ।मैने चाय पीने की ईक्षा  ज़ाहिर की । वे अनमने से हो गए । पर मैं क्या करता ? उंगलियाँ अकड़ी जा रही थीं । इसलिए उनसे क्षमा -याचना करते हुए एक चाय का आर्डर दे दिया । दीनानाथ जी मुँह  फेर कर खड़े हो गए।
वृद्ध चाय वाले ने मुझे चाय दी । मैंने चाय पीते हुए दीनानाथ जी को आवाज दी ।
बूढा चाय वाला बोला- उसे मत बुलाओ ,वो नहीं आएगा ।वो मेरा बेटा है । वो अब बड़ी पहचान वाला हो गया है । अब अपने बूढे बाप को भी नहीं पहचानता ।
चाय मेरे गले में अटक गई ।दूसरों से पहचान बढ़ाने के चक्कर में अपनी पहचान से इनकार करने वाले दीनानाथ जी अचानक मुझे बहुत छोटे लगने लगे ।

                              वंदना बाजपेयी 

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

आखिर क्यों टूटते हैं गहरे रिश्ते


                                          आखिर क्यों टूटते हैं गहरे रिश्ते 
                                                  


                                                (चित्र गूगल से साभार )


अभी ज्यादा दिन नहीं बीते,जब सुरेश व मोहन गहरे दोस्त हुआ करते थे,लेकिन आज दोनों एक दूसरे की चर्चा तो दूर्,नाम तक सुनना पसंद नहीं करते.अगर कहीं किसी ने गलती से भी किसी चर्चा में एक का नाम ले लिया.तो दूसरा बिफर पड़ता है.सीमा और रजनीश की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.दोनो ने लगभग 10 वर्षों की कड़ी प्रेम तपस्या के बाद एक वर्ष पूर्व विवाह किया,लेकिन इस एक साल के भीतर ही फ़ासले कुछ इस कदर बढ़े कि अब दोनों तलाक की तैयारी कर रहे हैं .बात सिर्फ़ सुरेश-मोहन या सीमा-रजनीश की ही नहीं है,न जाने कितने ऐसे रिश्ते हैं,जो जन्मते हैं,पनपते हैं,खिलते हैं और फिर यकायक मुरझा जाते हैं.जो कभी एक दूसरे के लिए जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार रहते हैं.वही एक दूसरे के जानी-दुश्मन बन जाने हैं.दरअसल किसी भी मनुष्य के जीवन में दो तरह के रिश्ते होते हैं.मनुष्य जन्म लेते ही कई तरह के रिश्तों की परिभाषाओं में बंध जाता है, जिनका आधार रक्त सम्बन्ध होता है,लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है,वैसे-वैसे कुछ नए रिश्तों की दुनिया भी आकार लेने लगती है, जिनका वह ख़ुद चयन करता है. ऐसे रिश्तों की एक अलग अहमियत होती है,क्योंकि ये विरासत में नहीं मिलते,बल्कि इनका चयन किया जाता है.ऐसे रिश्तों को प्रेम का नाम दिया जाए या दोस्ती का या कोई और नाम दिया जाये,लेकिन ये बनते तभी हैं,जब दोनों पक्षों को एक दूसरे से किसी न किसी तरह के सुख या संतुष्टि की अनुभूति होती है.यह सुख शारीरिक,मानसिक,आर्थिक या आत्मिक किसी भी तरह का हो सकता है.जब एक पक्ष दूसरे के बिना ख़ुद को अपूर्ण,अधूरा महसूस करता है,तो अपनत्व का भाव पनपता है और जैसे-जैसे यह अपनत्व बढ़ता जाता है,रिश्ता प्रगाढ़ होता जाता है.दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किन्हीं दो लोगों के बीच में पारस्परिक हितों का होना,बनना और बढ़ना रिश्तों को न केवल जन्म देता है ,बल्कि एक मज़बूत नींव भी प्रदान करता है,लेकिन जैसे ही पारस्परिक हित निजी हित में तब्दील होना शुरु होते हैं रिश्तों को ग्रहण लगाना शुरु हो जाता है.पारस्परिक हित में अपने हित के साथ-साथ दूसरे के हित का भी समान रुप से ध्यान रखा जाता है,जबकि निजी हित में अपने और सिर्फ़ अपने हित पर ध्यान दिया जाता है.निजहित को प्राथमिकता देने या स्वहित की कामना करने में उस समय तक कुछ भी ग़लत नहीं है जब तक दूसरे के हितों का भी पूरी तरह से ध्यान रखा जाये,लेकिन जब दूसरे के हितों की उपेक्षा करके अपने हित पर जोर दिया जाता है,तो रिश्ते को स्वार्थपरता की दीमक लग जाती है,जो धीरे-धीरे किसी भी रिश्ते को खोखला कर देती है.स्वार्थ की भावना रिश्तों की दुनिया का वह मीठा जहर है,जो रिश्ते को असमय ही कालकवलित कर देती है.स्वार्थ की भावना उस समय और भी कुरूप्, भीषण और वीभत्स रुप धारण कर लेती है,जब दूसरे पक्ष के अहित की कीमत पर भी ख़ुद का स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश की जाती है.किसी भी रिश्ते में एक-दो बार ऐसे प्रयास सफल भी हो सकते हैं,लेकिन जब बार-बार किसी का अहित करके कोई अपना हित साधने की कोशिश करता है,तो रिश्ते जख्मी होने लगते हैं.ये ज़ख्म जितने गहरे होते जाते हैं, रिश्तों की दरार उतनी ही चौड़ी होती जाती है.मन के किसी कोने में या दिल के दर्पण पर स्वार्थ की परत के जमते ही रिश्तों का संसार दरकने लगता है और धीरे-धीरे एक समय ऐसा भी आता है,जब रिश्ता पूरी तरह टूट कर बिखर जाता है.सुदीर्घ और मज़बूत रिश्ते मनुष्य को न केवल भावनात्मक संबल देते हैं,बल्कि आत्मबल बढ़ाने में भी मददगार साबित होते हैं. सदाबहार रिश्तों के हरे-भरे वृक्षों की छाया में मनुष्य ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है,जबकि किसी भी तरह के रिश्ते का बिखरना ऐसे घाव दे जाता है,जिसकी जीवन भर भरपाई नहीं हो पाती .इसलिए जहाँ तक हो सके रिश्तों को टूटने से बचाने की कोशिश करनी चहिये.रिश्तों को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि स्वार्थ के बजाय त्याग और स्वहित के बजाय पारस्परिक हित को प्रधानतादी जाये.दूसरे के अहित की कीमत पर भी अपना हित साधने के बजाए जब अपना अहित होने पर भी दूसरे का हित करने की भावना जन्म लेती है,तो रिश्ते ऐसी चट्टान बन जाते हैं, जिनका टूट पाना असंभव हो जाता है.इस तरह रिश्तों का बंधन इतना मज़बूत होता जाता है कि कोई भी इससे बाहर नहीं निकल सकता.रिश्तों की नाव को डूबने से बचाने के लिए यह जरूरी है कि इस नाव में स्वार्थपरता का सुराख न होने पाये,क्योंकि रिश्तों की नाव मझधार में तभी डूबती है जब पारस्परिकहित रुपी पतवार और त्यागरुपी खेवनहार लुप्त हो जाते हैं.
                                                                                              
                                                                              ओमकार मणि त्रिपाठी 

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

अकेलेपन पर ओशो के विचार

                                
                                                       
                                                   (चित्र गूगल से साभार )




अकेलेपन के अंधेरे से सीधे नहीं लडा जा सकता। यह सारभूत बिंदु है जिसे प्रत्येक को समझना चाहिए कि कुछ बुनियादी बातें हैं जो बदली नहीं जा सकती। यह बुनियादी बातों में से एक है: तुम अंधेरे से, अकेलेपन से, अलगाव के भय से सीधे नहीं लड सकते। कारण यह है कि ये सब बातें मौज़ूद नहीं हैं; ये सब किसी की अनुपस्थिति हैं, जैसे कि अंधेरा प्रकाश का अभाव है।


तो सिर्फ प्रकाश लाना है और तुम बिल्कुल अंधेरा नहीं पाओगे, क्योंकि यह प्रकाश का न होना था, बस प्रकाश न होना, किसी वस्तु का नहीं, इसके होने के साथ, यह ऐसा कुछ नहीं है जिसकी हस्ती है। परंतु सिर्फ इसलिए कि प्रकाश वहां नहीं था, तुमने अंधकार के होने की अवधारणा बना ली थी।

तुम इस अंधकार के साथ सारा जीवन लडते रह सकते हो और तुम सफल नहीं होगे, परंतु इसे दूर करने के लिए एक छोटी सी मोमबत्ती ही काफी है। तुम्हें प्रकाश के लिए काम करना होगा क्योंकि यह सकारात्मक है, अस्तित्वगत है; यह अपने आपमें मौजूद है। और एक बार जब प्रकाश आ जाता है, जो भी इसके अभाव से था स्वत: गायब हो जाता है।

अकेलापन अंधेरे की तरह है।

क्योंकि तुम अपने एकाकीपन को नहीं जानते, डर लगता है। तुम अकेला अनुभव करते हो इसीलिए चिपटना चाहते हो किसी चीज से, किसी से, किसी रिश्ते से, बस यह भ्रम रखने के लिए कि तुम अकेले नहीं हो। परंतु तुम जानते हो कि तुम हो, इसीलिए पीड़ा है। एक तरफ तुम उससे चिपट रहे हो जो कि वास्तविक नहीं है, जो कि बस अस्थायी व्यवस्था है, रिश्ता, दोस्ती।

और जबकि तुम रिश्ते में हो तो अपने अकेलेपन को भूलने के लिए थोडा भ्रम बना सकते हो। लेकिन यही समस्या है: हालाकि तुम एक पल के लिए भूल सकते हो कि तुम अकेले हो, बस अगले ही पल अचानक तुम्हें पता चलता है कि रिश्ते या दोस्ती में से कुछ भी हमेशा के लिए नहीं है। कल इस आदमी या इस औरत को नहीं जानते थे, तुम अजनबी थे। आज तुम दोस्त हो, आने वाले कल के बारे में कौन जानता है? आने वाले कल तुम फिर से अजनबी होगे, इसलिए पीड़ा है।

भ्रम एक तरह की सांत्वना देता है, परंतु यह वास्तविकता नहीं पैदा कर सकता जिससे कि सारे डर गायब हो जाएं। यह डर का दमन करता है, इसलिए सतह पर तुम अच्छा महसूस करते हो, कम से कम तुम अच्छा लगने की कोशिश तो कर ही सकते हो। तुम खुद को अच्छा लगने का दिखावा करते हो: कैसा सुंदर रिश्ता है, कैसा निराला आदमी है या कैसी निराली स्त्री है। परंतु भ्रम के पीछे, और भ्रम इतना पतला है कि तुम इसके पीछे देख सकते हो, दिल में दर्द है, क्योंकि दिल अच्छी तरह जानता है कि कल चीजें पहले जैसी न रह सकें…और वे एक जैसी हैं भी नहीं।

तुम्हारे सारे जीवन का अनुभव समर्थन करता है कि चीजें बदल रही हैं। कुछ भी स्थिर नहीं रहता है; तुम बदलते हुए संसार में किसी चीज को पकडे नहीं रह सकते हो। तुम अपनी दोस्ती को स्थायी बनाना चाहते थे परंतु तुम्हारी चाह परिवर्तन के नियम के खिलाफ थी, और वह नियम अपवाद बनने नहीं जा रहा। यह बस अपनी ही चीज़े किये चला जाता है। यह सब कुछ बदल देगा।

शायद बहुत समय बाद एक दिन तुम समझ जाओगे कि यह अच्छा था कि इसने तुम्हारी नहीं सुनी, कि अस्तित्व ने तुम्हारी फिक्र नहीं की और जो भी यह करना चाहता था किये चला गया …तुम्हारी इच्छानुसार नहीं।

तुम्हें इसे समझने में थोडा समय लग सकता है। तुम चाहते थे कि यह दोस्त तुम्हारा हमेशा के लिए दोस्त रहे, परंतु कल वह दुश्मन हो सकता है। या बस, तुम खो गये! और वह तुम्हारे साथ नहीं है। कोई और जगह भर सकता है जो कि बहुत ज्यादा अच्छा होगा। तब तुम अचानक महसूस करोगे कि अच्छा हुआ दूसरा वाला छूट गया; अन्यथा तुम उसके साथ अटके रह जाते। परंतु पाठ/सबक कभी भी इतना गहरा नहीं जाता कि तुम स्थायित्व के लिए कह सको।

तुम इस आदमी, इस औरत के साथ स्थायित्व के बारे में कहना शुरु करो: अब वह नहीं बदलेगा। तुमने वाकई सबक याद नहीं किया है कि बदलाव बस जीवन का ताना बाना है। तुम्हें इसे समझना होगा और इसके साथ चलना होगा। भ्रम मत पैदा करो; वे मदद नहीं करने जा रहे। और हर कोई विभिन्न प्रकार के भ्रम पैदा कर रहा है।

मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूं जो कहता है, मुझे केवल पैसे पर भरोसा है। मुझे किसी और पर भरोसा नहीं है।

मैंने कहा, ‘तुम एक बहुत महत्वपूर्ण बात कह रहे हो’।

उसने कहा, सभी बदल रहे हैं। तुम किसी पर भरोसा नहीं कर सकते। और जैसे-जैसे तुम्हारी उम्र बढती जाती है, केवल तुम्हारा पैसा ही तुम्हारा होता है। कोई परवाह नहीं करता, तुम्हारा बेटा भी नहीं, यहां तक कि तुम्हारी पत्नी भी नहीं। यदि तुम्हारे पास पैसा है तो वे सब परवाह करते हैं, वे सब इज्जत करते हैं, क्योंकि तुम्हारे पास पैसा है। यदि तुम्हारे पास पैसा नहीं है तो तुम भिखारी बन जाओगे।

उसका कहना है कि एक लंबे अनुभव के बाद पाया है कि संसार में केवल पैसा ही ऐसी चीज है जिस पर विश्वास किया जा सकता है, यह उसने उन लोगों से जिन पर वह विश्वास करता था बार-बार धोखा खाने के बाद सीखा है, और वह सोचता था कि वे उसे प्रेम करते हैं परंतु वे उसके साथ पैसे के लिए थे।

परंतु, मैंने उससे कहा, मृत्यु के समय पैसा तुम्हारे साथ नहीं जाएगा। तुम भ्रम में हो सकते हो कि कम से कम पैसा तो तुम्हारे साथ है, परंतु जैसे ही तुम्हारी सांस रूक जाएगी पैसा तुम्हारे साथ नहीं होगा। तुमने कुछ कमाया है लेकिन यह यहां छूट जाएगा; तुम इसे मृत्यु के आगे नहीं ले जा सकते। तुम गहन अकेलेपन में गिर जाओगे जो पैसे के मुखौटे के पीछे छिपा है।

ऐसे लोग हैं जो सत्ता के पीछे हैं, लेकिन कारण वही है: जब वे सत्ता में हैं तो बहुत से लोग उनके साथ हैं, लाखों लोग उनके प्रभुत्व में हैं। वे अकेले नहीं हैं। वे बहुत बडे राजनैतिक और धार्मिक नेता हैं। परंतु सत्ता परिवर्तित होती है। एक दिन यह तुम्हारे पास है, दूसरे दिन यह चली जाएगी, और अचानक सारा भ्रम गायब हो जाएगा। तुम इतने अकेले हो जाओगे जितना कोई नहीं होगा, क्योंकि दूसरे अकेले रहने के लिए आदी हो गए हैं। तुम आदी नहीं हो…तुम्हारा अकेलापन तुम्हें ज्यादा अकेलापन देता है।

समाज नें व्यवस्था की है जिससे तुम अपना अकेलापन भूल सको। योजित शादियां एक कोशिश हैं कि तुम जान सको कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारे साथ है। साधारण से के लिए सभी धर्म तलाक का प्रतिरोध करते हैं उसका सरल सा कारण यह है कि यदि तलाक की अनुमति दी तो मूल कारण जिसके लिए शादी की खोज की थी, खत्म हो जाएगा। मूल कारण था तुम्हें एक साथी देना, आजीवन साथी।

परंतु भले ही पत्नी तुम्हारे साथ या पति तुम्हारे साथ पूरे जीवन होगा, इसका यह मतलब नहीं है कि प्रेम एक जैसा रहेगा। वास्तव में, तुम्हें एक साथी देने के बजाय, वे तुम्हें ढोने के लिए एक बोझा देते हैं। तुम अकेले थे, पहले से ही परेशानी में, और अब तुम्हें एक और इंसान को साथ में ले कर चलना होगा जो खुद अकेला है। और इस जिंदगी में कोई आशा नहीं है, क्योंकि जब प्रेम गायब हो जाएगा तो तुम दोनों अकेले हो जाओगे, और दोनों को एक दूसरे को बर्दाश्त करना होगा। अब सवाल यह नहीं होगा कि तुम दोनों एक दूसरे को देख कर मुग्ध हो रहे हो; ज्यादा से ज्यादा तुम एक दूसरे को धैर्य से बर्दाश्त कर सकते हो। तुम्हारे अकेलेपन को शादी नाम की सामाजिक रणनीति बदल नहीं पायी है।

धर्मों ने तुम्हें संगठित धार्मिक समाज का सदस्य बनाने की कोशिश की है जिससे कि तुम हमेशा भीड़ में रहो। तुम जानते हो कि कैथोलिक छ करोड़ हैं; तुम अकेले नहीं हो, छ करोड़ कैथोलिक तुम्हारे साथ हैं। जीसस क्राइस्ट (यीशु मसीह) तुम्हारे उद्धारकर्ता हैं। भगवान तुम्हारे साथ है। अकेले तुममें गलत संदेह उत्पन्न हो सकते हैं, लेकिन छ करोड़ लोग गलत नहीं हो सकते। थोड़ा सा सहारा…परंतु वह भी चला गया है क्योंकि करोड़ों लोग जो कैथोलिक नहीं हैं। जिन्होंने जीसस को सूली पर लटकाया था। जो लोग प्रभु में विश्वास नहीं रखते हैं और उनकी संख्या कैथोलिकों से कम नहीं है, ये कैथोलिकों से ज्यादा हैं। और कई धर्म हैं जिनकी अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

बुद्धिमान व्यक्ति के लिए संदेह न करना मुश्किल है। लाखों लोग हैं जो एक निश्चित विश्वसनीय प्रणाली को मानते हैं, परंतु तुम्हें अभी भी विश्वास नहीं है कि वे तुम्हारे साथ हैं, कि तुम अकेले नहीं हो।

भगवान एक उपकरण था, लेकिन सारे उपकरण बेकार हो चुके हैं। यह उपकरण था, जब कुछ नहीं होगा तो कम से कम भगवान तो तुम्हारे साथ है। वह हमेशा हर जगह तुम्हारे साथ है। आत्मा कि अंधेरी गहराई में, वह तुम्हारे साथ है, परेशान मत हो।

बचकानी मानवता को इस अवधारणा से धोखा देने के लिए यह अच्छा था, परंतु तुम्हें इस अवधारणा से धोखा नहीं दिया जा सका। भगवान जो हमेशा से हर जगह है, तुम उसे नहीं देखते, तुम उससे बात नहीं कर सकते, तुम उसे छू नहीं सकते। तुम्हारे पास उसके अस्तित्व का कोई सबूत नहीं है, तुम्हारी इच्छा के अत्तिरिक्त/सिवाय की उसे होना चाहिए। परंतु तुम्हारी इच्छा किसी भी चीज़ का सुबूत नहीं है।

भगवान बचकाने मन की इच्छा है।

आदमी परिपक्व हो गया है, और भगवान निरर्थक बन गया है। परिकल्पना ने अपनी पकड़ खो दी है।

मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूं कि जो भी प्रयास अकेलेपन से बचने के लिए किया गया था, बेकार हो चुका है, और बेकार हो जाएगा, क्योंकि यह जीवन की बुनियादी बातों के विरुद्ध है। जरूरत इसकी नहीं है कि कुछ ऐसा हो जिसमें तुम अपना अकेलापन भूल जाओ, जरूरत इसकी है कि तुम अपने एकाकीपन के प्रति सजग हो जाओ, जो कि वास्तविकता है। इसका एहसास करना और इसे महसूस करना बहुत ही सुंदर है, क्योंकि यह दूसरों से और भीड़ से तुम्हारी स्वतंत्रता है। यह तुम्हारे अकेलेपन के भय से स्वतंत्रता है।

"अकेलापन"-- मात्र इस शब्द से तुम्हें तुरंत एक घाव की याद आ जाती है: इसे भरने के लिए कुछ चाहिए। एक खाली जगह है, और यह खाली जगह पीड़ा पहुंचाती है। "एकाकी" शब्द में किसी पीड़ा का वही एहसास नहीं है, न ही खालीपन है जिसे भरना है। एकाकी का सरल सा मतलब है सम्पूर्णता। तुम पूर्ण हो; तुम्हें पूर्ण करने के लिए किसी की जरूरत नहीं है।

अपने अंतरतम केंद्र की खोज करो, जहां तुम हमेशा एकाकी हो, हमेशा एकाकी रहे हो। जीवन में, मृत्यु में जहां भी होओगे, अकेले होओगे। परंतु यह लबालब भरा है, यह खाली नहीं है, इतना लबालब भरा है और इतना पूर्ण है जीवंतता के रस, सुंदरता, आशीर्वाद से कि बहना शुरु कर दिया है, कि एक बार तुम एकाकीपन को चख लो तो हृदय में जो भी पीड़ा है वह गायब हो जाएगी। इसके बजाय, अत्यंत मधुर लय होगी जो शांति, खुशी और आनंद से सराबोर होगी।

इसका अर्थ यह नहीं कि जो आदमी अपने एकाकीपन में केंद्रित है, स्वयं में पूर्ण है, वह दोस्त नहीं बना सकता, वास्तव में वही दोस्त बना सकता है, क्योंकि अब इसकी जरूरत नहीं रही है, यह सिर्फ सह्भागिता है। उसके पास इतना है कि वह सहभागिता कर सकता है।

मित्रता दो प्रकार की हो सकती है। एक मित्रता वह होती है जिसमें तुम भिखारी होते हो, तुम अपने अकेलेपन के लिए दूसरों से मदद चाहते हो, और दूसरा भी भिखारी है; वह भी यही तुमसे चाहता है। और स्वभाविक रूप से दो भिखारी एक दूसरे की मदद नहीं कर सकते। जल्द ही वे देखेंगे कि भिखारी से भीख मांगने के कारण उनकी जरूरत दुगनी या कई गुना हो गयी है। अब एक भिखारी की जगह दो भिखारी हैं। और दुर्भाग्य से यदि उनके बच्चे हैं, तब एक पूरा समूह है जो मांग रहा है और किसी के पास देने के लिए कुछ नहीं है।

तो सभी कुंठित और नाराज हैं, और सब महसूस कर रहे हैं कि उसे धोखा दिया जा रहा है, उसके साथ विश्वासघात किया जा रहा है। और वास्तव में न तो कोई धोखा दे रहा है और न कोई विश्वासघात कर रहा है, क्योंकि तुम्हारे पास है क्या?

अन्य प्रकार की मित्रता, अन्य किस्म के प्रेम की बिल्कुल अलग गुणवत्ता होती है। यह जरूरत से नहीं उपजी है, बल्कि तुम्हारे पास इतना ज्यादा है कि तुम बांटना चाहते हो। नये किस्म का आनंद तुम्हारे अंतरतम में आ रहा है, बांटने का आनंद , जिसके प्रति तुम पहले जागरुक नहीं थे। तुम हमेशा मांगते रहते थे।

जब तुम बांटते हो , तो वहां पकड़ का कोई सवाल ही नही है। तुम अस्तित्व के साथ बहते हो, तुम जिंदगी के बदलाव के साथ बहते हो, क्योंकि इससे कोई मतलब नहीं है कि तुम किसके साथ बांटते हो। कल भी वही इंसान हो सकता है, पूरी जिंदगी वही इंसान हो सकता है, या विभिन्न लोग भी हो सकते हैं। यह अनुबंध नहीं है, यह शादी नहीं है; यह बस प्रचुरता है जिसके कारण तुम देना चाहते हो। जो कोई भी तुम्हारे नज़दीक होता है, तुम दे देते हो। और देना बडा आनंदायक है।

भीख मांगना इतनी बड़ी पीड़ा है। मांग कर यदि तुम कुछ पाते भी हो, तुम दयनीय ही रहोगे। यह चोट पहुंचाता है। यह तुम्हारे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है, यह तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाता है। परंतु बांटना तुम्हें ज्यादा केंद्रित, ज्यादा पूर्ण, ज्यादा गौरवान्वित करता है परंतु ज्यादा अहंकारी नहीं, ज्यादा गौरवान्वित कि अस्तित्व तुम्हारे प्रति करुणापूर्ण है। यह अहंकार नहीं है; यह बिल्कुल अलग तथ्य है…एक पहचान कि अस्तित्व ने तुम्हें उस बात की अनुमति दी है जिसके लिए लाखों लोग कोशिश कर रहे हैं, लेकिन गलत दरवाजे पर। तुम सही दरवाजे पर हो।

तुम्हें अपने आनंद पर और उस सब पर जो अस्तित्व ने तुम्हें दिया है, नाज़ है । भय गायब हो जाता है, अंधेरा गायब हो जाता है, दर्द गायब हो जाता है, दूसरे के संग-साथ के लिए इच्छा गायब हो जाती है।

तुम एक व्यक्ति से प्रेम कर सकते हो, और यदि वह व्यक्ति किसी और से प्रेम करता है तो कोई ईर्ष्या नहीं है, क्योंकि तुम्हारा प्रेम अत्यधिक आनंद से उत्पन्न हुआ है। यह पकड़ नहीं है। तुम दूसरे व्यक्ति को कैद नहीं कर रहे थे। तुम परेशान नहीं थे कि दूसरा व्यक्ति तुम्हारे हाथों से छूट जाएगा, कि कोई और प्रेम संबंध बनाना शुरू कर देगा…

जब तुम अपने आनंद को बांट रहे हो, तुम दूसरे के लिए कैद नहीं बनाते। तुम बस देते हो। यहां तक कि तुम आभार या धन्यवाद भी नहीं चाहते क्योंकि तुम कुछ पाने के लिए नहीं दे रहे, आभार के लिए भी नहीं। तुम दे रहे हो क्योंकि तुम इतने भरे हो कि तुम्हें तो देना ही है।

इसलिए यदि कोई आभारी है, तुम उस व्यक्ति के लिए कृतज्ञ होगे जिसने तुम्हारा प्रेम स्वीकार किया था, जिसने तुम्हारा उपहार स्वीकार किया था। उसने तुम्हें भार मुक्त किया है, उसने तुम्हें अपने ऊपर प्रेम वर्षा करने की अनुमति दी। और जितना ज्यादा तुम बांटोगे, जितना ज्यादा तुम दोगे, उतना ज्यादा तुम्हारे पास होगा। इसलिए यह तुम्हें कंजूस नहीं बनाता, यह नया भय उत्पन्न नहीं करता कि मैं इसे खो दूंगा। सच तो यह है कि जितना ज्यादा तुम इसे खोते हो, उतना ही ज्यादा ताजा पानी स्रोतों से बहने लगता है जिनके बारे में तुम्हें पहले पता नहीं था।

इसलिए मैं तुम्हें अकेलेपन के बारे में कुछ करने के लिए नहीं बताऊंगा।

अपने एकाकीपन के लिए देखो।

अकेलेपन को भूल जाओ, अंधेरे को भूल जाओ, दर्द को भूल जाओ। ये सभी एकाकीपन का अभाव हैं। एकाकीपन का अनुभव इन्हें तुरंत दूर कर देगा। और तरीका वही है: अपने मन को देखो, सजग रहो। ज्यादा से ज्यादा जागरूक हो जाओ, अंतत: तुम केवल अपने आप के प्रति जागरूक होओगे। यह वही बिंदु है जहां तुम अपने एकाकीपन के बारे में जागरूक हो जाओगे।

तुम्हें आश्चर्य होगा कि विभिन्न धर्मों ने इस परंम अनुभुति को विभिन्न नाम दिए हैं। भारत के बाहर जन्मे तीन धर्मों ने इसे कोई नाम नहीं दिया क्योंकि वे कभी स्वयं की खोज में कभी इतनी दूर नहीं गए। वे बचकाने, अपरिपक्व, प्रभु से चिपके, प्रार्थनाओं से चिपके, मुक्तिदाता से चिपके रहे। तुम देख सकते हो मेरा क्या मतलब है: वे हमेशा निर्भर रहे हैं, कोई और उनकी रक्षा करेगा। वे अपरिपक्व हैं। यहूदी, ईसाइयत, इस्लाम, ये बिल्कुल भी परिपक्व नहीं हैं और शायद यही कारण है कि उन्होंने संसार में ज्यादातर लोगों को प्रभावित किया है, क्योंकि संसार में ज्यादातर लोग अपरिपक्व हैं। उनके बीच कुछ आत्मीयता है।

परंतु भारत में तीन धर्मों के पास इस परम अवस्था के तीन नाम हैं। और मुझे इसका स्मरण हुआ एकाकीपन शब्द की वजह से। जैनियों ने कैवल्य चुना, एकाकीपन, अंतरतम की परम स्थिति के रूप में। जैसे कि बौद्धों ने निर्वाण चुना, नो-सेल्फ/अनात्मा, और हिंदुओं ने मोक्ष चुना, स्वतंत्रता, जैनियों ने परम एकाकीपन को चुना। तीनों शब्द सुंदर हैं। वे एक ही वास्तविकता के तीन रूप हैं। तुम इसे मुक्ति या स्वतंत्रता कह सकते हो; तुम इसे एकाकीपन कह सकते हो; तुम इसे अनात्मा, रिक्तता कह सकते हो, बस विभिन्न संकेत उस परम अनुभव के लिए जिसके लिए कोई नाम पर्याप्त नहीं है।

यदि किसी बात को तुम समस्या के रूप में देखते हो तो हमेशा देखो कि वह सकारात्मक है या नकारात्मक। यदि यह नकारात्मक है तो इसके साथ मत लडो; इसके बारे में बिल्कुल परेशान भी न हो। बस सकारात्मक पक्ष की ओर देखो, और तुम सही दरवाजे पर होगे।

ज्यादातर लोग संसार में इसलिए चूकते है क्योंकि वे नकारात्मक दरवाजे के साथ लडना शुरु कर देते हैं।

कोई दरवाजा नहीं है; केवल अंधकार है, अभाव है। और जितने ज्यादा वे लड़ते हैं, जितनी ज्यादा विफलता पाते हैं, ज्यादा निरुत्साहित, निराशावादी हो जाते हैं…और अंतत: वे खोजना शुरु कर देते हैं कि जीवन का कोई अर्थ नहीं है, कि यह बस यातना है। लेकिन उनकी गलती यह है कि उन्होंने गलत दरवाजे से प्रवेश किया।

इससे पहले कि तुम समस्या का सामना करो, सिर्फ समस्या की ओर देखो: क्या यह किसी का अभाव है? और तुम्हारी सभी समस्याएं किसी का अभाव हैं। और एक बार जब तुमने ढूंढ़ लिया कि क्या अभाव है तब सकारात्मक के पीछे जाओ। और जिस पल तुमने सकारात्मक पा लिया, प्रकाश, अंधेरा खत्म हो जायेगा। —

                                                                                ओमकार मणि त्रिपाठी 

                                                                          

                                       
                       







 ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः                                                                                  
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा  कश्चिद् दुःखभागभवेत।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 


                                         भारतीय  संस्कृति का यह श्लोक मुझे सदैव प्रभावित करता रहा है। .............
जिसमें प्राणी मात्र की मंगलकामना निहित है।मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ,एक का दुःख दूसरे पर प्रभाव डालता  है.इसीलिए  भारतीय दर्शन सदा से सबके सुख की कामना करना सिखाता है। कहीं न कहीं यह पत्रिका "अटूट बंधन "को मूर्त रूप देने व् यह ब्लॉग बनाने का मेरा उद्देश्य भी यही रहा है। कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है ,परन्तु मेरा मानना  है की साहित्य समाज का  दर्पण होने के साथ -साथ समाज को सकारात्मक सोचने पर विवश भी करता है और उसे नयी दिशा देने में उत्प्रेरक का काम भी करता है।इस पत्रिका अवं ब्लॉग में मेरा प्रयास सदैव यही रहेगा की आप को उच्च कोटि की रचनायें , .......... चाहे वो साहित्य आध्यात्म ,धर्म ,सामाजिक सरोकारों से या संस्कृतिक चेतना से  सम्बंधित हो पढ़ने को मिले। आशा यहाँ समय व्यतीत करने के बाद आप कुछ शांति ,कुछ उत्साह का अनुभव करेंगे व् आपकी सोच का दायरा विकसित होगा।

                                                                                  ओमकार मणि त्रिपाठी
                                                                                     संपादक :सच का हौसला (साप्ताहिक समाचार पत्र )
                                                                                        एवं "अटूट बंधन "(मासिक हिंदी पत्रिका )